Wednesday, December 17, 2008

आखिर यह जूता ही क्यों?

मृगेंद्र पांडेय

यह विश्व के सबसे ताकतवर लोकतंत्र की ओर फेंका गया जूता है। यह उनकी नीतियों की ओर फेंका गया जूता है। यह जूता उस विरोध का प्रतीक है जो पिछले कई वर्षो से इराक के लोगों के दिलों में जिंदा है। ऐसा उस समय भी हुआ था जब इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की मुर्तियां तोड़ी गई थी। उस समय विश्व को लगा था कि जनता सद्दाम से खासी नाराज है। उसके उत्पीड़न से नाराज है। उसकी तानाशाही के खिलाफ है। लेकिन आज जब यह जूता विश्व के सबसे ताकतवर राष्ट्राध्यक्ष की ओर उठा तो क्या उनके सामने भी कुछ ऐसी ही परिस्थितियां हैं। क्या वहां की जनता इनसे और इनकी नीतियों से नाराज है। अगर आप का जवाब हां है तो फिर उस देश में बुश के साथ वैसा क्यों नहीं किया गया जो सद्दाम के साथ किया गया। आखिर दोनों का गुनाह तो समान है। जनता नाराज है, उनके उत्पीड़न और तानाशाही से। तो फिर यह जूता ही क्यों?


इराक में सद्दाम को फांसी पर चढ़ाने के बाद बुश ने विश्व के विरोध के बावजूद एक बड़ी सेना वहां तैनात कर दी। दो वर्ष में करोड़ों रुपएोोंक दिए। वहां की जनता को अमेरिकी सेना के जवानों ने तरह तरह से प्रताड़ित किया। यहीं कारण है कि एक बड़ा वर्ग उनके खिलाफ हो गया है। वह चाहता है कि हर हाल में अमेरिकी सेना इराक से वापस जाए। ओबामा ने अपने चुनावी कैंपेन में ही वहां से सेना वापस बुलाने की बात कही। दरअसल बुश की नीतियों का विरोध तो अमेरिका में भी एक बड़े वर्ग ने किया था, लेकिन उस समय उन्होंने किसी की नहीं सुनी। यही कारण था कि अफगानिस्तान में फौज भेजने के बाद बुश ने इराक में भी सेना भेजी। और एक साथ दो मोर्चे खोल दिए।

मुंबई हमले के बाद अमेरिका के प्रतिनिधियों का भारत आना एक सोची समाी रणनीति थी। अमेरिका नहीं चाहता था कि भारत-पाक के बीच किसी प्रकार का बवाल बढ़े। ऐसा उसकी विश्व में शांति स्थापित करने की सोच का असर नहीं बल्कि उसे डर था कि कहीं पाकिस्तान अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना के साथ लड़ाई में सहयोग कर रही अपनी सेना को वापस बुलाकर भारत की सीमा पर तैनात न कर दे। आखिर भारत अमेरिका की रणनीति क्यों नहीं समा रहा है। खास बात यह बताना चाहुंगा कि वैश्विक मंदी के बावजूद अमेरिका में एक ऐसा उद्योग जो उसकी चपेट में नहीं है तो वह हथियार उद्योग है। यह हथियार अमेरिका उन देशों के बेंचता है जहां गृह युद्ध हो रहे हैं। अमेरिका पर यह भी आरोप लगे हैं कि वह कई देशों में गृह युद्ध को बढ़ावा देने में मदद करता है।

ऐसे में बुश और अमेरिका के खिलाफ ऐसा करने का साहस एक पत्रकार ने उठाया। यह एक नए संकेत की तरह है। उन लोगों के लिए जो यह सोचते हैं कि बदलाव किया जाए। शायद आने वाले समय में भारत में भी इस तरह की घटनाएं हों। अगर ऐसा होता है यह लोकतंत्र के परिपक्व होने का संकेत होगा। ऐसा उस समय होगा जब जनता अपने अधिकारों और कर्तव्यों को भली प्रकार जान लेगी। उस समय वह अपने प्रतिनिधियों से यह सवाल करने की स्थिति में होगी कि आखिर उनकी भलाई, उनके विकास, उनकी तरक्की के लिए उनके प्रतिनिधि ने क्या किया। ऐसा होने में एक लंबा समय लग सकता है, लेकिन ऐसा नहीं होगा यह कहना जल्दबाजी होगी।

2 comments:

umeshawa said...

हम सिर्फ अमेरिका को गरियाते है। वह गरियाने लायक है भी। लेकिन चर्च के प्रभाव वाले अन्य राष्ट्र जैसे बिलायत तथा अन्य युरोपीय स्कैंडेवीयन देश भी दुष्टता मे उनके साझेदार है।

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

तानाशाहों के ख़िलाफ़ जूते बम फँकने का रिवाज काफी पुराना है . तानाशाह के विरुद्ध आक्रोश प्रर्दशित करने के लिए जूते से बढ़कर और कोई चीज नही है .