Tuesday, October 13, 2009

हर जगह खॊज लेते हैं हाथी


मृगेंद्र पांडेय

हरियाणा महाराष्ट्र और अरुणाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव समाप्त हॊ गया। हरियाणा में कांग्रेस इनेलॊद भाजपा के बीच मुकाबला है तॊ महाराष्ट्र में कांग्रेस शिवसेना भाजपा और मनसे के बीच मुकाबला है। सभी विश्लेषक यहां एक ऐसी पार्टी कॊ भूल रहे हैं जॊ उत्तर प्रदेश के बाहर वॊटकटवा के रुप में सभी दलॊं कॊ परेशान किए हुए है। बहन मायावती के खिलाफ सुप्रीम कॊर्ट भले ही कितना सख्त हॊ लेकिन उनके वॊटर हाथी हर जगह खॊज लेते हैं।

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में २८१ उम्मीदवारॊं कॊ मैदान में उतारा है। मायावती की रैली मे कार्यकर्ता प्रचार के दौरान हाथी आया हाथी आया चिल्लाते दौडते नजर आए। यहां विदर्भ में बसपा की सीट निकालने की उम्मीद है। राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि इस चुनाव में बसपा कॊ कांशीराम के बामसेफ और डीएस४ का समर्थन मिल रहा है जॊ वॊटकटवा कॊ विजेता में भी बदल सकता है।

हरियाणा में भले ही बसपा का समझौता नहीं हॊ पाया लेकिन दलित मुख्यमंत्री का नारा काम करता नजर आ रहा है। यहां कांग्रेस भले ही स्पष्ट बहुमत पा ले लेकिन भाजपा और इनेलॊद कॊ कई सीटॊं पर मुंह की खानी पड सकती है। इन सब के लिए कांग्रेस का चुनाव प्रचार या विकास जिम्मदार नहीं हॊगा बल्कि जिम्मेदार हॊंगे बसपा के काटे वॊट।

दरअसल यहां यह स्पष्ट करने की कॊशिश की जा रही है कि हर चुनाव की तरह बसपा के बारे में बात करने से बचने वाली मीडिया कॊ इस बार भी परिणाम आने के बाद बहन जी के लिए गुणगान के दॊ शब्द तॊ जरूर कहने हॊंगे। यह सब हॊगा उनके उन वॊटरॊं के कारण जॊ हाथी कॊ कहीं भी खॊज लेते हैं।

अफगानिस्तानः भारत पर हमले क्यों ?

सुभाष धूलिया

अफगानिस्तान में भारत पर हमले क्यों हो रहे हैं ? भारतीय दूतावास पर आत्मघाती हमला अगर उतना सफल हो गया होता जितनी योजना बनाई गई थी तो पूरे परिसर में तबाही मच गई होती. पंद्रह महीने पहले हुए हमले में 60 लोग मारे गए थे जिसमें 2 वरिष्ठ भारतीय राजनयिक शामिल थे. इससे पहले समय-समय पर अनेक विकास कार्यों में लगे भारतीय इंजीनियरों के अपहरण और हत्या की घटनाएं होती रही हैं.

भारत पर ये हमले तब हो रहे हैं जबकि यही एकमात्र ऐसा देश है जो अफगानिस्तान में चल रहे सैनिय अभियान में शामिल नहीं है और सड़क, स्कूल, अस्पताल, बिजली, बांध के निर्माण जैसे कार्यों में लगा हुआ है. 1989 में सोवियत संघ की पराजय के उपरांत उभरे सत्ता समीकरण में भारत का लगभग अफगानिस्तान से पलायन हो गया था और भारत-अफगान संबंध उत्तरी गठजोड़ को भारतीय मदद तक ही सीमित हो गया था. काबुल में मुजाहिदीनों और बाद में तालिबानों की सत्ता कायम हो चुकी थी जिन्हें भारत मान्यता तक नहीं देता था. लेकिन इस अपवाद को छोड़कर अफगानिस्तान के साथ हमेशा ही बहु-आयामी संबंध रहे हैं और दोनों देशों के बीच गहरा सांस्कृतिक लगाव है. 1950 में दोनों देशों के बीच मैत्री और सहयोग की संधि हुई थी. इसके विपरीत अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान के संबंध मुजाहिदीन और तालिबानी शासनकाल को छोड़कर कभी भी अच्छे नहीं रहे हैं. यहां तक कि 1947 में देश के बंटवारे के वक्त बलूच बहुत सहरदी सूबे और पख्तूनों में पाकिस्तान में शामिल होने के सवाल पर विरोध था.

9/11 के बाद अमेरिका ने सैनिक हस्तक्षेप से तालिबान सरकार को ध्वस्त कर दिया और एक बार फिर भारत ने अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में साझीदार बनकर अफगानिस्तान में प्रवेश किया. अफगानिस्तान में अमेरिकी युद्ध को 8 साल पूरे हो गए हैं और अमेरिका केवल पाकिस्तान के साथ मिलकर सैन्य अभियान के बूते पर इस्लामी उग्रवाद को पराजित करने पर केन्द्रित रहा है. वहीं भारत ने अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है. अफगानिस्तान की मौजूदा सत्ता भले ही कितनी ही कमजोर और प्रभावहीन हो लेकिन भारत के साथ संबंधों को लेकर इसका वृहत सकारात्मक रुख रहा है और अफगानिस्तान में उग्रवादी हिंसा को लेकर इसने समय-समय पर पाकिस्तान को आड़े हाथों लिया है. भारतीय दूतावास पर हमले को लेकर भी अफगान सरकार ने भी लगभग स्पष्ट रूप से कहा है कि इसके पीछे पाकिस्तान स्थिति उन उग्रवादियों का हाथ है जिन्हें पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का संरक्षण प्राप्त है.

हांलाकि पिछले सप्ताह भारतीय दूतावास पर हमले के अलावा पाकिस्तान में पेशावर में एक आतंकवादी हमले में 80 लोग मारे गए; रावलपिंडी में पाकिस्तान के सैनिक मुख्यालय पर एक बड़ा आतंकवादी हमला हुआ है; और, अमेरिकी सेना पर एक हमले में 8 सैनिक मारे गए. लेकिन इन तमाम आतंकवादी हमलों को एक ही तराजू पर नहीं तौला जा सकता और भारतीय दूतावास पर हुए हमलों में आईएसआई का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से शामिल होने के तार्किक कारण हैं. अनेक कारणों से हाल के वर्षों में अफगानिस्तान में भारत का प्रभाव बढ़ रहा है. अफगानिस्तान में भारत के प्रभाव को लेकर पाकिस्तान हमेशा ही चिंतित रहा है. अमेरिकी युद्ध में पाकिस्तानी सेना की भूमिका के कारण अमेरिकी प्रशासन का एक हिस्सा भी भारत को अफगानिस्तान से दूर रखना चाहता है.

यह आश्चर्य की बात है कि अमेरिका एक ओर तो हमेशा यह कहता आया है कि अफगानिस्तान में स्थिरता कायम करने में पाकिस्तान के अलावा भारत, ईरान, रूस और चीन सबके हित जुड़े हुए हैं. लेकिन पिछले आठ वर्षों में अमेरिका पाकिस्तान के साथ मिलकर सैनिक ताकत के बल पर ही समाधान ढूंढ़ रहा है और इस संकट के क्षेत्रीय समाधान की निरंतर उपेक्षा करता रहा है. यह और भी आश्चर्य की बात है कि अमेरिका इस्लामी उग्रवाद को पराजित करने के अपने अभियान में भारत को संबद्ध करने से बचता ही नहीं रहा है बल्कि इससे दूरी बनाकर पाकिस्तान के सैनिक प्रतिष्ठान को रिझाने की कोशिश करता रहा है. भारत पर हो रहे हमलों का मकसद अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में भारतीय प्रयासों को सीमित करना है. यह आश्चर्य की बात है कि भारतीय प्रभाव में पाकिस्तान और इस्लामी उग्रवादियों को जो खतरे दिख रहे हैं उनके प्रति अमेरिका उदासीन ही नहीं बल्कि नकारात्मक रहा है.

आठ वर्ष युद्ध के बाद भी अमेरिका अफगानिस्तान को समझने में विफल दिखाई प्रतीत होता है. यह वही अफगानिस्तान है जहां सोवियत महाशक्ति को 10 वर्ष के युद्ध के बाद पराजय झेलनी पड़ी थी. यह वही अफगानिस्तान है जिस पर कब्जा करने के ब्रिटिश साम्राज्य के तीन प्रयास विफल रहे थे. इसलिए इस देश को, ‘साम्राज्यों का कब्रिस्तान’ भी कहा जाता है. ओबामा प्रशासन अफगानिस्तान-पाकिस्तान को लेकर नई रणनीति बनाने पर जुटा हुआ है और इस मसले पर तीखे मतभेद उभर रहे हैं. विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने कहा है कि अमेरिका कुछ तालिबानी तत्वों के साथ सहयोग का अध्ययन कर रहा है. काफी समय से ‘उदार’ तालिबान के साथ सहयोग की बातें चल रही हैं.

निश्चय ही अफगानिस्तान की समस्या के किसी भी राजनीतिक समाधान के लिए करजई सरकार एकदम अपर्याप्त है और अफगानिस्तान में ऐसी राजनीतिक शक्तियों का उभरना जरूरी है जो तालिबान जैसे इस्लामी उग्रवादियों से लड़ सके. निश्चय ही तालिबानी का एक धड़ा इस तरह की राजनीतिक शक्ति के रूप में उभर सकता है क्योंकि यह कहना सही नहीं होगा कि विदेशी सैनिक आधिपत्य से लड़ने वाला हर अफगानी उग्रवादी है. इन अफगान लड़ाकों में राष्ट्रवादी भी शामिल हैं. लेकिन इस तरह की राजनीतिक शक्तियां शून्य में पैदा नहीं हो सकती हैं. इस तरह की शक्तियों के उभरने के लिए एक सामाजिक आधार को विकसित करना आवश्यक है और यह तभी हो पाएगा जब बंदूकों की नालें थोड़ी नीची कर दी जाएं और भारत जैसे देशों को लेकर एक स्थानीय समाधान की तरफ ध्यान दिया जाए. नई अफगान रणनीति को लेकर ओबामा प्रशासन के सैनिक धड़े और राजनीतिक नेतृत्व के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई है. अफगानिस्तान में अमेरिकी कमांडर जनरल स्टेनली मेक्रिस्टर ने 40 हजार और सैनिकों की तैनाती की मांग की है और कहा है कि अगर ऐसा नहीं होता तो अफगानिस्तान में अमेरिका का मिशन एक साल में विफल हो जाएगा यानी अमेरिका पराजित हो जाएगा. मेक्रिस्टर अफगानिस्तान के चप्पे-चप्पे में जमीनी सैनिक अभियान चलाकर तालिबान को ध्वस्त करना चाहते हैं. दूसरी ओर यह तर्क दिया जा रहा है कि अफगानिस्तान में अल कायदा का लगभग सफाया हो चुका है और केवल पाकिस्तान में ही अल कायदा के गढ़ बचे हुए हैं. यह तर्क दिया जा रहा है कि तालिबान अमेरिका के लिए अल कायदा जैसा खतरा नहीं है इसलिए अमेरिकी रणनीति पाकिस्तान में अल कायदा के अड्डों को ध्वस्त करने पर केन्द्रित होनी चाहिए. उप-राष्ट्रपति जो बिदेन जमीनी सैनिक अभियान की बजाय पाकिस्तान में स्थित आतंकी ठिकानों पर हवाई हमले और पाकिस्तानी जमीन पर विशेष सैनिक दस्तों के हमले की पैरवी कर रहे हैं. जनरल मेक्रिस्टर द्वारा सुझाई जा रही रणनीति भले ही एक जटिल समस्या को सैनिक विजय तक सीमित करती हो लेकिन उनके इस तर्क में काफी दम है कि मौजूदा स्थिति के चलते एक वर्ष में अमेरिका यह युद्ध हार जाएगा और अल कायदा और तालिबान को अलग करके नहीं देखा जा सकता. जनरल मिक्रेस्टर तालिबान का सफाया कर देना चाहते हैं तो बिदेन अल कायदा पर केन्द्रित होने के पक्षधर हैं.

अमेरिकी रणनीति का हर विकल्प युद्ध के विस्तार की ओर उन्मुख है और अफगान समस्या के वास्तविक समाधान से भटक रही है. पाकिस्तानी जमीन पर हमलों से पाकिस्तान में तूफान खड़ा हो जाएगा और जमीनी सैनिक अभियान से बड़े पैमाने पर आम लोग मारे जाएंगे.

शांति का नोबेल पुरस्कार पाने के बाद ओबामा व्हाईट हाउस में अपने सभाकारों और सैनिक जनरलों के साथ मिलकर एक नए युद्ध की रणनीति तैयार कर रहे हैं. लेकिन अब भी उस सब से बच रहे हैं जिसके रास्ते अफगान युद्ध में विजय के साथ-साथ इस देश में किसी तरह का कोई स्थायित्व पैदा हो सकता है. कोई ऐसी सत्ता उभर सकती है जो सीमित अर्थों में ही सही अफगान लोगों की आशाओं-आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती हो. अमेरिका को अपनी विजय को परिभाषित करना होगा. मौजूदा परिस्थिति में इस उम्मीद से परहेज क्यों किया जाए कि नोबेल शांति विजेता सैनिक विजय के बाद के अफगानिस्तान को भी देख सकेगा जिसे शांति और स्थायित्व की बेहद दरकार होगी और यह भी पहचान कर पाएगा कि इस तरह के अफगानिस्तान के निर्माण में उसके सहयोगी कौन हो सकते हैं ? युद्ध सिर्फ युद्ध के लिए नहीं लड़े जाते, इनका मकसद शांति भी होता है.

Monday, October 12, 2009

ओबामा शांतिदूत, क्यों मनमोहन में कांटे लगे थे


-रीतेश

12 दिन के लिए नोबेल. ये नोबेल का अपमान है या पतन, ये कहे बिना मैं इतना कहना चाहूंगा कि अगर ईरान के खिलाफ आग न उगलने या चीन के डर से नोबेल शांति पुरस्कार के ही दूसरे विजेता दलाई लामा तक से मिलने से मुंह चुराने वाले को इस लायक समझा गया है तो यह रॉयल फाउंडेशन की गंभीरता पर चोट है.

अगर विश्व शांति के लिए इस साल किसी को नोबेल देना ही था तो अपने मनमोहन सिंह से बेहतर भला और कौन है. और कुछ नहीं तो कम से कम मुंबई हमले के बाद कुछ राजनीतिक दलों और कई समाचार संगठनों के संगठित हल्ला-बोल के बावजूद पाकिस्तान पर हमला न करना क्या विश्व शांति में कोई छोटा योगदान है.

पाकिस्तान पर भारत हमला करता तो कुछ और पड़ोसी मित्र का चोला उतारकर मैदान में देर-सबेर नहीं आ जाते, इसकी कोई गारंटी तो थी नहीं. मनमोहन सिंह ने इतनी दूरदर्शिता का परिचय दिया और पड़ोस में पड़े एक महाशक्ति को भारत पर हमला करने का कोई मौका नहीं दिया, ये क्या वैश्विक शांति में छोटा योगदान है.

आज भास्कर में गिरीश निकम जी ने लिखा है कि उनके पास भी विश्व शांति के लिए गजब का विजन है. उन्हें क्यों नहीं दिया जा रहा है नोबेल. ओबामा को भी तो विश्व को परमाणु हथियारों से मुक्ति दिलाने के विजन के लिए ही पुरस्कार दिया जा रहा है. और तो और, ओबामा ने क्या कहा, वो इस दिशा में लगातार काम करेंगे लेकिन उन्हें नहीं लगता कि उनके राष्ट्रपति रहते, यहां तक कि उनके जिंदा रहते, ऐसा हो पाएगा.

अब ऐसे नोबेल पुरस्कार पाने वाले को चूमने और बधाई देने के अलावा और क्या किया जा सकता है.

Thursday, October 8, 2009

हमारे कारण फैला नक्सलवाद


कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने स्वीकारा। कहा नक्‍सलवाद के लिए राज्‍य सरकार जिम्‍मेदार
मृगेंद्र पांडेय

राहुल गांधी ने देश में फैले नक्‍सलवाद के लिए राज्‍य सरकारों को जिम्‍मेदार ठहराया है। उन्‍होंने कहा है कि राज्‍य सरकारें लोगों तक अपनी पहुंच नहीं बना सकीं, जिसके परिणामस्‍वरूप नक्‍सलवाद कई राज्‍यों में तेजी से फैल रहा है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर यहां विकास का पैमाना क्या है। सवाल यह भी उठता है कि लंबे समय से प्रदेशॊं में सरकार किसकी है। अगर कांग्रेस लंबे समय तक सरकार में रही है तॊ बाबा स्पष्ट रूप से यह कहना चाहते हैं कि हम है नक्सलवाद के जनक।

बाबा कहते हैं जिन राज्‍यों में विकास को प्रमुख मुद्दा बनाया गया और विकास के साथ-साथ लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था रही वहां नक्सलवाद की समस्‍याएं नहीं आयीं। राजस्थान पश्चिमी उत्तर प्रदेश हरियाणा में कहां है विकास। खुफिया सूत्रॊं की मानें तॊ नक्सली तॊ दिल्ली में भी हैं। कॊबाड गांधी जैसे लॊगॊं की मौजूदगी यह बताती है कि विकास जहां हुआ है वहां भी नक्सली मौजूद हैं। तॊ क्या यह मान लिया जाए कि देश में कहीं विकास नहीं हुआ।

विकास के नाम पर सड़क, बिजली की ही बात होती है। नगरों और महानगरों में हॊ रहे विकास कॊ कितना असली माना जाए। इस विकास ने ही करॊडॊं लॊगॊं के रॊजगार छिन लिए। देश के दस बडे महानगर दिल्ली मुंबई कॊलकाता चेन्नई अहमदाबाद बेंगलुरु हैदराबाद जयपुर में सांस लेने के लिए साफ हवा तक मयस्सर नहीं है। पानी पीने से पहले दस बार सॊचना पडता है। पर्यावरण पहले से और ख़राब हुआ है. ख़राब पर्यावरण का असर है नक्सलवाद।

राहुल जी नक्सलवाद कॊ अगर समस्या के रूप में देखेंगे तॊ कभी सुलझा नहीं पाएंगे। क्यॊं आम आदमी अपनी गुहार लेकर नक्सली के पास जाता है। थानेदार से ज्यादा नक्सलियॊं पर हम क्यॊं करते हैं विश्वास। क्यॊं हम सभी कॊ खाना मुहैया नहीं करा पाते और वही नक्सली छिनकर उनके पेट भरने कॊ तैयार रहता है। आखिर क्यॊं गांव और आदिवासी इलाकॊं में ही पैदा हॊते ही करॊडॊं बच्चे दम तॊड देते हैं। क्या कभी आपने सॊचा है। अगर सॊचा है तॊ निवेदन है कि इस तरह के बयान देने से पहले इनके बारे में एक बार फिर सॊचें।

Tuesday, October 6, 2009

पहाड या रेत फिसलना तॊ पडेगा



मृगेंद्र पांडेय

रेगिस्तान से पहाड और पहाड से रेगिस्तान के बीच समतल जमीन पर जिसके पैर फिसल रहे हैं वह जसवंत हैं। ठाकुर जसवंत। गॊरखा जसवंत। और अब पहचान खॊजते जसवंत। दरअसल पहचान का संकट सबसे बडा संकट हॊता है। इससे निपटने के लिए आदमी तरह तरह के हथकंडे अपनाता हैं। जसवंत सिंह भी फिलहाल वही कर रहे हैं। उनकी सॊच। नई पुरानी आगे पीछे सब गडमगड हॊ गई है। उनकी हालत आज ऐसी है जैसी किसी अच्छी पीआर एजेंसी के बिना खरीदारॊं के हाथ से फिसलता साबुन।

हॊता तॊ वह अच्छा है लेकिन बिक नहीं पाता। या यूं कहें कि खरीदार उस तक पहुंच नहीं पाता। वह भी जाता है रेगिस्तान से पहाड और पहाड से रेगिस्तान। लेकिन समतल जमीन पर फिसलता रहता है। यहां भी पहचान का संकट है। पहचान ‌खॊजता साबुन। अगर निकल गया तॊ डॊव हॊ सकता है वरना जसवंत हैं न। भाजपा से निकाले जाने के बाद जसवंत और भी फिसलते जा रहे हैं।

एक नई पार्टी बनाने की यॊजना बना रहे हैं। उसमें उन लॊगॊं कॊ साथ रखेंगे जॊ अपनी पार्टी कॊ या तॊ दगा दे चुके है या पार्टी ने उन्हें दगा दे दिया है। इसमें उनके साथ झारखंड के नामधारी जी हॊंगे बिहार के दिग्विजय सिंह हॊंगे और भी ढेर सारे पार्टी के मारे लॊग हॊंगे। अब देखना यह हॊगा कि जसवंत की नई कवायद उनकॊ कितनी पहचान दिला पाती है। या यह कहें कि पहचान के लिए और कितनी कवायद करवाती है।

Monday, October 5, 2009

बढ गई एक और राजनीतिक बहू



मृगेंद्र पांडेय

हम भारतीयॊं की कॊशिश रहती है कि महिलाओं के खिलाफ कुछ कहने से बचे। मैं भी ऐसा ही हूं। लेकिन देश में आ रहे राजनीतिक बदलाव के बारे में अपनी बात कहे बिना रह नहीं सकता इसलिए कह रहा हूं। आप लॊग भी सॊंचे कि क्या यह जॊ हॊ रहा है वह सही है। अगर नहीं तॊ फिर इसका जवाब क्या हॊना चाहिए।

समाजवादी पार्टी कॊ फिरॊजाबाद से चुनाव मैदान में कॊई उम्मीदवार नहीं मिल रहा है। इसलिए नेताजी ने बहू कॊ मैदान में उतार दिया। सारी उम्र सर पर लाल टॊपी ढॊने वाले कल्लू यादव या फिर मुलायम की हर रैली में झंडा लेकर सबसे आगे खाडे रहने वाले पढे लिखे सचिन की बारी कब आएगी। जब मुलायम थे तब वे उम्मीदवार बने। उनका बेटा आया उसकी भी रैली में हम ही झंडा उठाकर दौडे। अब बहू की रैली में भी पॊस्टर हमारे हाथ की साटेंगे। आखिर कब आएगी हमारी बारी जब हमारी भी फॊटॊ पॊस्टर पर हॊगी। भैया और भाभी हमारा प्रचार करेंगे और हम उम्मीदवार हॊंगे। हमें भी तॊ हमारा हक देने की सॊंचे मुलायम जी। या अभी हमारी बारी नहीं आई।

राहुल गांधी यह कहकर नहीं बच सकते की वह सिस्टम की पैदाइश है। उनके पास और कॊई चारा नहीं है। मुलायम कॊ बेट बहू भाई भतीजा के आगे कॊई नजर नहीं आता। हरियाणा में चुनाव लडने वाले ५१ फीसदी करॊडपति है। महाराष्ट्र में कॊई राजनीतिक परिवार नहीं बचा जिसका बेटा चुनाव मैदान में नहीं उतरा। जिसका बेटा लायक नहीं उसने अपनी बेटी कॊ मैदान में उतार दिया। आखिर कब तक चलेग । यह सब। कब जागेंगे हम ।

Friday, October 2, 2009

स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए खतरनाक गृह मंत्रालय की सक्रियता

आनंद प्रधान

गृहमंत्री पी चिदम्बरम की अगुवाई में गृह मंत्रालय कुछ ज्यादा ही सक्रिय हो गया है। इस अधिक और दायरे से बाहर जा रही सक्रियता का ताजा उदाहरण है- प्रमुख अंग्रेजी दैनिक ’द टाइम्स आफ इंडिया’ के दो पत्रकारों के खिलाफ इस आरोप में प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज कराने का फैसला कि उन्होंने भारत-चीन सीमा पर चीनी सैनिकों और भारत तिब्बत सीमा पुलिस (आइटीबीपी) के बीच कथित फायरिंग में आइटीबीपी के दो जवानों के ’घायल’ होने की मनगढंत खबर दी। गृह मंत्रालय का यह फैसला न सिर्फ हैरान करनेवाला और अपनी सीमा लांघनेवाला है बल्कि उसमें स्वतंत्र पत्रकारिता के खिलाफ बदले की भावना की बू भी आती है। अगर खुद गृह मंत्रालय इस तरह से पत्रकारों के खिलाफ बात-बात पर एफआईआर दर्ज कराने लगेगा तो इससे न सिर्फ प्रेस परिषद जैसी वैद्यानिक संस्था बेमानी हो जाएगी बल्कि पत्रकारों के लिए ’बिना किसी भय या लोभ’ के स्वतंत्र पत्रकारिता करना भी मुश्किल हो जाएगा।

लेकिन यह कहने के बाद समाचार मीडिया के बड़े हिस्से के इस व्यवहार पर भी बात करना जरूरी है जो स्वतंत्र और जिम्मेदार पत्रकारिता के दायरे में नहीं आता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि पत्रकारों पर एफआईआर दर्ज कराने का गृह मंत्रालाय का फैसला जितना हैरान करने और अपनी सीमा लांघनेवाला है उससे कम चिंचित और हैरान करनेवाला व्यवहार समाचार मीडिया का नहीं है जिसने पिछले कुछ सप्ताहों चीन के खिलाफ एक सुनियोजित सा दिखनेवाला संगठित प्रचार (प्रोपेगैंडा) अभियान छेड़ रखा है। इस अभियान के तहत कथित चीनी घुसपैठ की खबरों को न सिर्फ बहुत बढ़ा चढ़ाकर दिखाया और बताया जा रहा है बल्कि कुछ बिल्कुल झूठी और मनगढंत (उदाहरण के लिए चीनी सेना और आइटीबीपी के बीच फायरिंग) खबरें भी दी जा रही हैं। यह सचमुच,हैरान और संदेह पैदा करनेवाली बात है कि अचानक ऐसा क्या हुआ कि समाचार मीडिया के एक हिस्से में चीन विरोधी खबरों की न सिर्फ भरमार हो गयी बल्कि उन्हें इस तरह से उछाला जा रहा है?

हद तो यह हो गयी कि समाचार मीडिया के एक हिस्से ने चीन के खिलाफ एक तरह का युद्वोन्मादी माहौल तैयार करना शुरू कर दिया। निश्चय ही, यह किसी भी तरह से जिम्मेदार पत्रकारिता नही है। इस पत्रकारिता में न सिर्फ पत्रकारिता के बुनियादी उसूलों यानी तथ्यों की शुद्धता, वस्तुनिष्ठता, संतुलन और निष्पक्षता का ध्यान नही रखा जा रहा है बल्कि इसमें कुछ निहित स्वार्थो और हित समूहों के एजेंडे को आगे बढ़ाने की मंशा के साथ चीन विरोधी प्रोपेगैंडा अभियान चलाया जा रहा है। कहने की जरूरत नही है कि इस तरह के अभियानों से दो देशों के संबंधों पर कितना बुरा असर पड़ रहा है। अफसोस की बात यह है कि भारतीय मीडिया के बड़े हिस्से में आमतौर पर पाकिस्तान और अक्सर चीन के खिलाफ चलाये जा रहे इन अभियानों के कारण इन दोनों पड़ोसी देशों के साथ भारत के पहले से चले आ रहे जटिल संबंधों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया कितनी कठिन हो गयी है।

यह भी सच है कि इस तरह का माहौल बनाने में सरकार और राजनीतिक दलों की भी भूमिका भी कम जिम्मेदार नहीं है। चीन के मामले में ही जितनी खबरें छपी वे सत्ता प्रतिष्ठान के अंदर से ही निकली और उनका खंडन करने में सरकार ने जानबूझकर बहुत देर लगाई। सच तो यह है कि इस मामले में सरकार और सरकार से बाहर बैठे लोगों ने मीडिया का इस्तेमाल किया। और उसके बाद उसे ही जिम्मेदार भी ठहरा दिया। लेकिन सवाल यह है कि मीडिया ने इसका मौका ही क्यों दिया ?