Friday, February 20, 2009

पाकिस्तान: विघटन का अंदेशा

यह भी एक विडंबना है कि तालिबान के जिस गुट से सरकार ने समझौता किया है उसका मुखिया पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या के आरोपियों में से एक है।

राजीव पांडे

आम बजट की सुर्खियों में एक खास खबर लगभग दब कर रह गई कि पाकिस्तान सरकार ने एक तरह से तालिबान के सामने घुटने टेक दिए हैं। यह खबर थी कि पाकिस्तान ने नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्राविंस में शांति स्थापना के नाम पर तालिबान के साथ समझौता कर लिया है कि अब मलकंड क्षेत्र के दो जिले, जिसमें स्वात घाटी भी शामिल है वहां अब इस्लामिक कानून शरिया लागू किया जाएगा और सरकार वहां अपनी सैनिक कार्रवाइयों पर रोक लगा लेगी।

यह वही स्वात घाटी है, जिसकी तुलना कभी स्विटजरलैंड से की जाती थी अैार अब इसे मौत की घाटी के नाम से जाना जाने लगा है। तालिबानों ने यहां अपनी खूंरेजी से ऐसी दरिदंगी दिखाई है कि यहां के लगभग 15 लाख लोगों में से करीब तीन लाख लोग अपना घर-बार छोड़ कर जाने के लिए बाध्य हो गए। यह एक विडंबना है कि तालिबान के जिस गुट के साथ समझौता किया गया है वह मुल्ला फजलुल्लाह का है, जिनका नाम पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या के आरोपियों में शामिल है। इस पंद्रह सूत्री समझौते पर तालिबान के जिन नेताओं ने दस्तखत किए उनमें मुल्ला फजलुल्लाह के ससुर कट्टरपंथी नेता मौलाना सूफी मोहम्मद शामिल थे। इस पंद्रह सूत्री समझौते के जो प्रमुख हिस्से हैं उनमें यह साफ किया गया है कि स्वात तथा मलकंड जिलों में पूरी तरह से शरिया कानून लागू किया जाएगा, पाकिस्तान अपनी सेना को इस क्षेत्र से धीरे-धीरे हटा लेगा, तालिबान सरकार की बात मानेगा और सुरक्षाबलों के साथ मिलकर काम करेगा, तालिबान अपने प्रशिक्षण केंद्रों को बंद कर देगा, राकेट तथा मोर्टार जसे भारी हथियार प्रशासन को सौंपेगा तथा उसके लड़ाके सार्वजनिक रूप से हथियार लेकर नहीं चलेंगे।

पाकिस्तान में बढ़ती फिदायीन गतिविधियों को देखते हुए इस समझौते में इस बात को भी शामिल किया गया है कि तालिबान आत्मघाती हमले की घटनाओं की खुलकर निंदा करेगा। यह पहली बार नही है कि पाकिस्तान ने तालिबान के साथ कोई शांति समझौता किया है। इससे पहले बाजौर क्षेत्र के लिए भी एक शांति समझौता किया गया था लेकिन तालिबान ने इस समझैाते की अवहेलना कर इसका इस्तेमाल केवल अपनी ताकत बढ़ाने के लिए ही किया।

अब यह एक तरह से सब कुछ साफ होता जा रहा है कि पाकिस्तान में असली सत्ता किसके पास है और कौन इस तरह के महत्वपूर्ण फैसले ले रहा है। तालिबान के सेना तथा पाक गुप्तचर संस्था आईएसआई के साथ रिश्ते किसी से छिपे नही हैं। कुछ दिन पहले ही सरकार की ओर से यह साफ कर दिया गया था कि सेना को स्वात और वजीरिस्तान जसे इलाकों से बिल्कुल नहीं हटाया जाएगा, जहां तालिबान ने अपना राज कायम किया हुआ है। इस बयान के तुरंत बाद हुए इस समझौते ने तालिबान की बढ़ती ताकत और उसके सेना व आईएसआई के रिश्तों को आईने की तरह साफ कर दिया है। इस घटनाक्रम में पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी का यह बयान सच्चाई के बहुत पास है कि पाकिस्तान अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है क्योंकि तालिबान का दबदबा बढ़ता ही जा रहा है। उनका कहना था कि तालिबान ने पाकिस्तान के कबायली इलाके के बड़े क्षेत्र पर अपनी चैाधराहट स्थापित कर ली है और अब वह अपने पैर फैलाने लगा है।

पाकिस्तान ने एक तरह से तालिबान को अपनी ताकत बढ़ाने के लिए एक और सुनहरा अवसर दे दिया है। यह कदम भारत और अफगानिस्तान के लिए तो परेशानियां बढ़ाएगा लेकिन पाकिस्तान के लिये यह खतरे की घंटी है। पाकिस्तानी मामलों के विशेषज्ञ तो इस मामले को बहुत गंभीरता से देख रहे हैं क्योंकि उनके विचार में यह पाकिस्तान के विखंडन की शुरुआत भी हो सकती है। तालिबान और सेना के रिश्तों के बारे में हाल ही में अमेरिका के पत्रकार डेविड सेंगर की किताब ‘द इनहेरिटेंसज् में जो कहा गया है वह बहुत सनसनीखेज है। इस किताब मे तो यह भी आरोप लगाया गया है कि पाक सेनाध्यक्ष जनरल अशफाक परवेज कियानी की एक तालिबान नेता के साथ बातचीत को अमेरिकी गुप्तचर एजेंसियों ने बीच में सुना है, जिसमे उन्हें यह कहते बताया गया कि तालिबान तो पाकिस्तान की ताकत है। इसके अनुसार तालिबानी ठिकानों पर हमले से पहले ही सेना तथा आईएसआई उन्हें आगाह कर देती थी कि अमेरिका उस खास इमारत को अपना निशाना बनाने जा रहा है और यदि उनका कोई बडा नेता वहां है तो उसे तत्काल हटने को क ह दिया जाए।


इस तरह की सूचनाओं के मिलने के बाद ही अमेरिका ने तालिबानी ठिकानों पर ड्रोन से हमले शुरू किए। अमेरिका सहित आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे सभी देशों को यह समझ लेना चाहिए कि जब तक पाक सेना और आईएसआई का तालिबान को समर्थन तथा सहयेाग मिलता रहेगा तब तक पाकिस्तान की आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई पूरी तरह से बेमानी होगी। जब तक तालिबान को खत्म नहीं किया जाता तब तक आतंकवाद की रीढ़ नहीं तोड़ी जा सकती। पाकिस्तान सरकार को भी यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि यदि उसने तालिबानीकरण के खिलाफ ठोस कदम नही उठाए तो उसे सचमुच अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़नी पड़ेगी।

1 comment:

अंशुमाली रस्तोगी said...

तालिबान और पाकिस्तान में कहीं कोई फर्क नहीं। सिर्फ नाम ही काफी है।