Friday, March 13, 2009

वार पर वार पवार

मृगेंद्र पांडेय

केंद्र और क्रिकेट की राजनीति में खासा दखल रखने वाले मराठा छत्रप शरद पवार की खासियत सुर्खियों में रहना है। महाराष्ट्र में उनकी पार्टी के दमखम और उनके नेतृत्व कौशल का ही परिणाम है कि इस लोकसभा चुनाव में सहयोगी पार्टी कांग्रेस को आधी-आधी सीटों पर समझौता करने पर बाध्य होना पड़ सकता है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने भले ही पिछले लोकसभा चुनाव में 11 सीटों पर ही परचम लहराया हो, लेकिन प्रदेश के बदलते राजनीतिक समीकरण ने शरद पवार को खासा मजबूत किया है। प्रदेश में कमजोर कांग्रेस और शिवसेना में बिखराव के बाद पवार का ग्राफ तेजी से बढ़ा है।


महाराष्ट्र में शिवसेना के विघटन और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के उत्पात के बाद उपजे राजनीतिक समीकरण में शरद पवार और उनकी पार्टी का कद प्रदेश में बढ़ा है। ऐसा माना जा रहा है कि मनसे के उपद्रव का फायदा भी कांग्रेस गठबंधन को मिलेगा। पूरे देश में एक साथ गठजोड़ कर चुनाव लड़ने की वकालत करने वाले पवार को प्रदेश में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार खड़े करने के बाद दिक्कतों को सामना करना पड़ सकता है। केंद्र में कृषि मंत्री रहने के कारण किसानों के णों को माफ कराने का श्रेय भी पवार और उनकी पार्टी ही ले रहीं हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों खासकर विदर्भ और मराठवाड़ा में पार्टी को कोई खास फायदा होता नजर नहीं आ रहा है। यही कारण है कि लाख चाहने के बावजूद पवार खुद मैदान में है। हालांकि उन्होंने अपनी परंपरागत सीट बारामती बेटी सुप्रिया के लिए छोड़ रखी है।


महाराष्ट्र की बारामती विधानसभा सीट से 1967 में राजनीतिक करियर की शुरुआत करने वाले पवार इस समय यहीं से ही सांसद है। कुछ साल पहले तक बारामती की गिनती पिछड़े और कृषि आधारित क्षेत्रों में होती थी, लेकिन पवार के सांसद बनने के बाद से उसकी गिनती पश्चिम महाराष्ट्र के सबसे औद्योगिक क्षेत्र के रूप में होनी लगी। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के विश्वासपात्र रहे पवार को राजीव गांधी की हत्या के बाद नरसिम्हाराव और अर्जुन सिंह के साथ प्रधानमंत्री के तीन प्रबल दावेदारों में माना जाता था। केंद्र की राजनीति में आने के बाद पवार पर कई अपराधियों से सांठगांठ का आरोप भी लगा, लेकिन आरोपों की परवाह किए बगैर पवार आगे ही बढ़ते गए। उनके राजनीतिक सयानेपन की मिसाल यह है कि सोनिया से बगावत कर राकांपा बनाने वाले पवार सोनिया के मददगार बने। और कांईयांपन की मिसाल यह है कि कांग्रेस को महाराष्ट्र में नाको चने चबवा रहे हैं। वैसे उनके सिपहसलार छगन भुजबल की बाला साहब ठाकरे से बढ़ती नजदीकियां उन्हें परेशान किए हुए है। यह अलग बात है कि बड़े ठाकरे उनके साथ होंगे अगर प्रधानमंत्री पद की उनकी दावेदारी पुख्ता होती है तो।

1 comment:

सतीश चंद्र सत्यार्थी said...

बहुत ही अच्छा विश्लेषण किया है महाराष्ट्र की तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों का.
इस चुनाव के दौरान अन्य राज्यों पर भी आपकी आलेखों का इंतज़ार रहेगा.
शुभकामनाएं.