Friday, February 15, 2008

देखो, देखो गिरफ्तार...!

मुंबई या महाराष्ट्र में बसा एक भी गैर-मराठी या उत्तर भारतीय आतंक या अराजकता के कारण मरता या वापस लौटता है तो सरकार को अपने होने पर पछताना और रोना चाहिए.

दो दिन से हर कोई परेशान. राज ठाकरे के घर को पुलिस ने घेर लिया है... उनकी गिरफ्तारी कभी भी... और साथ में महानिर्माण संघ के शोहदों के हाथों पिटने-लुटने के उत्तरी भारतीयों के दृश्य... ठाकरे के विषवम के फुटेज. देख-देख कर दिल-दिमाग अजब संकटग्रस्त था. गरजते ठाकरे और ठुमक-ठुमक सरकार.

बुरी खबर को बड़ी खबर मानने वाला चैनलिया (चैन हर लेने वाला) मीडिया खौफ को बढ़ाये जा रहा था. ऐसा माहौल बन रहा था कि भतीजे ठाकरे की गिरफ्तारी के बाद बस प्रलय. राजनीति में लड़खड़ाते हुए अपनी जमीन पर खड़े होने की कोशिश में लगे एक आधारहीन नेता को विराट बनाए जाने की कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही थी.

ठाकरे कब गिरफ्तार होंगे से बड़ा सवाल था वे अपने को क्यों गिरफ्तार कराने पर आमादा हैं. इसका जवाब मिलते देर न लगी. एक राजनीतिक टांय-टांय फिस्स. देखने हम भी गए थे पर तमाशा न हुआ. वैसे भी महाराष्ट्र में इस बेसुरे घराने से वहाँ की हर सरकार डरती रही है.

बाल ठाकरे क्या-क्या नहीं बक-बक करते रहे. सरकारें उन्हें गिरफ्तार कर सबक देने से चूकती रही. किसी की भी गिरफ्तारी के लिए यह बहाना नहीं हो सकता कि उससे कानून व्यवस्था बिगड़ जाएगी, कि कल उसके बच्चे का मुंडन है या उसका जन्मदिन.

इसलिए देर से ही सही राज ठाकरे को गिरफ्तार कर दुरुस्त कदम ही उठाया था, अपने होने का पता दिया था. राज ठाकरे की पार्टी के असामाजिक तत्व अगर कोई बखेड़ा खड़ा करते तो भी सरकार को अपने होने का मतलब समझाने की तैयारी रखनी चाहिए थी.

मुंबई या महाराष्ट्र में बसा एक भी गैर-मराठी या उत्तर भारतीय आतंक या अराजकता के कारण मरता या वापस लौटता है तो सरकार को अपने होने पर पछताना और रोना चाहिए.

दरअसल, गैर-मराठी और मराठी के बहाने यह राज और उद्धव ठाकरे की लड़ाई है. राज ठाकरे के रूप में मराठी अस्मिता का एक और दावेदार पैदा हो गया है. इसलिए शरद पवार को प्रधानमंत्री बनाने के लिए समर्थन देने की बात कहकर बाल ठाकरे की कोशिश अपने घर के मराठी मनुष्यों को बनाए रखने की होती है, तो साथ ही नए वोटरों की तलाश में ये उत्तर भारतीय को रिझाने लगे थे. उन्हें अपनी संगिनी भाजपा से हर उस समय खुन्नस होती है तो जब वह आत्मविश्वास से भरी उन्हें नजर आती है.



उन्हें लगता है कि भाजपा का हिंदुत्व उनके अपने हिंदुत्व को नहीं, मराठी अस्मिता को भी किनारे धकेल देगा. इसलिए वे गरज उठते हैं कि मोदी मॉडल महाराष्ट्र में नहीं चलेगा.

बदली हुई राजनीति करने, शिवसेना से अलग दिखने और सेकुलर राजनीति का झंडा उठाए राज ठाकरे लागातार वोटों की बदलती राजनीति से लड़खड़ाने लगे और अंततः उन्हें उत्तर भारतीय नजर आए अपनी घटिया राजनीति का निशाना बनाने के लिए.

बाल ठाकरे साठ के दशक में दलित भारतीयों के खिलाफ इसी राजनीति पर उतरे थे. "लुंगी उतारो, पुंगी बजाओ" उनका नारा था. और फिर सत्तर के दशक में मुसलमानों के खिलाफ.

असली लड़ाई तो राज और उद्धव में ही है. राज के आपत्तिजनक बयान के बाद उन्होंने भी उसी स्तर का बयान जारी कर दिया. नफरत से प्रेम के खेल में घराना फिर बेसुरा अलापने लगा.

ठाकरे का जवाब निश्चित ही उसी छिछोरी भाषा में नहीं दिया जा सकता जैसा सपा के अबु आजमी ने किया. उसके लिए सरकार की सख्ती दिखनी चाहिए. अफसोस की बात यह है कि राजनीति में यह चीजें सिरे से गायब हैं.

दिलचस्प बात यह है कि इस मामले को जिस बड़े परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए उसकी बात संवैधानिकता और एकजुटता के झंडाबरदारों की तरफ से नहीं, उस पार्टी के नेता की ओर से आई जो अपने शासन में संविधान में उलट-पलट करवाने पर आमादा थी.



लालकृष्ण आडवाणी ने ठीक ही इस मामले को संविधान का उल्लंघन और राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध बताया. कांग्रेस में खुद अर्जुन सिंह थे जिन्होंने सीधे-सीधे कहा कि केंद्र को हस्तक्षेप करना चाहिए.

सरकारों को ऐसी पार्टियों और लोगों से सतत सावधान रहना होगा जिनका जन्म ही नकारात्मक राजनीति से हुआ है. जैसा कि एक राजनीतिक टिप्पणीकार ने लिखा है कि जनता को खुद सजग रहना चाहिए क्योंकि कोई भी, कहीं भी, कभी भी अल्पसंख्यक बताया जा सकता है.

आज की परिस्थितयों में शहरों की नागरिकता ऐसी हो गई है. विभेदकारी राजनीति का शिकार कोई भी समुदाय हो सकता है. 84 में सिख अल्पसंख्यक हो गए थे. मुसलमानों का तो एक नाम ही गोया अल्पसंख्यक है.

मीडिया को क्या कहें. उसने तो शिवसेना, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के निठल्लों की उत्तेजक छवियां दिखा-दिखा कर हर वेलेंटाइन डे के पहले आशंकाओं का आदी बना दिया है.



मनोहर नायक

1 comment:

रवीन्द्र रंजन said...

एक नया शब्द चैनलिया और उसका अर्थ मालूम हुआ पढ़कर। इसके लिये आपका शुक्रिया।