Tuesday, August 19, 2008

मुश्किल चीज हैं मुशर्रफ

मुशर्रफ पर महाभियोग को लेकर बड़ी अटकलें हैं। खुद मुशर्रफ निश्िंचत और बेखौफ नजर आ रहे हैं। वे जायेंगे या रहेंगे कहना कठिन है। मुशर्रफ के बाद क्या, की अटकलों में पड़े लोगों को समझना चाहिए कि उनका जाना इतना आसान नहीं है। वे दस साल से सत्ता शीर्ष पर है और कुछ भी उलटफेर का माद्दा रखते हैं। फिर सवाल सिर्फ मुशर्रफ का नहीं है। उनका रहना -जाना दूसरी कई बातें तय करेंगी। अमेरिका क्या चाहता है? आईएसआई क्या चाहती है? और सबसे अहम कियानी क्या चाहते हैं, जिनके हाथों में वरिष्ठता को ताक पर रखकर मुशर्रफ ने सेना की कमान सौंप दी थी। अभी कियानी जो कह रहे हैं उस पर आंख मूंद कर भरोसा नहीं किया जा सकता।


वीपी मलिक

शर्रफ जाएंगे भी इसको लेकर दुनिया भर में संदेह है। पाकिस्तान में होने वाले नाटकीय सत्तपरिवर्तनों की लम्बी फेहरिस्त को देखते हुए बदलाव होने तक कुछ भी कहना अटकलबाजी ही होगी। पाकिस्तान के चरित्र को केवल सैनिक शासन से ही जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। अफगानिस्तान
के राष्ट्रपति हामिद करजई के शब्दों में 'दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादीज् पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के पाकिस्तान की राजनीति में दबदबे के मद्देनजर सब कुछ उतना आसान नहीं होने वाला जितना लग रहा है। इस पूरे मामले में कई ऐसी बाते हैं जिनका जवाब आना अभी बाकी
है। अभी तो यह जानना बाकी है कि नौ साल तक देश की कमान संभालने के बाद मुशर्रफ ने जिन अशफाक कियानी के हाथों में 'बेटनज् सौपा है वे क्या चाहते है? आईएसआई क्या चाहती है? मुशर्रफ के बाद पाकिस्तान का क्या होगा? क्या आपस में बिल्कुल भी इत्तफाक न रखने वाले जरदारी और शरीफ, सेना और आईएसआई की समांतर सत्ता के मद्देनजर अमेरिका के हितों को उस ढंग से सुरक्षित रख पाएंगे जसा मुशर्रफ कर रहे थे।

क्या अमेरिका, जो कि पाकिस्तान के भीतर और अफगानिस्तान में आईएसआई समíथत जेहादियों से लड़ रहा है, के पास आगे की योजना का खाका तैयार है? मुशर्रफ कि सस्मान विदाई कैसे होगी जबकि उन पर महाभियोग और अन्य कई मामले चलाए जाने की योजना बनाई जा रही है। और सबसे बड़ा सवाल, मुशर्रफ के बाद क्या? यह एक ऐसा सवाल है जिसके बल बूते पर तमाम खामियों के
बावजूद जनरल दशक भर से सत्ता शीर्ष पर कायम हैं।


एशिया के सबसे महत्वपूर्ण भाग में सत्ता परिवर्तन का आपेरशन कैसे अंजाम तक पहुंचेगा
इसमें सबसे बड़ी भूमिका अमेरिका और आईएसआई की होने वाली है। दरअसल नौ नवंबर के बाद पाकिस्तान ने विशेषकर वहां की सेना ने वैश्विक परिदृश्य में बदलती परिस्थितियों का आंकलन ठीक ढंग से नहीं किया। यह इस बात से नजरें फेरे रही कि इस घटना के बाद 'तालिबान और कट्टरपंथज् जसी चीजों के लिए दुनिया में अब कोई जगह नहीं बची है। इस गफलत में पाकिस्तानी सत्ता के समांतर सत्ता चलाने वाली आईएसआई की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यह आईएसआई ही थी जिसके निर्देशों पर मुशर्रफ ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को दरकिनार कर कारगिल को अंजाम दिया। यह अलग बात है कि करगिल पाकिस्तान के लिए वाटरलू साबित हुआ और इस घटना ने पाकिस्तानी सेना के बारे में विश्व बिरादरी मेंएक संदेह की छवि बनाने में बड़ी भूमिका निभाई। इस घटना के बाद दुनिया को लगा कि 'बेलगाम सेनाज् वाले इस देश के हाथों में परमाणु हथियार कितने खतरनाक हो सकते हैं। हालांकि 9/11 के बाद मुशर्रफ ने अमेरिका के आतंकवाद विरोधी गठजोड़ में शामिल होकर कुछ विश्वास जमाने की कोशिश की लेकिन अमेरिका से यह ज्यादा दिन छिपा नहीं रह सका कि उसके सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी बने पाकिस्तान में एक समांतर सत्ता है जो नहीं चाहती कि दुनिया भर में फैली आतंकवाद की उसकी दुकानें खत्म हों। इस सत्य से साबका होने के बाद अमेरिका ने पाकिस्तान में
राजनीतिक प्रक्रिया की वापसी को संभव बनाने का प्रयास शुरू किया। यह प्रक्रिया अंजाम तक पहुंचती इससे पहले बेनजीर भुट्टो की मौत से इसे बड़ा झटका लगा।

बीबी की हत्या के पीछे भी आईएसआई की भूमिका रही जो नहीं चाहती थी कि पाकिस्तान में लोकतंत्र लौटे। जिहादी और उनके सरपरस्त चुनावों के बाद भी देश में जनतांत्रिक शक्तियों को सत्ता से दूर रखने का षड़यंत्र बनाते रहे। इस बीच अमेरिका को भी आंतक विरोधी लड़ाई में काफी नुकसान उठाना पड़ा। बीते जून माह में ही उसे 28 सैनिकों को गवाना पड़ा जो कि पिछले आठ साल में उसकी सबसे
बड़ी क्षति है। इसने भी अमेरिका को मुशर्रफ की विदाई का रास्ता बनाने में अपनी भूमिका अदा की।

लेकिन मुशर्रफ का जाना उतना आसान नहीं। जिस तरह की नाटकीय परिस्थतियों में सत्ता शीर्ष पर पहुंचे हैं और जसा कि उनका स्वाभाव रहा है, वे उलटफेर कर सकते है। भारत के मौजूदा हालात भी इसमें अहम भूमिका निभा सकते हैं। विशेषकर जम्मू कश्मीर। जहां पिछले कई सालों से चल रहे भारतीय सेना के विश्वास बहाली के कार्यक्रम को गहरा धक्का लगा है। पाकिस्तानी सैनिक हुक्मरां इस माहौल को बहाना बना कर एक बार फिर सुरक्षित समय निकाल सकते हैं। दरअसल आंतरिक गृहयुद्ध जसी स्थितियों और आíथक मोर्चे पर विफल रहने के बावजूद पाकिस्तानी हुक्मरां भारत का हौव्वा खड़ा कर जनतंत्र को पनपने का अवसर ही नहीं देते हैं। भारत को पाकिस्तान की सुरक्षा के लिए खतरा बताकर जनता को बरगलाने का खेल तो आजादी के बाद ही शुरू हो गया था, लेकिन जनरल जिया ने इसे व्यवस्था जसा बना दिया। सेना और मुशर्रफ एक बार फिर इसका फायदा उठा सकते हैं। पाकिस्तान के गठन के बाद से लगातार सैनिक शासन का इतिहास रखने वाले पाकिस्तान में सेना ने कितनी गहरी जड़े जमा ली है इसका खुलासा पाकिस्तानी पत्रकार आयशा सिद्दीकी ने हाल ही में प्रकाशित अपनी किताब में किया है। उनके आंकलन के मुताबिक पाकितानी सेना का अर्थतंत्र 20.7 बिलियन डालर के
करीब पहुंच गया है। इसमें रियल स्टेट औद्योगिक इकाइयों के रूप में एक बड़ा साम्राज्य उसके लिए काम करता है। जाहिर है कि इसे बरकरार रखने के लिए शासन तंत्र का हाथ में होना जरूरी है। जिस तरह से वरिष्ठता की परवाह किए बिना जनरल कियानी के जिम्मे सेना की कमान मुशर्रफ ने सौपी थी उसे देखते हुए कियानी के इस बयान पर कि 'सेना सीमाओं की सुरक्षा का काम करेज् पर आंख मूंद
कर विश्वास नहीं किया जा सकता।


(जनरल वीपी मलिक पूर्व थल सेनाध्यक्ष की सीतेश द्विवेदी से बातचीत पर आधारित)

1 comment:

अनुराग said...

मुश्किल नही कमीनी चीज़ है मुशर्रफ़ ...