10 फरवरी, 2008. अमित कुमार को आज कोर्ट में पेश किया जाना था. कार्यक्रम, रणनीति कल शाम से ही तय हो चुकी थी. एयरपोर्ट से लाते समय भी विजुअल बन नहीं सके थे लिहाजा दबाव बढ़ चुका था.
कोर्ट में पेशी
के विजुअल हर हाल में चाहिए विवेक बाबू. अधिकारियों के फोन आते ही रात पीठ ऐसी सीधी हुई की ऐंठन के मारे रीढ़ में सुबह तक दर्द हो आया. तनाव में अधकचरी किस्म की नींद लेकर सुबह उठा तो देखा मोबाइल घड़ी साढ़े सात बजा रही है. गोली की रफ्तार से बाथरूम, पूजाघर, किचन और फिर पटियाला हाउस. साढ़े आठ बजे वहां पहुंचा तो देखा तमाम चैनलों की टीमें मैदान-ए-जंग में डटी थीं. अंतर सिर्फ ये था कि मेरा दफ्तर क्रिकेट के साथ साथ किडनी को लेकर भी उतना ही संवेदनशील है तो अमित के हर सार्वजनिक मौके को वो जनता के सामने लाने से नहीं चूकना चाहता था.
मेरे पास चार यूनिट थीं. लिहाजा चारों को मैंने चायपानी के बाद युद्ध के अंदाज में पटियाला के चारों गेटों पर तैनात कर दिया. बीच बीच में अमित पर चर्चा होती रही. कभी मानवता पर लगे एक भद्दे दाग के रूप में, कभी एक पेशेवर क्रिमिनल कैरेक्टर के रूप में, तो कभी एक ऐसे शख्स के रूप में जिसकी गलती सिर्फ आपराधिक अवसरवाद रही हो.
बहरहाल, तमाम वकीलों से मशविरे के बाद ये तय हो गया कि अमित को यहीं पटियाला में पेश किया जाएगा. नौ बजे, दस बजे, ग्यारह भी बज गए....
सारे पत्रकार विरहिनों की तरह अपने सुहाग की बाट जोह रहे थे. लेकिन ना तो मुई सीबीआई की गाड़ी आती दिख रही थी, ना अमित का हजारों पुलिस वालों के बीच बेखौफ मुस्कुराता चेहरा दिखाई पड़ने की कोई उम्मीद नजर आ रही थी.
तभी फोन की घंटी बजी और तीस हजारी से एक शुभचिंतक काले कोट धारी का फोन आया कि पुलिस वहां बैरिकेटिंग कर रही है. शुक्रिया अदा करते हुए मैंने तुरंत फोन काटा और वहां मौजूद रिपोर्टर का नंबर मिलाया.
ऊंघती सी आवाज में जवाब आया कि मैं तो कोर्ट के दूसरी तरफ हूं, अभी जाती हूं मेन गेट की ओर. महिला, मीडिया और माया को कोसते मैंने दूसरे चैनल के साथी रिपोर्टर को फोन मिलाया और कन्फर्मेशन के बाद दो कैमरा यूनिट तीस हजारी डाइवर्ट करा दीं.
मन धुकधुक कर रहा था कि ये भी एयरपोर्ट वाला दिन ही साबित होने वाला है. तभी सीबीआई पर मौजूद रिपोर्टर का फोन आया, " हम आईटीओ क्रॉस कर चुके हैं और तीस हजारी की ओर बढ़ रहे हैं. मुझे नहीं लगता कि अमित को पटियाला हाउस में पेश किया जाएगा."
मैंने सांस छूटते ही तीस हजारी फोन मिलाया और जानकारी पास कर दी. करीब पंद्रह मिनट बाद असाइनमेंट गरजा कि गुलाबी बाग भागो, गाड़ी उसी ओर जा रही है.
लगा, सब कुछ छूट सा रहा है और भारत में चौबीस घंटे बिताने के बाद रात भर की पूछताछ के बाद के अमित कैसा दिख रहा होगा, ये चाशनी अब टीवी पर बिखेरी नहीं जा सकेगी.
बहरहाल, मैं वहां नहीं पहुंच सका. एपी, एएफपी, एबीसी अमेरिका, सीएनएन, बीबीसी, मर्डोक का स्टार, टीवीटुडे, दुनिया को बदल रहा सारा मीडिया ठगा रह गया और सीबीआई हर नजर से बचाती अमित को पेश कर वापस अपनी कोटर में लौट गयी.
अगर वो दरिंदा है, तो क्यों नहीं उसे सार्वजनिक तौर पर कोर्ट में पेश किया गया.
क्या पता, रात की पूछताछ में उसने स्वास्थ्य मंत्री के रिश्तेदार की ही किडनी बदलने की बात कबूल कर ली हो. कई तरह के अनुमान लगाए जा सकते हैं.
सीबीआई का तो काम ही है सत्ताधारियों की पतलून बचाना. आखिरकार कुछ भी हो, हम क्यों इस शख्स पर इतनी हायतौबा मचा रहे हैं.
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अमित राउत. आयुर्वेदिक सर्जन. किडनी रैकेट किंगपिन. दरिंदा. अमानुष. राक्षस.......पता नहीं क्या-क्या.
लेकिन हम-आप जिस चेहरे को इतना क्रूर बता रहे हैं वो तो बड़े आराम से हजारों कैमरों की मौजूदगी में मुस्करा रहा है. डीलर नहीं बल्कि डॉक्टर होने का संदेश दे रहा है.
हर ओर मानो राक्षस...राक्षस...राक्षस......राक्षस...राक्षस...का शोर मचा हो और चीख पुकार करते फटे पेट एक किडनी के साथ टहल रहे लोगों के बीच से एक चेहरा अट्टहास करता उभरता है.
मैं तुम्हारी व्यवस्था हूं, तुम्हारा तंत्र हूं, तुम्हारा बनाया कानून हूं. मैं तुम्हारी लोकशाही का असली चेहरा हूं. आओ, देखो, देखो मुझे...
और आप सहम जाते हैं त्रासदी का ये क्रूर चेहरा देखकर.
एम्स के बाहर, रात करीब दस बजे का वक्त.
तफ्तीश कर रहा हूं उन लोगों की मौजूदगी की जो 300 से 400 रुपए में अपना एक बोतल खून बेचते हैं. लोग मिलते हैं, सच्चाई से रूबरू होता हूं.
15 अक्टूबर, 2002. सूनामी की त्रासदी से उबर रहा दक्षिण भारत. चेन्नई की झोपड़पट्टी की एक बस्ती का नाम किडनीपुरम पड़ गया है. यहाँ के लोगों ने सोचा कि दोनों किडनी लेकर मरने से बेहतर है एक बेचकर कुछ दिन तो सांसें ली जाए.
आखिर कौन होंगे वो लोग जिन्होंने डॉ. अमित के दलालों को अपनी किडनियां बेची होंगी. और कौन होंगे वे, जिनकी किडनी जबरन निकाली गई होगी.
क्यों किसी ने अपनी किडनी को बेचने का रास्ता चुना होगा. शायद तब, जब उन्हें लगा कि अंग जरूरत से ज्यादा हैं और पैसा जरूरत से कम, तो क्यों ना गैरजरूरी चीज हटाकर जरूरी चीज जुटाई जाए.
और बेच दी होगी किडनी...
कभी सोचा है आपने अगर तेलंगाना, उत्तरी महाराष्ट्र और बुंदेलखंड के किसानों को अमित के बारे में मालूम होता तो कितने किसानों की जिंदगी बच जाती.
शायद नहीं...
किसानों को भी पता नहीं रहा होगा कि कर्ज में आकंठ डूबने के बाद खुद को खत्म कर लेने से पहले उनके पास एक उपाय अभी बाकी है. दो में से एक किडनी बेचने का.
महाजन का कर्ज भी चुकता हो जाएगा और अगर इंद्रदेवता तनि मुस्करा दें, तो शायद अगली फसल बेहतर हो जाए.
किसान भागकर महाजन से आखिरी बार कर्ज लेने जाता गुड़गांव तक के किराए के लिए, क्योंकि उसके बाद अनेकों कर्ज के जाल से मुक्त हो जाते.
जिस देश का प्रधानमंत्री* एक किडनी पर पांच साल देश चला सकता है तो मरता किसान एक किडनी पर सांसें तो चला ही सकता है. आज़ादी के साठ साल बाद, नौ फीसदी की विकास दर वाले देश में किसान इससे ज्यादा और कर भी क्या रहा है...!
अमित कर्ज में डूबे किसानों के लिए भगवान था.
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*पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी 1984 में ही अपनी एक किडनी गंवा चुके हैं. लेकिन एक किडनी पर ना सिर्फ देश चलाया बल्कि आज अपनी उम्र के लोगों के लिए चुनौती हैं.
अगले पोस्ट में बताएंगे कैसे छूटेगा अमित और कैसे किडनी के धंधे का धंधा आपकी लोकशाही में कभी बंद नहीं होने वाला. चाहे कानून नहीं आप कानून का बाप ही क्यों ना बना लें... तब तक के लिए, सोचते रहें !!!