Wednesday, December 23, 2009

एक गांव जहां बसती हैं विधवाएं

ये एक ऐसे गांव की कहानी है जिसकी हर चौखट पर एक जवान विधवा है। कई घरों में चार- चार जवान विधवाएं हैं। साठ घरों में सत्तर विधवाएं हैं। मरघट सी शांति वाले इस गांव में चालीस पार के पुरुष दस से भी कम हैं। राजस्थान के भीलवाड़ा के पास के इस गांव की डरावनी तस्वीर के नीचे छुपी है एक काली हकीकत।

इस गांव की महज पच्चीस साल विधवा प्रेम तीन बच्चों की मां है। बच्चों को खाना खिला वो निकल पड़ती है नरेगा के तहत मिट्टी की खुदाई करने। दिनभर की हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद भी बच्चों का पेट भरना नामुमकिन है सो शाम ढलते ही आराम की जगह उसके नसीब में आती है संघर्ष की एक और दास्तान। दिनभर मिट्टी खोदने के बाद रात की पाली में ईंट-भट्टे की फैक्ट्री में मजदूरी। प्रेम के पति लादू की पांच साल पहले एक बीमारी से मौत हो गई । वो अपने गांव श्रीजीके खेड़ा से सौ किलोमीटर दूर पत्थर की खदानों में काम करता थाए दस साल तक काम किया फिर बीमार हुआ तो कभी ठीक न हो पाया। प्रेम के पड़ोस में रहने वाली 27 साल की मीरा की कहानी भी ऐसी ही है।

इसी प्रकार इन्द्रा दो छोटी बहनों और एक छोटे भाई के साथ इस दुनिया में बिल्कुल अकेली है। मां- बाप दोनों छह साल पहले गुजर चुके हैं। लावारिस होने पर समाज कल्याण विभाग ने इनके ताऊ को पालनहार योजना के तहत गोद दे दियाए इसके बदले सरकार महीने के सात सौ रुपए देती थीए लेकिन शुरुआत के कुछ चेक के बाद ये सहायता भी बंद हो गई। यही वजह है कि गांव के बाहर चल रहे नरेगा के काम में दूर दूर तक कोई मर्द नजर ही नहीं आता। गांव में ऐसा कोई घर नहीं बचाए जहां खानों की मिट्टी ने सुहाग न छीना होए कोई जवान विधवा न हुई हो।

दरअसल इस गांव को दीमक की तरह चाट रहा है पत्थर का पाउडर। मदन पिछले पांच साल से खाट पर हैए बीमार है, उसे खांसी हैए श्वांस लेने में तकलीफ है, अब केवल इंजेक्शन की खुराक मिलने पर ही वे कुछ पल बैठ सकता है, खाना खा सकता है। पांच साल में भीलवाड़ा से जयपुर सूबे के हर बड़े अस्पताल में इलाज करायाए लेकिन डाक्टरों ने हाथ खड़े कर दिएए अब वे आखिरी जंग लड़ रहा है। पांच साल पहले पत्थर की खानों पर काम करता थाए दस साल तक काम किया और घर लौटा तो साथ में बीमारी लेकर। मदन कहता है कि पत्थर की खानों पर ड्रिल मशीन चलाता थाए अंदर मिट्टी जाती थीए उस समय तो कोई दिक्कत नहीं थी, ले्किन धीरे- धीरे बीमार हो गया। अब छाती दुखती है, फेफड़ों में दर्द होता हैए ये दर्द अब बढ़ता जा रहा है। पति खाट पर है तो फिर पत्नी उगमी का हाल तो और भी बेहाल है।

पांच साल से पति की तीमारदारी कर रही है। पांच बेटे-बेटियों और सास का पालन-पोषण कर रही हैए उनमें भी एक लड़की मानसिक विकलांग है। मदन को ये बीमारी गांव से करीब सौ किलोमीटर दूर बिजौलिया की पत्थर की खानों से मिली। इन खानों से निकलने वाला लाल और काला पत्थर दुनिया भर में मशहूर है। भीलवाड़ा-कोटा हाईवे पर इन खानों से निकलने वाला पत्थर निर्यात भी किया जाता हैए लेकिन पत्थर तोड़ने पर उसकी बारीक मिट्टी जमकर हवा में उड़ती हैए इसे सिलिका कहते हैं। ये सिलिका पत्थर तोड़ने वाले मजदूर की श्वांस के साथ फेफड़ों में जाती है, धीरे-धीरे ये फेफड़ों में जम जाती है। आठ से दस साल लगातर इन खानों में काम करने के बाद मजदूर की तबीयत धीरे- धीरे बिगड़ने लगती है। फिर वह इन खानों में काम के लायक नहीं रहताए ऐसे मजदूरों की खान मालिक छुट्टी कर देते हैं।

ये अकेले इस गांव की तस्वीर नहीं है। इस गांव के पास आधा दर्जन गांवों में सिलिकोसिस का ये तांडव है। पत्थर की ये खानें बेशक ग्रामीणों के लिए रोजगार का बड़ा जरिया होंए लेकिन खानों से निकलने वाली सिलिका मजदूरों की जिंदगी और परिवार के लिए दुश्मन साबित हो रही है। दवाइयों के सहारे इस बीमारी को थोड़े समय के लिए दबाया जा सकता है लेकिन इससे छुटकारा नहीं पाया जा सकता। इस बीमारी से बचने के लिए सिलिका की धूल उड़ने वाली जगहों पर पानी का बराबर छिड़काव होना चाहिए और वहां ड्राइ एयर फिल्टरिंग सिस्टम भी होना चाहिए। गुड़ खाने से भी इस बीमारी पर लगाम लगाई जा सकती है लेकिन ये इंतजाम करने की सुध न तो खान मालिकों को है और न प्रशासन-सरकार को। नतीजा विधवाओं के गांव बढ़ते जा रहे हैं।
डेटलाइन इंडिया से साभार

4 comments:

विनोद कुमार पांडेय said...

सरकार को इस मुद्दे पर कुछ ध्यान देना चाहिए सबको जीने का अधिकार है..

परमजीत बाली said...

सरकार तो सोई ही रहती है....उसे इस से कोई फर्क पड़ने वाला नही....लेकिन यदि मीडिया इन की समस्या को जोर शोर से उठाए तो सरकार हो सकता है कुछ ध्यान दे....

अनिल कान्त : said...

कब तक सोता रहेगा मीडिया, ये सरकार और कारखानों के मालिक.
आपका लेख एक अच्छा कदम है

Bhavesh (भावेश ) said...

अगर सरकार ने आरक्षण के नाम पर जातिवाद और बंटवारे का खेल खेलने की बजाये इस तरह के मुद्दों और गरीबो की इन तकलीफों पर ध्यान दिया होता तो शायद आज देश का भाग्य कुछ और ही होता.