Wednesday, July 28, 2010

पूरे गणतंत्र की मौत है जेठवा की मौत

जब भी देश में एक इमानदार,सत्य,न्याय तथा देशभक्ति के साथ पारदर्शिता के लिए काम कर रहे किसी व्यक्ति को मारा जाता है तो वह उस व्यक्ति कि नहीं बल्कि पूरे गणतंत्र,देश के राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री कि मौत होती है |
अहमदाबाद हाईकोर्ट के सामने शाम 8:30 से 8:45 के बीच दो मोटरसाइकिल सवारों के द्वारा गोली मारकर एकबार फिर एक सच्चे हिन्दुस्तानी तथा RTI कार्यकर्ता अमित जेठवा को मार दिया गया | इस बार भी इस देशभक्त कि हत्या का आरोप देश के भ्रष्ट जनप्रतिनिधियों पर है जो इसबार BJP से जुड़ा हुआ है और जिसके अवैध खनन के करतूतों को अमित जेठवा उजागर करने पे तुले हुए थे |

निश्चय ही अमित जेठवा जैसे लोगो कि मौत इस देश के गणतंत्र ,राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री कि मौत है | क्योंकि अमित जेठवा जैसे लोग इस देश के राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री से भी महत्वपूर्ण काम कर रहे होते हैं और ऐसे लोगो कि मौत पूरे देश के लिए शर्मनाक है | अमित जेठवा कि मौत पर देश के कर्ताधर्ता को दोषियों को पकरने के लिए वैसे ही हरकत में आना होगा जैसे किसी देश के प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति कि मौत पर हरकत में आते हैं ,तब जाकर ऐसे मौतों का सिलसिला रुकेगा |

अमित जेठवा कि मौत से देश में पारदर्शिता व सूचना के अधिकार के कानून कि मौत एकबार फिर हुयी है | हमारा आग्रह इस देश के राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री से है कि अमित जेठवा के हत्यारे को तिन दिनों में पकड़कर सजा दी जाय या अहमदाबाद के पुलिस आयुक्त को नौकरी से हटाया जाय क्योंकि इस तरह कि हत्या पुलिस अधिकारियों कि गंभीर लापरवाही से ही होते हैं और गणतंत्र रोता है |

जनॊक्ती से साभार

Monday, June 14, 2010

सारा देश भोपाल के साथ, हम किसका मुंह तक रहे हैं?

कल्पेश याग्निक

मुट्ठी भर मठाधीश, पांच लाख निर्दोषों को छल रहे हैं। पूरे 26 बरस से। तब ये बेगुनाह निर्ममता से बर्बाद कर दिए गए। अब निर्लज्जता से प्रताड़ित किए जा रहे हैं। कानून के नाम पर। किंतु अन्याय की सीमा होती है। न्याय करने वाले हर व्यवस्था में होते ही हैं। दुखद यह है कि उन्हें झकझोरना पड़ता है। भोपाल गैस त्रासदी मामले में अदालती आदेश के बाद ऐसा करने का समय आ गया है।

दो ही विकल्प हैं। या तो सुप्रीम कोर्ट अपने ही स्तर पर 1996 में जस्टिस ए.एम.अहमदी की कलम से बदलीं, कमजोर कर दी गईं धाराओं की समीक्षा करे। या फिर केंद्र सरकार इस केस को फिर से खुलवाए। दोनों ही बातें संभव हैं। देश हित में हैं। हमें किंतु इसके लिए आक्रामक मुद्रा अपनानी होगी। तंत्र से लड़ाई आसान नहीं होती। किंतु जहरीली गैस की भयावह यादों को सीने में दबाए, इतने बरसों से हर पल, हारी-बीमारी-बेकारी-बेबसी से लड़ ही तो रहे हैं हम। एक और लड़ाई।

अब कुछ पथरीले, खुरदुरे व्यावहारिक सच। जब चारों ओर मौत फैली थी तब लोकतंत्र के तीनों स्तंभों में कहीं गर्जना नहीं उठी कि यूनियन कार्बाइड के दोषी वॉरेन एंडरसन को ऐसे रहस्यमय ढंग से छोड़ क्यों दिया? एक मामूली वाहन चालान बनने पर भी पुलिस डपटती है कि थाने चलो- यहां 25 हजार मौतों के जिम्मेदार की जैसे राजकीय अतिथि सी सेवा की गई। वो भी मुख्यमंत्री के स्तर पर। वो भी प्रधानमंत्री को विश्वास में लेकर। उस दिन की वीडियो क्लिप में यदि आप गौर से देखें तो लग ही नहीं रहा कि अर्जुन सिंह किसी सादे से हादसे का भी मुकाबला करके आए हों। बड़े ही आत्मविश्वास और प्रभावी शैली में वे पत्रकारों से त्रासदी को लेकर बात कर रहे थे। साथ बैठे राजीव गांधी गंभीर तो दिख रहे हैं लेकिन पूरी तरह अजरुनसिंह से प्रभावित।


जाहिर है उन्होंने ही प्रधानमंत्री को मना लिया होगा। और यदि नहीं- तो वे राष्ट्र के सामने क्यों नहीं लाते कि भोपाल के गुनहगार को क्यों जाने दिया? क्यों? किसी को पता नहीं। क्योंकि किसी ने इन्हें झंझोड़ा नहीं। पक्ष तो होता ही है रीढ़ की हड्डी के बिना। विपक्ष को क्यों सांप सूंघ गया था? और बाद में भी किसने कुछ किया? देखें एक नजर : नरसिंह राव सरकार ने उसे अमेरिका से बुलाने के प्रयास कमजोर कर दिए। अटल सरकार ने तो एक कदम आगे बढ़कर कार्बाइड के भारतीय प्रमुख केशुब महिंद्रा को पद्म पुरस्कार के लिए चुना।


दूसरी कड़ी हैं नौकरशाह। आज वे टीवी चैनलों पर एक-दूजे को दोषी सिद्ध करने की होड़ में लगे हैं। तब अपने पुंसत्व को ताक में रख गुपचुप उन्हीं आदेशों का पालन करने में लगे थे, जो उनकी आत्मा पर बोझ बन गए होंगे। पीसी अलेक्जेंडर, ब्रह्मस्वरूप, मोतीसिंह और क्या स्वराज पुरी? हर छोटी-बड़ी बात पर नोटशीट पर टीप लिखने के आदी। ‘पुनर्विचार करें, समीक्षा करें’ लिखकर हर फैसले में अंड़गा बनने के जन्मजात अधिकारी ये नौकरशाह आज किस मुंह से आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं?


तीसरी कड़ी है कानून के रखवालों की। चाहे केस तैयार करने वाली पुलिस-सीबीआई हो या फिर लड़ने वाला प्रॉसिक्यूशन हो या कि तत्कालीन न्यायमूर्ति हों। सभी पर प्रश्नचिह्न है। आखिर न्याय के सर्वोच्च ओहदे पर बैठे अहमदी ऐसा कैसे कर सकते हैं? सीबीआई, केंद्र या राज्य सरकार- कोई तो १९९६ के उस फैसले को चुनौती देता? इन सबसे हटकर बड़ा प्रश्न। सरकार चाहें तो क्या नहीं कर सकतीं। सुप्रीम कोर्ट ने तो अफजल गुरु को फांसी सुना दी है। चार साल हो गए। क्या हुआ?


सुप्रीम कोर्ट ने तो शाहबानो को गुजारा भत्ता दिए जाने का फैसला दिया था। सरकार ने एक कानून बनाकर उसे खत्म कर दिया। केरल के मल्लापेरियार बांध से तमिलनाडु पानी लेता था। सुप्रीम कोर्ट ने बांध की ऊंचाई बढ़ाने का फैसला दिया तो केरल ने विधानसभा में कानून बदलकर उस फैसले को निर्थक कर दिया। इंदिरा गांधी ने किस ताकत के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को अनदेखा किया था- वह देश को भलीभांति याद है। सब सरकार के हाथ में है। किंतु भोपाल के लाखों पीड़ितों के लिए कोई नेता, अफसर, कानून का रखवाला आगे न आया।
(कल्पेश याग्निक दैनिक भास्कर के नेशनल एडिटर हैं)

दैनिक भास्कर अतीत के अंधेरे को अपने करोड़ों पाठकों के माध्यम से मिटाना चाहता है। भोपाल त्रासदी में पहले दिन से भास्कर की कलम सिर्फ पीड़ितों के पक्ष और सत्ताधीशों की गलत बातों के विपरीत चली है। आज इस अभियान में सांसदों को, सरकार को, सुप्रीम कोर्ट को यदि हम एक पोस्टकार्ड लिखकर, याचिका लगाकर केस पुन: खुलवाने की आवाज उठाएंगे तो मानवता के बड़े अभियान में सहभागी होंगे। पीड़ितों को सफलता निश्चित मिलेगी। क्योंकि सारा देश उनके साथ है।

Wednesday, June 9, 2010

शून्य से शिखर तक तय हुआ सफर

उत्कर्ष शिविर की ऊंची उडान

बांसवाडा। देश में अपनी तरह के कदाचित अनूठे उपक्रम के तहत बांसवाड्ा के पुलिस विभाग द्वारा शिक्षा विभाग के सहयोग से 2007 में जनजाति क्षेत्र की दसवीं कक्षा में शून्य प्रतिशत परिणाम वाली छात्राओं के उन्नयन के लिए प्रारम्भ किया गया शिविर इस अभियान के तीसरे साल शिखर तक का सफर तय करने में कामयाब रहा। सत्र 2007-08 में तत्कालीन पुलिस अधीक्षक के.एल.बैरवा के व्यक्तिगत प्रयासों और विशिष्ट पहल पर सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों से बांसवाडा शहर में लाकर पढ्ाई जा रही बालिकाओं ने ऐसा परिणाम दिया है जिससे पुलिस और शिक्षा विभाग की बांछे खिली हुई है। इस सत्र में 12 वीं कक्षा में 15 छात्राएं सम्मिलित हुई थी और सभी उत्तीर्ण होकर शत प्रतिशत परिणाम दिया है। यही नही इन्ही छात्राओं में से एक 63 प्रतिशत अंकों के साथ प्रथम श्रेणी में भी उत्तीर्ण हुई है। शेष 14 द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण रही।

कभी ये सिफर के दायरे में थी

सत्र 2007-8 में तत्कालीन पुलिस अधीक्षक बैरवा जब इन बालिकाओं को लेकर बांसवाडा आए तब ये सभी बालिकाएं 10 व क क्षा में शून्य प्रतिशत परीक्षा परिणाम के साथ अनुत्तीर्ण रही थी। उसी सत्र में यहां लाकर इन छात्राओं के उन्नयन की दिशा में किए गए पहले प्रयास में 48 में से 21 छात्राएं उत्तीर्ण हुई थी। दूसरे वर्ष 16 छात्राओं ने 10 वीं उत्तीर्ण की। जो छात्राएं पहले ही प्रयास में दसवीं उत्तीर्ण हुई वे इस सत्र में 12 वीं की बोर्ड परीक्षा में शामिल हुई थी। हिन्दी, संस्कृत और गृह विज्ञान विषयों के साथ छात्राओं ने यहां के उत्कर्ष शिविर में पूरी मेहनत से पढाई कर पुलिस और शिक्षा विभाग के प्रयासों और अरमानों को पंख लगा दिए।

अब न रूकी है अब न रूकेंगी

दसवीं फेल होने के बाद आगे पढने का इरादा लगभग छोड चुकी इन छात्राओं के साथ उनके अभिभावकों ने भी इन्हें आगे पढाने के बारे में भी सपने में नहीं सोचा था। लेकिन भारतीय पुलिस सेवा के संवेदनशील अधिकारी के रूप में इन छात्राओं की जिन्दगी में एक ऐसी शख्सियत का सान्निध्य मिला जिनके अभिनव प्रयासों ने इनकी तकदीर बदलने का सिलसिला शुरू कर दिया। के.एल.बैरवा ने इन छात्राओं की अंधेरी जिन्दगी में आशा की रोशनी भर दी। बारहवी कक्षा पास हुई अब ये छात्राएं जोश और उत्साह से लबरेज होकर कहती है कि अब मंजिल पा जाने तक रूकने का नाम नहीं लेंगी। यह उपलब्धि हांसिल करने वाली छात्राओं में कैलाश, सन्तु, मना, सुगना, दुर्गा डामोर, दुर्गा खिहुरी, इन्दिरा, गीता, उषा, ललिता, हीरा, लक्ष्मी तथा रेखा शामिल है।

मिसाल पेश की सास-ससुर ने

इन छात्राओं में दो छात्राएं ऐसी है जिन्हे उत्तकर्ष शिविर में रहते हुए ही वयस्क आयु में परिणय सूत्र में बंधना पडा इसके बावजूद ससुराल वालो ने अपनी बहुओं की पढाई बंद नहीं कराई। यही नही इस सत्र में तीन बार आयोजित अभिभावका सम्मेलन में इन शादी शुदा छात्राओं के सास ससुर भी शामिल हुए। जनजाति विकास एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री महेन्द्रजीत सिंह मालवीया तथा विधायक अर्जुन बामनिया ने बालिका शिक्षा को प्रोत्साहन दिए जाने हेतु इन सास ससुर का सम्मान भी किया। संगति का असर जीवन में कितना प्रभाव डालता है इसका नमूना भी कीर्तिमान बनाने वाले इस बार के परिणाम में सामने आया। इन छात्राओं की देखरेख के लिए पुलिस विभाग बांसवाडा द्वारा तैनात एक महिला कांस्टेबल ने भी 12 वी कक्षा की यही रहते हुए परीक्षा दी और वह द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण हुई।

खुशी मिली इतनी कि. ..

इस अनूठे अनुष्ठान के प्रणेता और संस्थापक तत्कालीन पुलिस अधीक्षक के एल बैरवा, वर्तमान पुलिस अधीक्षक गजानन्द वर्मा, जिला शिक्षा अधिकारी माध्यमिक गणेशराम निनामा तथा इस अभियान के समन्वयक प्रकाश पण्डया ने इस उपलब्धि पर अपार हर्ष जताया है और कहा है कि यह सब बालिकाओं की मेहनत का परिणाम है तथा यह उपलब्धि साबित करती है कि जनजाति बहुल बांसवाडा जिले में सेवा भाव से कार्य करने वाले शिक्षकों की कमी नहीं है।

Friday, May 28, 2010

गॊरे हैं गुरुजी



यह कार्टून मेरे मित्र मंसूर नकवी ने बनाया है।

Wednesday, May 26, 2010

आधा हूं अधूरा हूं मनमॊहन हूं

मृगेंद्र पांडेय
कम बॊलना मनमोहन सिंह की आदत है। वह हमेशा इस बात से बचते हैं कि कहीं उनके मुंह से कॊई ऐसी बात न निकल जाए जिससे मैडम नाराज हॊ जाए। यही कारण है कि विवादित बयानों से दूरी बनाने के चक्कर में उन्हॊंने प्रेस से भी खुलकर बात नहीं की। बस इतना कह पाए कि अभी काम अधूरा है उसे पूरा करना है। आखिर वह कौन सा काम है जॊ अधूरा है। कहीं राहुल गांधी के हाथ में सत्ता सौंपना तॊ नहीं है। लगता है मैडम का दबाव था नहीं तॊ मनमॊहन अधूरे काम का जिक्र जरूर करते।

अपने काम का जिक्र करते हुए पीएम ने न तॊ राजा जैसे भ्रष्ट मंत्री के खिलाफ कुछ बॊला न ही तेजी से अपना राजनीतिक कद बढा रहे चिदंबरम की ही चर्चा की। उन्हें लग रहा था कि चिदंबरम की चर्चा करुंगा तॊ कहीं उनका असली एजेंडा सामने न आ जाए। पिछले एक महीने में चिदंबरम के खिलाफ कांग्रेस के कई दिग्गज बॊले। यह उनका कद छॊटा करने की शुरुआत है। क्यॊंकि मैडम कॊ राहुल बाबा से ज्यादा ताकतवर छवि इस देश के किसी भी मंत्री की नहीं चाहिए।

अगर कॊई तकतवर हॊ गया तॊ बाबा की ताजपॊशी कैसे हॊगी। इसलिए तॊ पीएम ने चिदंबरम और राजा के मामले पर संसद में बहस करने की बात कहकर पल्ला झाड लिया। राहुल बाबा के राजतिलक के सवाल पर पीएम ने बिना बॊले ये साफ किया कि इस कुर्सी पर वे सिर्फ़ उस वक़्त तक बैठे हैं जब तक राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार नहीं हो जाते. "मुझे कभी कभी लगता है कि नौजवानों को ये ज़िम्मेदारी संभालनी चाहिए. जब भी पार्टी ये फ़ैसला करेगी मैं ख़ुशी से कुर्सी छोड़ दूँगा."

इससे साफ है कि पीएम कॊ वही कहने में मजा आता है जॊ सोनिया और राहुल को पसंद हों. उनमें भारत और भारतवासियों के लिए कोई सहानुभूति नहीं है। उनकॊ कोई लोकसभा का चुनाव थॊडे ही लड़ना है जो वे जनता के प्रति जवाबदेह होंगे. जिनकी शक्ति से वे शक्तिवान बन कर पीएम की कुर्सी से चिपके हुए हैं मरते दम तक उनसे बिगाड़ नहीं करेंगे। भारत की जनता महंगाई से रो रही है, आतंक और नक्सल से परेशान है, लेकिन पीएम के माथे पर कॊई चिंता ही नहीं झलक रही है।

Thursday, May 20, 2010

‘बुलेट’ वाले ‘बैलेट’ से क्यों लड़ेंगे दिग्गी राजा?

Anil Pusadkar

हरा - भरा बस्तर निर्दोष लोगों के खून से लाल हो रहा है और नेताओं में वाक्युद्ध चल रहा है। और इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं दिग्विजय सिंह उर्फ दिग्गी राजा! वही दिग्विजय सिंह, जो सालों बस्तर समेत पूरे छत्तीसगढ़ के भी मुख्यमंत्री थे। क्या तब हमले नहीं किया करते थे नक्सली? भूल गए क्या दिग्गी राजा? याद दिलाएं? आपके तो एक मंत्री तक को मार डाला था नक्सलियों ने! आपने अपने कार्यकाल में नक्सली समस्या को हल करने के लिए क्या उपाय किए थे? वही बता दीजिए सबको! आप क्या बताएंगे राजा साब? सब जानते हैं। उस समय यही नक्सली, जो आज छत्तीसगढ़ में तांडव कर रहे हैं, तब पड़ोस के राज्य आंध्र प्रदेश में कहर बरपाते थे।

कारण तो पता है न? उन दिनों वहां कांग्रेस की नहीं, तेलुगु देशम् की सरकार थी। वैसे आपको तो पता ही होगा नक्सली छत्तीसगढ़ में कब आए और किस पार्टी के कार्यकाल में पनपे? अगर पता नहीं हो तो फिर से अपने 10 सालों के कार्यकाल की समीक्षा कर लीजिएगा! दिग्गी राजा यह वही बस्तर है, यह वही छत्तीसगढ़ है जिसकी बदौलत कांग्रेस कभी पूरे मध्यप्रदेश पर राज किया करती थी। छत्तीसगढ़ कांग्रेस का गढ़ कहलाता था और आपने अपने 10 साल के कार्यकाल में कांग्रेस को कहां ला पटका, यह दुनिया जानती है। दुनिया क्या आप खुद भी अच्छी तरह से जानते थे कि एक नहीं, कई चुनावों तक अब मध्यप्रदेश में कांग्रेस की वापसी संभव नहीं है। तभी तो आपने 10 साल के राजनैतिक संन्यास की घोषणा कर डाली थी।
अच्छा! अच्छा! याद आया, 10 साल तो पूरे होने जा रहे हैं और उसके बाद भी मध्यप्रदेश में कांग्रेस का फिर से राज आता नजर नहीं आ रहा है!

अच्छा तो यह बात है! फिर तो ठीक ही है दिग्गी राजा! बिना राज-पाट के राजा कहलाना काफी तकलीफ देता होगा, है न? ऐसे में आपके पास केंद्र की कुर्सी के अलावा और विकल्प भी नहीं है। मध्यप्रदेश में आपने जो कांग्रेस की दुर्गति की है, वह दो चुनावों में दिख चुकी है। और आने वाले चुनावों में भी उसकी वापसी आपकी गुटबाजी के कारण संभव नहीं दिखती। ऐसे में अगर केंद्र की कुर्सी की खातिर दिल्ली दरबार को खुश रखने के लिए डॉ. रमन सिंह के खिलाफ प्रचार युद्ध कर रहे हैं तो ठीक ही कर रहे हैं। वैसे भी दिल्ली दरबार में भोंपुओं को भरपूर तरजीह देने की परंपरा रही है। दिल्ली में मध्यप्रदेश से आपके पहले के कुंवर अर्जुन सिंह रिटायर हो चुके हैं और दूसरे चहेते सुरेश पचौरी बैक टू दि पेवेलियन यानी मध्यप्रदेश पहुंच चुके हैं। ऐसे में आपका दिल्ली दरबार को खुश करने के लिए राजनैतिक कलाबाजियां खाना कहीं से गलत नहीं लगता।
मगर सोचिए तो सही, राजा साब! इस बार तो आम जनता भी मारी गई है नक्सली हमले में। पुलिस वालों को निशाना बनाने वाले नक्सली अब जनप्रतिनिधियों और जनता को मार रहे हैं और आप उनसे कह रहे हैं चुनाव लड़ो। छत्तीसगढ़ सरकार को बता रहे हैं कि गोली नक्सलियों का जवाब नहीं है। यानी सरकार गोली चलाना भी बंद करे और नक्सली गोलियां चलाते रहे। मरते रहें बस्तरवासी। बेमतलब और बेवजह। क्या आपको दर्द नहीं होता अपनी पुरानी जनता के मारे जाने का? क्या जमीन के बंटवारे से रिश्तों का भी बंटवारा हो जाता है? अगर बंटवारा नहीं हुआ होता और आप ही यहां के मुख्यमंत्री रहते तब भी क्या आप वही कहते, जो आज कह रहे हैं?

राजा साब, माफ कीजिएगा; यह समय फिजूल की बयानबाजी का नहीं है। यह समय है इस बात पर गंभीरता से विचार करने का कि क्या अब बस्तर में आम आदमी सुरक्षित रह गया है? राजा बाबू! बस्तर में बारुदी सुरंगों का जाल बिछा हुआ है। वैसे ही जैसे आप राजा- महाराजा लोग जंगलों में जानवरों का शिकार करने के लिए जाल बिछाया करते थे। तब जैसे जानवर मरते थे न राजा साब, वैसे अब इंसान मर रहे हैं! आपको क्या लगता है कि आपके कहने से चुनाव लड़ लेंगे, नक्सली? उनका उद्देश्य सत्ता पाना नहीं है,सिर्फ हिंसा है, लूट-पाट है। और फिर, सिर्फ बस्तर संभाग और सरगुजा के कुछ इलाकों के भरोसे सरकार तो नहीं बना सकते न नक्सली; इसलिए जंगलों में अघोषित सरकार चलाना चाहते हैं वे! इसलिए कि तेंदूपत्ता के कारोबार के जरिए हजारों-करोड़ रुपए बटोर सकें। लकड़ी और वनोपज की अफरा-तफरी कर सकें। बहुमूल्य और सामजिक महत्व के खनिजों की तस्करी कर सकें। उन्हें विकास से लेना-देना होता तो वे वहां सालों बाद बनी पक्की सड़कें नहीं खोदते। वे वहां दशकों बाद (इसमें आपके कार्यकाल के साढेÞ सात साल भी शामिल है) बने स्कूल और अस्पताल नहीं उड़ाते। वे पंचायत भवन और विश्राम गृह नहीं तोड़ते। वे बिजली के टॉवर नहीं गिराते। वे रेल की पटरियां नहीं उखाड़ते। वे पंचों-सरपंचों को अपना निशाना नहीं बनाते। दरअसल वे तो चाहते ही नहीं है कि बस्तर का विकास हो, और इसी बहाने वे बस्तर में अपना खूनी खेल चला सकें।

दिग्गी राजा अभी भी समय है। संभल जाइए और इस बात पर विचार कीजिए कि बोतल से बाहर आने वाला जिन्न किसी का नहीं होता। आज हमारी, तो फिर तुम्हारी बारी है। नक्सलवाद बोतल से निकला हुआ वह जिन्न है जो धीरे-धीरे सबको निगल रहा है। आज जनता का खुद को हितैषी बताने वाला यह जिन्न अब आम जनता को भी निगलने लगा है। अब भी संभल जाइए और सिर्फ जुबानी जमा-खर्च करने के बजाय केंद्र में बैठी अपनी सरकार को समझाइए कि यह समय राजनीति करने का नहीं है। वैसे भी लाशों पर राजनीति स्थायी नहीं होती। आज नक्सली छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड और बिहार में ज्यादा सक्रिय हैं तो क्या कल वे महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश और दिल्ली को छोड़ देंगे? तब क्या करेंगे आप दिग्गी राजा, जब ये नासूर फैलकर पूरे देश को अपनी गिरफ्त में ले लेगा? क्या तब तक इंतजार करवाओगे? अगर अपने कार्यकाल की थोड़ी बहुत याद बाकी है और भोले-भाले बस्तर के आदिवासियों से मिला प्यार याद है तो खुलकर कहो कि नक्सलवाद जड़ से खत्म होना चाहिए। मगर अफसोस, आप तो ऐसा भी नहीं कर सकते क्योंकि अभी दिल्ली दरबार और वहां के राजकुमार इस मामले में खामोश हैं। अगर वे कह दें तो शायद सबसे जोर से आप ही चिल्लाएंगे, ‘नक्सलियों को खत्म कर दो! जड़ से मिटा दो नक्सलवाद को!’


अमीर धरती गरीब लोग

Monday, May 17, 2010

अपराध रिपोर्टिंग का “अपराध”

आनंद प्रधान
समाचार चैनलों में अपराध की खबरों को लेकर एक अतिरिक्त उत्साह दिखाई पड़ता है. आश्चर्य नहीं कि चैनलों पर अपराध की खबरों को काफी जगह मिलती है. हिंदी के अधिकांश समाचार चैनलों पर अपराध के विशेष कार्यक्रम भी दिखाए जाते हैं. लेकिन अगर अपराध की वह खबर शहरी-मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि से हो और उसमें सामाजिक रिश्तों और भावनाओं का एक एंगल भी हो तो चैनलों की दिलचस्पी देखते ही बनती है. चैनलों के मौजूदा ढांचे में यह काफी हद तक स्वाभाविक भी है. अपराध की खबरों के प्रति चैनलों के अतिरिक्त आकर्षण को देखते हुए ऐसी खबरों में अतिरिक्त दिलचस्पी में कोई बुराई नहीं है बशर्ते चैनल उसे रिपोर्ट करते हुए पत्रकारिता और रिपोर्टिंग के बुनियादी उसूलों और नियमों का ईमानदारी से पालन करें.


लेकिन दिक्कत तब शुरू होती है जब चैनल ऐसी खबरों को ना सिर्फ अतिरिक्त रूप से मसालेदार और सनसनीखेज बनाकर बल्कि खूब बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने लगते हैं. यही नहीं, एक-दूसरे से आगे रहने की होड़ में वे रिपोर्टिंग के बहुत बुनियादी नियमों और उसूलों की भी परवाह नहीं करते हैं. इस प्रक्रिया में उनके अपराध संवाददाता पुलिस के प्रवक्ता बन जाते हैं. वे पुलिस की आफ द रिकार्ड ब्रीफिंग के आधार पर ऐसी-ऐसी बे-सिरपैर की कहानियां गढ़ने लगते हैं कि तथ्य और गल्प के बीच का भेद मिट जाता है. क्राईम स्टोरीज खबर कम और ‘स्टोरी’ अधिक लगने लगती हैं. चैनलों और उनके रिपोर्टरों का सारा जोर तथ्यों से अधिक कहानी गढ़ने पर लगने लगता है.


सचमुच, इस मायने में चैनलों का कोई जवाब नहीं है. सबसे ताजा मामला दिल्ली की युवा पत्रकार निरुपमा पाठक की मौत का है. निरुपमा अपने एक सहपाठी और युवा पत्रकार प्रियभांशु रंजन से प्रेम करती थीं और दोनों शादी करना चाहते थे. लेकिन निरुपमा के घरवालों को यह मंजूर नहीं था. निरुपमा की २९ अप्रैल को अपने गृहनगर तिलैया (झारखण्ड) में रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई थी जो बाद में पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ‘हत्या’ निकली. इसे स्वाभाविक तौर पर “आनर किलिंग” का मामला माना गया जिसने निरुपमा के सहपाठियों, सहकर्मियों, शिक्षकों के अलावा बड़ी संख्या में बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और महिला-छात्र संगठनों को आंदोलित कर दिया.


हालांकि उसके बाद पूरे मामले में कोडरमा पुलिस की लापरवाही और राजनीतिक दबावों में काम करने के कारण पुलिस जांच ना सिर्फ सुस्त गति से चल रही है बल्कि पूरी जांच को भटकाने/बिगाडने की कोशिश की जा रही है. ऊपर से हत्या के आरोप में जेल में बंद निरुपमा की माँ के परिवाद पर स्थानीय कोर्ट के इस निर्देश के कारण मामला और पेचीदा हो गया है कि पुलिस निरुपमा के दोस्त प्रियभांशु पर रेप, धोखा, आत्महत्या के लिए उकसाने जैसे संगीन आरोपों में मामला दर्ज करके जांच करे.


स्वाभाविक तौर पर अधिकांश चैनलों ने निरुपमा मामले को जोरशोर से उठाया. हालांकि अधिकांश चैनलों की नींद निरुपमा की मौत के चार दिन बाद तब खुली जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हत्या की बात सामने आने के बाद एन.डी.टी.वी और इंडियन एक्सप्रेस ने इसे प्रमुखता से उठाया. ऐसा नहीं है कि चैनलों के रिपोर्टरों को घटना की जानकारी नहीं थी. निरुपमा देश के सबसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान की छात्रा रही थी. इस संस्थान के छात्र सभी चैनलों और अखबारों में हैं. निरुपमा और प्रियाभांशु के दोस्तों ने बहुतेरे चैनलों/अखबारों को निरुपमा की संदेहास्पद परिस्थितियों में मौत के बारे में बताया था लेकिन किसी ने कोई खास दिलचस्पी नहीं ली.


असल में, चैनलों के साथ एक अजीब बात यह भी है कि जब तक किसी खबर को उसके पूरे पर्सपेक्टिव के साथ दिल्ली का कोई बड़ा अंग्रेजी अखबार जैसे इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स आफ इंडिया, एच.टी या हिंदू अपने पहले पन्ने की स्टोरी नहीं बनाते हैं, चैनल आमतौर पर उस खबर को छूते नहीं हैं या आम रूटीन की खबर की तरह ट्रीट करते हैं. लेकिन जैसे ही वह खबर इन अंग्रेजी अख़बारों के पहले पन्ने पर आ जाती है, चैनल बिलकुल हाइपर हो जाते हैं. चैनलों में एक और प्रवृत्ति यह है कि अधिकांश समाचार चैनल किसी खबर को पूरा महत्व तब देते हैं, जब कोई बड़ा और टी.आर.पी की दौड़ में आगे चैनल उसे उछालने लग जाता है. कहने की जरूरत नहीं है कि चैनलों की यह भेड़चाल अब किसी से छुपी नहीं राह गई है.



निरुपमा के मामले भी यह भेड़चाल साफ दिखाई दी. पहले तो चैनलों ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट, निरुपमा के पिता की चिट्ठी, निरुपमा के एस.एम.एस और प्रियाभांशु के बयानों के आधार पर इसे ‘आनर किलिंग’ के मामले के बतौर ही उठाया लेकिन जल्दी ही कई चैनलों के संपादकों/रिपोर्टरों की नैतिकता और कई तरह की भावनाएं जोर मारने लगीं. खासकर प्रियाभांशु के खिलाफ स्थानीय कोर्ट के निर्देश और पुलिस की आफ द रिकार्ड और सेलेक्टिव ब्रीफिंग ने इन्हें खुलकर खेलने और कहानियां गढ़ने का मौका दे दिया. अपराध संवाददाताओं को और क्या चाहिए? पूरी एकनिष्ठता के साथ वे प्रियाभांशु के खिलाफ पुलिस द्वारा प्रचारित आधे-अधूरे तथ्यों और गढ़ी हुई कहानियों को बिना किसी और स्वतन्त्र स्रोत या कई स्रोतों से पुष्टि किए या क्रास चेक किए तथ्य की तरह पेश करने लगे.


दरअसल, अपराध संवाददाताओं का यह ‘अपराध’ नया नहीं है. इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़कर चैनलों और अखबारों में क्राईम रिपोर्टिंग पूरी तरह से पुलिस के हाथों का खिलौना बन गई है. क्राईम रिपोर्टर पुलिस के अलावा और कुछ नहीं देखता है, पुलिस के कहे के अलावा और कुछ नहीं बोलता है और पुलिस के अलावा और किसी की नहीं सुनता है. सबसे अधिक आपत्तिजनक बात यह है कि अधिकांश क्राईम रिपोर्टर पुलिस से मिली जानकारियों को बिना पुलिस का हवाला दिए अपनी एक्सक्लूसिव खबर की तरह पेश करते हैं.


इसी का नतीजा है कि आज से नहीं बल्कि वर्षों से पुलिस की ओर से प्रायोजित “मुठभेड़ हत्याओं” की रिपोटिंग में बिना किसी अपवाद के खबर एक जैसी भाषा में छपती रही है. यही नहीं, अपराध संवाददाताओं की मदद से पुलिस हर फर्जी मुठभेड़ को वास्तविक मुठभेड़ साबित करने की कोशिश करती रही है. सबसे हैरानी की बात यह है कि पुलिस की ओर से हर मुठभेड़ की एक ही तरह की कहानी बताई जाती है और अपराध संवाददाता बिना कोई सवाल उठाये उसे पूरी स्वामीभक्ति से छापते रहे हैं. कई मामलों में यह स्वामीभक्ति पुलिस से भी एक कदम आगे बढ़ जाती रही है.


यह ठीक है कि क्राईम रिपोर्टिंग में पुलिस एक महत्वपूर्ण स्रोत है लेकिन उसी पर पूरी तरह से निर्भर हो जाने का मतलब है कि रिपोर्टर ने अपनी स्वतंत्रता पुलिस के पास गिरवी रख दी है. दूसरे, यह पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांत यानी हर खबर की कई स्रोतों से पुष्टि या क्रास चेकिंग का भी उल्लंघन है. आश्चर्य नहीं कि इस तरह की गल्प रिपोर्टिंग के कारण पुलिस और मीडिया द्वारा ‘अपराधी’ और ‘आतंकवादी’ घोषित किए गए कई निर्दोष लोग अंततः कोर्ट से बाइज्जत बरी हो गए. लेकिन अपराध रिपोर्टिंग आज भी अपने ‘अपराधों’ से सबक सीखने के लिए तैयार नहीं है.