Wednesday, August 26, 2009

भाजपा ने दी सजा, कांग्रेस ने दिया पुरस्कार

कांग्रेस में क्या भाजपा से भी ज्यादा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है? यह सवाल अब इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि जहां जसवंत सिंह की किताब ‘जिन्ना: इंडिया, पार्टिशन, इंडिपेंडेंस’ को लेकर भाजपा में तूफान मचा हुआ है वहीं शशि थरूर की पुस्तक ‘इंडिया: फ्राम मिडनाइट टु द मिलेनियम ऐंड बियान्ड’ को लेकर कांग्रेस में कोई हलचल नहीं है।

इन दोनों ही पुस्तकों में दरअसल एक बात समान है और वह है गांधी-नेहरू परिवार की आलोचना। शशि थरूर की पुस्तक जहां इंदिरा से लेकर राहुल गांधी तक को कटघरे में खड़ा करती है वहीं जसवंत सिंह की किताब में जिन्ना के साथ ही नेहरू, गांधी और पटेल को भी विभाजन के लिए समान रूप से जिम्मेदार माना गया है। फर्क अब सिर्फ इतना है कि भाजपा ने जसवंत सिंह को पार्टी से बाहर कर दिया है, वहीं कांग्रेस ने थरूर को विदेश राज्यमंत्री जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंप रखी है। थरूर ने पुस्तक 1997 में लिखी थी और तब वे कांग्रेस के सदस्य नहीं थे।

क्या लिखा है शशि थरूर ने

इंदिरा गांधी :‘इंदिरा गांधी बिना विजन वाली, बिना सोचे-समझे फैसले करती थीं। गरीबी हटाओ का उनका मंत्र बिना सिद्धांत वाला था। उन्होंने बिना सोचे-समझे देश में आपातकाल लगाने, प्रेस पर प्रतिबंध और विरोधियों को जेल भेजने का काम किया।

राजीव गांधी : थरूर ने किताब में लिखा है, राजीव ईमानदारी की बात कहते थे, लेकिन उन पर बोफोर्स मामले में धांधली का आरोप भी लगा। छोटे बच्चे तब कहते थे कि गली-गली में शोर है..।’

सोनिया गांधी : सोनिया गांधी के बारे में तो थरूर ने लिखा है कि, ‘एक बिल्डर की बेटी, बिना कालेज की डिग्री लिए, भारत की सभ्यता को जाने बिना, चेहरे पर गंभीरता का लबादा ओढ़े, भारत का भविष्य बन गई है।

और क्या लिख दिया जसवंत सिंह ने

नेहरू-पटेल : जसवंत सिंह ने अपनी पुस्तक लिखा है ‘सरदार पटेल ने पंजाब और बंगाल के विभाजन की शर्त पर बंटवारे को स्वीकारा था। जसवंत लिखते हैं- लार्ड माउंटबेटन के भारत आने के एक माह के अंदर ही वर्षो तक विभाजन के मुखर विरोधी नेहरू मुल्क के बंटवारे के समर्थक बन गए।

गांधी के बारे में : पुस्तक में जिक्र है कि 1920 तक गांधीजी पूरी तरह अपनी रौ में आ गए थे। इसके बाद जिन्ना कांग्रेस से किनारे किए जाते रहे। उनका मुसलमान होना ही उनके लिए नुकसान बन गया था।

क्यों बन गए जिन्ना भस्मासुर : जिन्ना को ‘उदार, सर्वधर्मग्राही और सेक्युलर’ माना जाता रहा था। जिन्ना को वायसरॉय लॉर्ड लिनलिथगो ने ‘कांग्रेस से भी ज्यादा कांग्रेसी’ समझा था।

Friday, August 7, 2009

गुफ्तगू बंद न हो, बात से बात चले

सुभाष धूलिया


दक्षिण एशिया पर हिंसक धार्मिक कट्टरपंथ के बादल गहरे होते जा रहे हैं। यह सकंट इसलिए भी गंभीर हो जाता है कि दक्षिण एशिया के दो सबसे बड़े देश नाभिकीय हथियारों से लैस हैं। पाकिस्तान में तो हिंसक धार्मिक कट्टरपंथ और इस्लामी उग्रवाद की ताकत अनेक कारणों से बढ़ रही है और स्वयं पाकिस्तान के राजनीतिक और सैनिक प्रतिष्ठान में इस तरह के तत्वों की कमी नहीं है। ऐसे में नाभिकीय पाकिस्तान केवल भारत के या समूचे विश्व के लिए नहीं बल्कि पूरी मानवता के लिए गंभीर चिंता का विषय है। यह चिंता इस कारण भी और गहरी हो जाती है कि पाकिस्तान का लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाएं इस कदर कमजोर हैं कि बार-बार आशंकाएं पैदा होती है कि क्या ये सरकार हिंसक इस्लामी कट्टरपंथ और धार्मिक उग्रवाद से प्रभावशाली ढंग से लड़ पा रही है। पाकिस्तानी सैनिक शासन भी इस तरह के उग्रवाद को ताकत के बस पर दबाने में सफल रहे हैं और अपने इतिहास में अधिकांश समय तक सैनिक तानाशाहियों से शासित पाकिस्तान की समस्याओं का हल नहीं हुआ बल्कि ये गहराती चली गयीं और नई नई समस्याएं पैदा होती चली गयीं।

अस्तित्व में आने बाद से ही पाकिस्तान के पूरे राजनीतिक जीवन की धुरी भारत-विरोधी रही और इसी के समांतर भारत में भी पाकिस्तान विरोध प्रबल रहा और दोनों देश एक-दूसरे को अस्थिर करने में ही केन्द्रित रहे। कश्मीर पाकिस्तान की नकारात्मक राजनीति का केन्द्र बना रहा और इस सवाल पर पाकिस्तान के शासकों ने व्यावहारिक रुख अपनाने और वास्तविक राष्ट्रीय हितों को संबोधित करने के बजाय छद्म राष्ट्रवाद का सहारा लिया। भारत में भी पाकिस्तान विरोधी राष्ट्रवाद का अस्तित्व बना रहा। इस तरह राष्ट्रवाद के अस्तित्व में रहने से कभी भी दोनों देशों के बीच ऐसी कोई वार्ता नहीं हो पायी जो दीर्घकाल में सैनिक होड़ और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की राजनीति से ऊपर उठकर वास्तविक रुप से अच्छे संबंधों का मार्ग प्रशस्त करती। दोनों देशों के बीच अब तक के इतिहास में जितनी भी वार्ताएं हुई, जितने भी शिखर सम्मेलन हुए वे किसी तात्कालिक संकट के समाधान के लिए ही हुए। जब कोई संकट या तकरार पैदा हुई तो वार्ता हुई, शिखर सम्मेलन हुए। ऐसा कभी नहीं हुआ कि संकट या टकराव की स्थिति ना होने पर कोई वार्ता या शिखर सम्मेलन हुआ हो जिसका मकसद वास्तविक रूप से अच्छे संबंध कायम करना और इस क्षेत्र को तनाव और युद्ध से मुक्त करना रहा हो।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पहल का इस पृष्ठभूमि और संदर्भ में मूल्यांकन किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री ने सही ही कहा है कि अगर दुनिया बदल गयी है तो नई परिस्थितियों को अब पुराने चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। दरअसल मनमोहन सिंह की इस पहल का जितना भी विरोध हो रहा है तो इसका आधार कहीं ना कहीं पाकिस्तान-विरोधी राष्ट्रवाद ही है। लेकिन आज इस बात का मूल्यांकन करना भी जरूरी हो जाता है कि क्या आज पाकिस्तान भारत के लिए उस तरह का खतरा है जितना कि अस्तित्व में आने से लेकर अमेरिका पर आतंकवादी हमलों तक बना रहा? अमेरिका पर आतंकवादी हमलो के उपरांत पाकिस्तान उन देशों में अफगानिस्तान के बाद दूसरे नंबर पर था जिन पर अमेरिकी आक्रमण के बारे में सोचा गया था। अफगानिस्तान पर तो आक्रमण होना ही था लेकिन क्योंकि अफगानिस्तान की इस्लामी सत्ता का सबसे बड़ा संरक्षक पाकिस्तान था इसलिए पाकिस्तान को चेतावनी नहीं बल्कि धमकी दी गयी थी कि अमेरिका के साथ आओ, मदद लो या अमेरिका के विनाशकारी आक्रमण के लिए तैयार हो जाओ। पाकिस्तान के दृष्टिकोण से जनरल मुशर्रफ को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने 180 डिग्री की पलटी खाकर पाकिस्तान अमेरिकी हमले से बचा लिया।

अफगानिस्तान में मौजूद हिंसक इस्लामी कट्टरपंथ और धार्मिक उग्रवाद के खिलाफ पाकिस्तान ने जिस दिन अमेरिका के साथ हाथ मिलाया उसी दिन दक्षिण एशिया का वह शक्ति संतुलन बदल गया जो पाकिस्तान के अस्तित्व में आने से बना हुआ था। अब पाकिस्तान इस्लामी उग्रवाद के खिलाफ अमेरिकी वैश्विक युद्ध में साझीदार था और भारत को वह चुनौती देने में समर्थ नहीं रह गया था जो अबतक देता आया था। कश्मीर में इस्लामी उग्रवाद को सैनिक और राजनीतिक मदद देने के सवाल पर भी पाकिस्तान काफी दह तक विकल्पहीन हो गया। अमेरिकी दवाब और पाकिस्तानी भूमि पर सीधे सैनिक कार्रवाई की चेतावनी के कारण पाकिस्तान को अफगान सीमा से लगे इलाकों और खासतौर पर स्वात घाटी में बड़ा सैनिक अभियान चलाने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

अब सवाल यह पैदा होता है कि इस तरह के पाकिस्तान से भारत कैसे निबटे? प्रधानमंत्री की पहल को इस रूप में क्यों देखा जा रहा है कि यह पाकिस्तान स्थिति आतंकवाद को कई रियायत है? प्रधानमंत्री ने स्वयं कहा है कि पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई करनी होगी वरना एक संपूर्ण संवाद की प्रक्रिया को शुरु करना संभव नहीं हो पाएगा। लेकिन प्रधानमंत्री ने बार-बार ये भी कहा कि अगर भारत कोई बातचीत ना करे तो क्या करे? युद्ध? पाकिस्तान के साथ बातचीत न करने का विकल्प क्या है? 26/11 के आतंकवादी हमलों को देश कभी नहीं भूल सकता लेकिन कम से कम अब जाकर तो यह मानना ही होगा कि इस हमले में पाकिस्तान स्थित आतंकवादी तत्वों का हाथ था जिन्हें आईएसआई के तत्वों का संरक्षण प्राप्त था लेकिन इन हमलों में पाकिस्तान सरकार शामिल नहीं थी। निश्चित तौर पर इस मसले पर पाकिस्तान ने जो कुछ भी किया वह काफी अपर्याप्त रहा है लेकिन क्या बातचीत कर पाकिस्तान से यह नहीं कहना चाहिए कि वह आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई करे? बहुत लंबे समय तक पाकिस्तानी सरकार भारत के खिलाफ आतंकवादियों को पूरी सैनिक और राजनैतिक मदद देती रही है लेकिन आज का परिस्थितियों में पाकिस्तान के लिए यह आत्महत्या से कम नहीं होगा।

आज की परिस्थितियों का मूल्यांकन, पुराने पड़ चुके पैमानों से नहीं किया जा सकता। प्रधानमंत्री की पहल का जो भी विरोध संसद में हो रहा है, टेलीविजन के पर्दों पर विश्लेषण करने वाले रिटायर्ड राजनयिक और सैनिक जनरल पुराने पड़ चुके पैमानों से ही नई स्थिति का मूल्यांकन कर रहे हैं और ऐसा माहौल पैदा कर रहे हैं मानो भारत ने पाकिस्तान के सामने समर्पण ही कर डाला हो। एक समाचार पत्र के संपादकीय में कहा गया था कि "इस बयान से पाकिस्तान में खुशी की लहर दौड़ पड़ी है " । क्या दक्षिण एशिया की इस तरह की गंभीर राजनीतिक और सैनिक स्थिति का इस तरह का सतही मूल्यांकन किया जा सकता है? एक खास ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में भारत और पाकिस्तान के संबंधों पर घरेलू राजनीति का काफी प्रभाव होता है। कई मौकों पर राजनीतिक नेतृत्व की सोच और जनमत के बीच टकराव भी पैदा होता है। दोनों देशों के बीच जब कभी भी कोई वार्ता, कोई पहल होगी, इस पर राजनीतिक नेतृत्व की सोच एक हो सकती है लेकिन देश के भीतर जनमत के स्तर पर जो प्रतिक्रिया होगी उसकी दोनों देशों की कोई भी सरकार अनदेखी नहीं कर सकती। कई मौकों पर सरकारों को वैदेशिक मामलों में फैसले लेने में इस घरेलू जनमत का भी सामना करना होता है और इससे बड़ा फैसला लेने में अड़चनें भी पैदा होती हैं। फिर दोनों देशों में राजनीति का स्वरूप ऐसा रहा है कि जो भी विपक्ष में होता है वह राष्ट्रीय हितों की बजाय लोकप्रिय संवेदनाओं और कभी-कभी सस्ती लोकप्रियता को ही अधिक संबोधित करता नजर आता है। प्रधानमंत्री की पहल को लेकर कुछ विपक्षी दलों और खासतौर पर भाजपा ने जिस तरह की शब्दावली का प्रयोग किया है वह इस तरह की राजनीति की और ही इशारा करता है। निश्चय ही मिस्त्र में जारी किये गए संयुक्त बयान में बलूचिस्तान का उल्लेख एक राजनीतिक भूल है और इसे इसी रूप में लिया जाना चाहिए। इस राजनीतिक भूल से क्या वह सब कहा जा सकता है जो कहा जा रहा है और क्या इस भूल के आधार पर संयुक्त बयान के उन सारी बिंदुओं को नकारा जा सकता है जिनका संबध दक्षिण एशिया के भविष्य से है

आज की वैश्विक और दक्षिण एशिया की परिस्थितियां नई चुनौतियां पेश कर रही हैं और कुछ नए अवसर भी दे रही हैं। भारत की मौजूदा पहल इन चुनौतियों का सामना करने और इन अवसरों का लाभ उठाने की ओर उम्मुख है। अगर भारत और पाकिस्तान के बीच कभी कोई स्थायी शांति कायम हो सके तो इससे समूचे दक्षिण एशिया और यहां रहने वाले करोडो़-करोड़ो लोगों की तकदीर बदल जाएगी। और, अगर इस दिशा में एक बहुत छोटा सा कदम भी उठाना है तो बातचीत तो करनी ही होगी। मनमोहन सिंह भले ही इतिहास न रच पाएं पर यह छोटा सा कदम उन्होंने निश्चित रूप से उठाया है।

Wednesday, July 8, 2009

यह बजट किस आम आदमी का है?

आनंद प्रधान

फरवरी में अंतरिम बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा था कि मौजूदा असामान्य आर्थिक और वित्तीय परिस्थितियों से निपटने के लिए असामान्य उपायों की जरूरत हैं। लेकिन उस समय वित्त मंत्री ने संवैधानिक परम्पराओं और बाध्यताओं का उल्लेख करते हुए यह जिम्मेदारी अगली सरकार पर डाल दी थी। यूपीए सरकार की दूसरी पारी की शुरूआत कर रहे वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी से यह अपेक्षा थी कि वे मौजूदा आर्थिक संकट की गंभीरता को महसूस करते हुए उससे निपटने के लिए अपने कहे मुताबिक एक साहसिक बजट पेश करेंगे। उनसे यह भी अपेक्षा थी कि यूपीए खासकर कांग्रेस उस आम आदमी को जिसके कारण उसकी चुनावी जीत संभव हो पायी, उसे महंगाई, बेरोजगारी से मुक्त कराने और उसकी दूसरी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए बजट में ठोस उपाय करेगी।

लेकिन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी एक बार फिर अपनी जिम्मेदारी से कन्नी काट गए। नतीजा सबके सामने है। यूपीए सरकार की दूसरी पारी के पहले बजट में कोई बड़ी सोच नहीं दिखाई पड़ती है। इसमें निरंतरता अधिक है और परिवर्तन न के बराबर। इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके बारे में यह कहा जा सके कि उसमें मौजूदा आर्थिक और वित्तीय संकट से निपटने के लिए कोई बड़ी पहल की गई है। अलबत्ता वित्त मंत्री ने कोई बड़ी और साहसिक पहल की कमी को आंकड़ों की उलट फेर के जरिए भरने की कोशिश की है। उन्होंने इसके लिए एक बहुत आसान रास्ता यह चुना है कि चालू वित्तीय वर्ष के बजट में सारे प्रावधान पिछले वित्तीय वर्ष के बजट अनुमानों से तुलना करते हुए पेश किए हैं। इससे एकबारगी ऐसा लगता है कि वित्त मंत्री ने पूरी उदारता के साथ विभिन्न मदों और क्षेत्रों के लिए प्रावधान किया है।

लेकिन, यह सच नहीं है। उदाहरण के लिए खुद प्रणब मुखर्जी ने अंतरिम बजट पेश करते हुए कहा था कि मौजूदा आर्थिक मंदी से निपटने के लिए जरूरी है कि सरकार योजना व्यय में जीडीपी की कम से कम आधे से लेकर एक फीसदी रकम और खर्च करे। अपना नया बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री ने दावा किया है कि चालू वित्तीय वर्ष के बजट में उन्होंने योजना व्यय में 34 फीसदी की वृद्धि की है। लेकिन यह अधूरा सच है। यह ठीक है कि पिछले वित्तीय वर्ष (2008-09) के बजट अनुमान की तुलना में चालू वित्तीय वर्ष (2009-10) योजना व्यय में 34 फीसदी की वृद्धि हुई है। लेकिन पूरा सच यह है कि योजना व्यय में पिछले वर्ष के संशोधित बजट अनुमान 282957 करोड़ रूपये की तुलना में सिर्फ पन्द्रह फीसदी की बढ़ोत्तरी के साथ 325149 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है।

दरअसल, वित्त मंत्री ने इस मामले में चतुराई दिखाते हुए पूरे बजट भाषण में आंकड़ों की बाजीगरी की है। उन्होंने चालू वित्तीय वर्ष के बजट अनुमान पेश करते हुए पिछले वर्ष के बजट अनुमान को आधार बनाया है। इस कारण विभिन्न मदों और क्षेत्रों में किए गए बजटीय प्रावधान काफी भारी-भरकम दिखाई पड़ते हैं। लेकिन उनके नए बजट में किए गए प्रावधानों को पिछले वित्तीय वर्ष के संशोधित बजट अनुमानों के आधार पर तौला जाए तो साफ है कि अधिकांश मदों में बहुत कम या न के बराबर वृद्धि हुई है।

उदाहरण के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना के बजट को लीजिए। वित्त मंत्री ने बजट भाषण में दावा किया है कि ग्रामीण रोजगार योजना के लिए पिछले वित्तीय वर्ष के बजट अनुमान की तुलना में 144 फीसदी वृद्धि करते हुए 39100 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है। लेकिन सच यह है कि पिछले वित्तीय वर्ष के संशोधित बजट अनुमान के मुताबिक राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना पर 30 हजार करोड़ रूपये और संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना पर 6750 करोड़ रूपये यानि कुल 36750 करोड़ रूपये खर्च किए गए। चालू वित्तीय वर्ष के बजट अनुमानों में संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना को समाप्त करके राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम में समाहित कर दिया गया है। इस तरह चालू वित्तीय वर्ष में ग्रामीण रोजगार योजना पर पिछले वर्ष के संशोधित बजट अनुमानों की तुलना में सिर्फ 2350 करोड़ रूपये यानि 6.39 प्रतिशत की मामूली वृद्धि की गई है।

हैरत की बात है कि वित्त मंत्री ने उस योजना के लिए ऐसी कंजूसी दिखाई है जिसे यूपीए खासकर कांग्रेस की जीत का श्रेय दिया जा रहा है। इससे सरकार की प्राथमिकताओं का भी पता चलता है। कहां तो यह अपेक्षा थी कि यूपीए सरकार ग्रामीण गरीबों और बेरोजगारों के राजनीतिक समर्थन के प्रति अपनी कृतज्ञता जाहिर करने और उन्हें सचमुच राहत पहुंचाने के लिए इस कानून के तहत 100 दिन के बजाय कम से कम 150 से 200 दिनों के रोजगार और न्यूनतम 150 रूपये प्रति दिन मजदूरी की व्यवस्था करेगी, वहां चालू वित्तीय वर्ष के बजट प्रावधान से ऐसा लगता है कि यूपीए सरकार राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून के प्रति ईमानदार नहीं है।

कहने की जरूरत नहीं है कि अगर वह रोजगार गारंटी को लागू करने और ग्रामीण गरीबों को न्यूनतम 100 दिनों का रोजगार उपलब्ध कराने के प्रति सचमुच ईमानदार है तो उसे बजट में कम से कम 50 हजार करोड़ रूपये का प्रावधान करना चाहिए था। यह इसलिए भी जरूरी था कि इस साल मानसून मंे विलम्ब और बारिश कम होने की आशंकाओं के बीच कृषि क्षेत्र के प्रभावित होने के कारण ग्रामीण मजदूरों को काम कम मिलने की उम्मीद है। ऐसे ग्रामीण मजदूरों के लिए ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना ही उम्मीद की आखिरी किरण हैं। तीसरे, मानसून में गड़बड़ी और कृषि क्षेत्र की विकास दर में गिरावट के मद्देनजर भी यह जरूरी था कि ग्रामीण रोजगार योजना को और प्रभावी बनाने के लिए बजट में पर्याप्त प्रावधान किया जाए।

बजट में यूपीए सरकार की ऐसी ही वायदा खिलाफी प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून और शिक्षा के अधिकार कानून के प्रति भी दिखायी पड़ती है। सरकार ने 100 दिन के एजेंडे में यह वायदा किया है कि रोजगार गारंटी कानून की तर्ज पर लोगों के भोजन के अधिकार यानि खाद्य सुरक्षा और बहुत लम्बे अरसे से लटके शिक्षा के अधिकार के कानून को अमली जामा पहनाया जाएगा। इस वायदे का उल्लेख राष्ट्रपति के अभिभाषण में भी था। लेकिन वित्त मंत्री ने बजट में इन दोनों अधिकारों को लागू करने के लिए कोई प्रावधान नहीं किया है। उन्होंने बजट भाषण में खाद्य सुरक्षा कानून का उल्लेख तो किया है लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया है कि यह कानून और कितने दिनों में लागू होगा। इसके बजाय उन्होंने कहा है कि सरकार प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक का मसौदा सार्वजनिक बहस और विचार-विमर्श के लिए जल्दी ही पेश करेगी।

कहने की जरूरत नहीं है कि भूखमरी के शिकार लोगों के साथ इससे बड़ा मजाक और कुछ नहीं हो सकता है। ऐसे ही रवैये की खिल्ली उड़ाते हुए मशहूर शायर अदम गोंडवी ने बहुत पहले लिखा था कि ‘‘भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ/आजकल दिल्ली में है जेरे-बहस ये मुद्दआ।’’ सवाल यह है कि भूखे लोगों को रोटी उपलब्ध कराने के लिए और कितने दिन बहस चलेगी? यह सवाल इसलिए भी और महत्वपूर्ण और दुखी करनेवाला है कि आज भारत में दुनिया के सबसे अधिक भूखे लोग रहते हैं जिन्हें दो जून का भर पेट भोजन भी नहीं मिल पाता है। इससे अधिक और शर्मनाक बात क्या हो सकती है कि तेज विकास दर के बावजूद देश में कुपोषण और भूखमरी की समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है। ताजा आर्थिक सर्वेक्षण में भी इस तथ्य को स्वीकार किया गया है कि 1998-99 में तीन वर्ष से कम आयु के 47 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार थे और अगले सात वर्षों में तीव्र विकास दर के बावजूद 2005-06 में भी ऐसे बच्चों की संख्या 46 फीसदी पर बनी हुई थी।

वित्त मंत्री ने कुछ ऐसा ही रवैया शिक्षा के अधिकार के कानून के प्रति भी दिखाया है। उन्हांेने बजट भाषण में शिक्षा के बारे में बड़ी-बड़ी बातें करने के बावजूद शिक्षा के अधिकार के कानून का न तो कोई जिक्र किया और न ही उसके लिए कोई बजटीय प्रावधान किया। उल्टे बजट में प्राथमिक शिक्षा के मद में पिछले वित्तीय वर्ष के संशोधित बजट अनुमान 19488 करोड़ रूपये की तुलना में चालू वित्तीय वर्ष में सिर्फ 194 करोड़ रूपये यानि एक फीसदी की बढ़ोत्तरी की है। दोहराने की जरूरत नहीं है कि शिक्षा के अधिकार के कानून को ईमानदारी से लागू करने के लिए कम से कम 55 हजार से लेकर एक लाख करोड़ रूपये की आवश्यकता पड़ेगी। लेकिन न तो पिछली यूपीए सरकार और न अब नई यूपीए सरकार इतनी बड़ी रकम खर्च करने के लिए तैयार हैं। यही कारण है कि शिक्षा के अधिकार का विधेयक पिछले कई वर्षों से लटका पड़ा है। वित्त मंत्री के रवैये को देखकर लगता नहीं है कि सरकार शिक्षा के अधिकार के कानून को लागू करने को लेकर कहीं से भी उत्साहित है।

निश्चय ही, वित्त मंत्री सामाजिक क्षेत्र की इन महत्वपूर्ण योजनाओं और कार्यक्रमों को लागू करने के मामले में अपनी कंजूसी का बचाव यह कहकर कर सकते हैं कि सीमित संसाधनों के बीच इससे अधिक कर पाना संभव नहीं है। वे यह भी कह सकते हैं कि मौजूदा आर्थिक मंदी के दौर में राजस्व वसूली में गिरावट के कारण उनके हाथ बंधे हुए थे। लेकि न यह भी अधूरा सच है। यह ठीक है कि आर्थिक मंदी के कारण सरकार के राजस्व में उस रफ्तार से वृद्धि होने की उम्मीद नहीं है जितनी पिछले कुछ वर्षों में रही है। लेकिन अगर यह सच है तो वे अमीर और उच्च मध्यवर्ग को करों में छूट देने के मामले में इतने उदार क्यों हो गए? उन्होंने काॅरपोरेट क्षेत्र को खुश करने के लिए फ्रिंज बैनिफिट टैक्स खत्म कर दिया है। लेकिन 2007-08 में फ्रिंज बैनिफिट टैक्स से सरकारी खजाने को 6533 करोड़ रूपये की आय हुई थी। इसका अर्थ यह हुआ कि वित्त मंत्री ने एक झटके में काॅरपोरेट क्षेत्र को लगभग 7 हजार करोड़ रूपये का तोहफा दे दिया।

इसी तरह उन्होंने निजी आयकर पर दस प्रतिशत के सरचार्ज को समाप्त कर दिया है। इसका फायदा दस लाख रूपये से अधिक की आय वाले अमीर वर्गों को होगा। उन्होंने मध्यवर्ग को भी खुश करने के लिए टैक्स के स्लैब में मामूली फेर-बदल किया है। यही नहीं, उन्होंने जिंसों के कारोबार में सक्रिय सटोरियों को काबू में रखने के लिए उन पर लगने वाले कमोडिटी ट्रांजैक्शन टैक्स को भी समाप्त कर दिया है। उल्लेखनीय है कि जिंसों के वायदा कारोबार का कुल टर्न ओवर 2008 में लगभग 50 लाख करोड़ रूपये तक पहुंच गया और यह माना जाता है कि कई जिंसों और खाद्यान्नों की कीमतों में असामान्य वृद्धि की एक बड़ी वजह उनका वायदा कारोबार भी है। कहने की जरूरत नहीं है कि कमोडिटी ट्रांजक्शन टैक्स समाप्त कर वित्त मंत्री ने किसकी मदद की है?

इससे स्पष्ट है कि वित्त मंत्री नवउदारवादी आर्थिक नीतियों से हटने के लिए तैयार नहीं है। यह बजट भी उन्हीं नव उदारवादी आर्थिक नीतियों की निरंतरता का एक और सबूत है जो गरीबों के बजाय कारपोरेट समूहों, अमीरों और उच्च मध्यवर्गों के हितों का अधिक ध्यान रखता है। अलबत्ता पहले की तुलना में एक रणनीतिक फर्क सिर्फ यह आया है कि यूपीए सरकार यह सब गरीबों और आम आदमी का नाम लेकर कर रही है। जाहिर है कि नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के स्थायित्व और भविष्य के लिए यह जरूरी हो गया है कि गरीबों और आम आदमी का राग जोर-शोर से गाया जाए। यह बजट भी इसी रणनीति का एक और उदाहरण है।

गतिहीन ममतामई रेल

मृगेंद्र पांडेय

ममता का रेल बजट इस कदर गतिहीन है कि वह न तो देश को आगे ले जाने वाला है न ही रेल को। महज चंद रेलगाड़ियों को चलाना अगर रेल बजट होता है तो ममता ने अपने काम को बखूबी अंजाम दिया। लेकिन जब हम इससे आगे की सोचते हैं तो हमें गौर करना होगा की दीदी की नजर कहां है। उनके सपने क्यां है। उनकी सोच कहां तक जाती है। क्या उनके पास देश और रेल दोनों को आगे ले जाने वाली सोच है या फिर उन्हें सिर्फ और सिर्फ लालगढ़ और सिंगूर ही नजर आ रहा है। ममतामई बजट पेश करने की हर रेल मंत्री कोशिश करता है, लेकिन ऐसे समय जब देश में मंदी हो, लोगों को उम्मीद होती है कि आधारभूत संरचना के विकास के लिए कुछ कदम उठाए जाएंगे, जो करने में ममता असफल रहीं है।

ममता ने कुछ चीजों को पूरी तरह से छोड़ दिया। आम तौर पर पढ़े-लिखे कलाकारों, साहित्यकारों की पार्टी की मुखिया होने के नाते ममता से यह उम्मीद की जा सकती है कि उनकी सोच में कुछ नयापन होगा, लेकिन ऐसा कुछ नजर नहीं आया। पैसा कहां से आएगा और कहा जाएगा इसकी बात अगर छोड़ भी दी जाए तो ममता ने कम से कम युवा पीढ़ी को इस बात की उम्मीद तो थी ही की वह कुछ ऐसा करेंगी जो उनके लिए मददगार होगा। ममता ने युवा एक्सप्रेस चलाकर यह बताने की कोशिश की कि उनकी नजर युवाओं पर है, लेकिन क्या सिर्फ इतने से युवाओं को संतोष होगा। देश की 50 फीसदी से ज्यादा आबादी युवा है और अनुमान लगाया जा रहा है कि 2020 तक भारत की औसत उम्र 29 साल होगी। ऐसे में ममता के बजट ने युवाओं को निराश ही किया।

युवाओं को रोजगार से मतलब है। आज का युवा इंटरनेट का भरपूर उपयोग करता है। आज के युवा के पास समय भी कम है, क्योंकि वह सबकुछ जल्दी पाना चाहता है। क्या बजट बनाते समय दीदी की नजर में ये बातें थी, अगर थी तो उसकी झलक क्यों नजर नहीं आई। ममता ने भविष्य के लिए नई योजना के बारे में कोई पहल नहीं की। लालू के समय में बुलेट ट्रेन शुरू करने पर काम किया जा रहा था। ममता ने उसका जिक्र तक नहीं किया। ‘एज् ग्रेड शहरों में मेट्रो शुरू करने की बात कही जा रही थी, लेकिन वह योजना भी ठंडे बस्ते में पड़ी रही। रेल पटरियों का जाल भले ही देश भर में हो लेकिन उनकी गुणवत्ता को सुधारने, ट्रेनों की रफ्तार को बढ़ाने के लिए पटरियों को उसके हिसाब से बनाने और सबसे महत्वपूर्ण रेलगाड़ियों को समय से पहुंचाने के बारे में कोई उपाय नजर नहीं आया।

यहां यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि ममता की कई योजनाएं काफी अच्छी है। जसे दूरंत, इज्जत लेकिन इन मुद्दों को भी जोड़ा जाना चाहिए था।

Friday, June 26, 2009

भाजपा का अंतर्द्वद्व

अफरातफरी और अनिश्चितता के माहौल का फायदा उठाकर पार्टी के कई नेताओं ने अपने ही साथियों को नीचा दिखाने तथा पुरानी खुन्नसें निकालने का काम शुरू कर दिया।

राजीव पांडे

लोकसभा चुनावों में पराजय का मुंह देखने के बाद से ही भारतीय जनता पार्टी में कुछ ठीक नहीं होता दिखाई दे रहा है। होना तो यह चाहिए था कि पार्टी के वरिष्ठ नेता एक साथ बैठकर आत्मविश्लेषण करते और हार के कारणों का पता लगाते तथा उसके बाद उन कारणों को दूर करने और पार्टी को मजबूत बनाने में जुट जाते। यह सही है कि पार्टी सत्ता से दूर रह गई और लालकृष्ण आडवाणी का प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा नहीं हो पाया। पार्टी की इतनी दुर्गति भी नहीं हुई थी कि उसके नेता सिर पकड़ कर बैठ जाते। पार्टीजनों में तो इतनी हताशा छा गई, जसे कि सब कुछ खत्म हो गया।

जब अटल बिहारी वाजपेयी ने सक्रिय राजनीति से अलग होने का ऐलान किया था तो सब जानते थे कि अब पार्टी के नेता आडवाणी ही होंगे। लेकिन अब आडवाणी के बाद कौन? जब यह सवाल सामने आया तो सबके स्वार्थ सामने आने लगे। बहुत मनाने के बाद आडवाणी फिलहाल विपक्ष के नेता बने रहने को तैयार हो गए हैं, लेकिन उन्होंने जब अपने ही गुट के माने जाने वाले अरुण जेटली को राज्यसभा में पार्टी का नेता और सुषमा स्वराज को लोकसभा में उपनेता नियुक्त किया तो उसने आग में घी डालने जसा काम किया। आडवाणी की पीढ़ी के नेता इस बात से इतने नाराज हुए कि उन्होंने इन नियुक्यिों को एक तरह से साफ चुनौती दे डाली। यह सीधे आडवाणी की सर्वोच्चता को चुनौती देना था। इससे यह भी साफ हो गया कि आडवाणी अब उतने मजबूत नहीं रहे। उनकी मौजूदगी मे जब यह कलह शुरू हो गई है तो उनके पद से हट जाने के बाद तो पार्टी में बाकायदा युद्ध ही छिड़ जाएगा।

इस अफरातफरी और अनिश्चितता के माहौल का फायदा उठाकर पार्टी के कई नेताओं ने अपने ही साथियों को नीचा दिखाने तथा पुरानी खुन्नसें निकालने का काम शुरू कर दिया। कुछ ने पार्टी को अपने पुराने एजेंडा में वापस चलने की वकालत की तो कुछ उसे समय के अनुसार बदलने की बात कह कर विकास को एजेंडा बनाने की बात करने लगे। इन नेताओं को लगा कि उन्हें इससे अच्छा अवसर मिल नहीं सकता। वह एक तीर से दो निशाने साधना चाहते थे। उन्हें लगा कि वह अपने दुश्मनों पर हार का ठीकरा फोड़ उन्हें पार्टी में किनारे लगाने के साथ ही अपना स्वार्थ सिद्ध करने में सफल हो जाएंगे। उन्हें इससे कोई सरोकार नहीं था कि उनका यह अभियान पार्टी को कहां ले जाएगा।

इस अंदरूनी कलह का कार्यकर्ताओं के मनोबल पर कितना खराब असर पड़ेगा। ये नेता पार्टी के हितों को पूरी तरह नजरअंदाज कर रहे थे लेकिन नेतृत्व ने चुप्पी साधी हुई थी। यह सिलसिला पार्टी के सर्वमान्य नेता लालकृष्ण आडवाणी और पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह की नाक के नीचे शुरू हुआ लेकिन उन्होंने इस पर तुरंत रोक लगाने के लिए कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की। जब यह मामला गर्म होने लगा तो हाईकमान ने हाथ-पैर मारने शुरू किए लेकिन तब तक इसकी आंच राज्यों में भी फैल गई थी।
उत्तराखंड, कर्नाटक और हरियाणा उन राज्यों में से थे, जहां असंतुष्ट खुल कर सक्रिय हो गए। असंतुष्टों की इस मुहिम को अपनी पहली सफलता मिल भी गई, जब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। अब इनके मुंह में खून लग गया है और ये भविष्य में और सक्रिय ही होंगे और न तो अन्य राज्य और न ही केंद्रीय हाईकमान ही इससे बच पाएगा।

इन असंतुष्टों की सक्रियता का एक और कारण यह भी है कि इन्हें पार्टी का कोई न कोई दिग्गज नेता हवा दे रहा है। पार्टी अध्यक्ष स्वयं इस स्थिति में नहीं हैं कि वह किसी बड़े नेता को नाराज कर सकें क्योंकि उनके अध्यक्ष पद के इस कार्यकाल के कुछ ही महीने रह गए हैं। यह भी एक वजह है कि असंतुष्टों में हाईकमान का उतना डर नहीं रह गया दिखता है।

दो साल पहले जब आडवाणी ने खंडूरी को उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनाया तो, उस समय राज्य के अनेक पार्टी नेताओं ने उनकी मुखालफत की। लेकिन तब उनकी एक नहीं चली क्योंकि पार्टी का केंद्रीय नेतत्व मजबूत था। इन चुनावों में पार्टी को राज्य की पांच सीटों में से एक भी सीट नही मिली तो ये नेता, जो उनकी कार्यशैली से भी प्रसन्न नहीं थे, उनके पीछे पड़ गए।
प्रदेश से राज्यसभा के सांसद ने तो अपने पद से ही त्यागपत्र दे दिया। लेकिन उस सांसद के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। उनसे केवल अपना इस्तीफा वापस लेने को कह दिया गया। उत्तराखंड की घटना महज एक शुरुआत है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पार्टी के भविष्य को लेकर आशंकाएं ही पैदा होती हैं क्योंकि आडवाणी के बाद कोई ऐसा नेता नहीं है, जो सबको एक साथ लेकर चल सके। पंक्ति के जो नेता हैं उनमें अहं का जबरदस्त टकराव है, जो बिखराव का कारण भी बन सकता है।

Wednesday, June 17, 2009

यूपीए सरकार की भाषाई अक्षमता

मुंबई हमले के बाद सरकार के गरम तेवर अब नरम पड़ चुके हैं। जमात उद दावा हाफिज मोहम्मद सईद की रिहाई के बाद मनमोहन सिंह का लोकसभा में यह कहना कि हमारे पास बातचीत के अलावा विकल्प नहीं है, इस ओर इशारा भी करते हैं। चुनाव जीतने के बाद सरकार द्वारा मुंबई हमले पर अपनाया गया लचर रवैया बताता है कि ‘तेवरों में वह गर्मी चुनावों तक के लिए ही थी। बहरहाल सरकार को यह सोचना होगा कि रिहाई के बाद हाफिज सईद मस्जिद में नमाज तो नहीं पड़ेगा। अब भारत एक और मुंबई हमला ङोलने के लिए तैयार रहे।

महेंद्र सिंह

आम चुनाव में अप्रत्याशित रूप से मजबूत जनादेश पाकर आत्ममुग्ध हो चुकी कांग्रेस नीत यूपीए सरकार आने वाले पांच सालों में देश को कैसी सरकार देने जा रही है। इस पर लोग अपने अपने-अपने तरीके से विचार प्रकट कर रहे हैं। लेकिन विदेश नीति के मोर्चे पर यूपीए सरकार अपनी भाषाई अक्षमता स्पष्ट कर चुकी है। हाल में पाकिस्तान की अदालत ने मुंबई हमले के सूत्रधार हाफिज सईद को यह कहते हुए रिहा कर दिया कि सरकार आरोपी के खिलाफ कोई ऐसा सबूत या दस्तावेज पेश करने में विफल रही है जिससे मुंबई हमले में उसकी संलिप्तता का पता चलता हो। खर भारतीय सरजमीं पर आतंक का नंगा नाच प्रायोजित करने वाले मसूद अजहर और हाफिज सईद के खिलाफ पाकिस्तान सरकार के सख्त रुख अख्तियार करने की उम्मीद मनमोहन सिंह और कुछ कथित बुद्धिजीवी स्तंभकार ही कर सकते हैं जो चौबीसों घंटे पाकिस्तान से बातचीत की वकालत करते रहते हैं।

दिलचस्प है कि हाफिज सईद की गिरफ्तारी के बाद भारत सरकार की प्रतिक्रया सिर्फ ‘दुर्भाग्यपूर्णज् पर सीमित होकर रह गई। गरिमा के मानस अवतार शालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को उस रात को नींद आई कि नहीं आई। ये तो वही जानें। लेकिन मुंबई हमले में अपने परिजनों को खोने वाले भारतीय, शहीद पुलिस अधिकारियों, सुरक्षा बलों की विधवाओं और बच्चों के साथ हर उस भारतीय को बैचैनी जरूर हुई होगी जिसने 72 घंटे तक मुंबई के जनजीवन को थमते देखा और महसूस किया। सरकार भी वही है। प्रधानमंत्री भी मनमोहन सिंह हैं। फिर अचानक भारतीय नेतृत्व के तेवर इतने नरम क्यों हो गए। ऐसा लगा कि भारत से बहुत दूर कहीं कोई घटना घट गई हो और भारत सरकार को राजनयिक शिष्टाचार के नाते कोई प्रतिक्रया देनी थी। हमारे विदेश मंत्री ने यह कहकर रस्म अदायगी कर दी कि हाफिज सईद की रिहाई दुर्भाग्यपूर्ण है। सही है। हम इससे ज्यादा कर भी क्या सकते हैं। पाकिस्तान के पास परमाणु बम है।

वैसे भी पाकिस्तान आजकल स्वात और वजीरिस्तान में आतंकवादियों के खिलाफ अमेरिका के पैसे से लड़ाई लड़ रहा है। हमें शिकायत पाकिस्तान से नहीं है। हमें भारत सरकार से भी शिकायत नहीं होती अगर उसने चीख चीख कर मुंबई हमले के लिए जिम्मेदार लोगों को हर हाल में न्याय के कटघरे में खड़ा करने की बात न की होती। मनमोहन सिंह जी ने इसके बाद संसद में एक और धमाका कर दिया। उन्होंने कहा कि हमारे पास पाकिस्तान से बाचचीत करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। आम भारतीय को यह बात समझ में नहीं आई कि मुंबई हमले से लेकर आम चुनाव के दौरान मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान के लिए इतनी उदारता क्यों नहीं दिखाई। क्या यह महज संयोग है कि प्रधानमंत्री संसद में पाकिस्तान के साथ बातचीत का संकेत देते हैं और दो चार दिन बाद ही ओबामा के दूत बिलियम बर्न्‍स भारत आकर मनमोहन सिंह को ओबामा के नाम की पाती देते हैं। लगे हाथ बर्न्‍स यह भी कह देते हैं कि कश्मीर के मामले में वहां के लोगों की बात सुनी जानी चाहिए। अब बर्न्‍स को कौन बताए कि कश्मीर में अभी कुछ माह पहले अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की मौजूदगी में विधानसभा चुनाव हुए हैं और जनता ने अपने प्रतिनिधियों को चुनकर भारतीय लोकतंत्र में आस्था व्यक्त की है।

हां अगर बर्न्‍स आईएसआई के पैसे पर पेट पालने वाले हुर्रियत के नेताओं को ही कश्मीरियों की आकांक्षाओं का प्रतीक मानती है तो ये उनकी समस्या है। एक और दिलचस्प बात है कि जब भी कश्मीरी अवाम की आकांक्षाओं की बात होती है तो अमेरिका, ब्रिटेन और भारतीय नेतृत्व को भी पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर की याद नहीं आती जहां के लोग यह भी नहीं जानते कि लोकतंत्र किस चिड़िया का नाम है। इसके लिए हमारे देश का धर्मनिरपेक्ष मीडिया भी उतना ही जिम्मेदार है जितना भारतीय नेतृत्व। हमारे देश के पत्रकार किसी बर्न्‍स या मिलीबैंड से क्यों नहीं पूंछते कि कश्मीरी अवाम की आकांक्षा क्या भारतीय कश्मीर तक ही सीमित है। सवाल तो अरुंधती राय से भी पूछा जा सकता है कि कश्मीर में मानवाधिकार के उल्लंघन को लेकर सेना पर आरोप लगाने से पहले उन्हें मुजफ्फराबाद में पिछले सात दशकों से लोकतंत्र के साथ हो रहा बलात्कार क्यों नहीं दिखता। क्या हम मान लें कि विलियम बर्न्‍स ओबामा के उस प्लान को आगे बढ़ाने के लिए आए थे जो उन्होंने कश्मीर विवाद को हल करने के लिए अमेरिकी मतदाताओं के समक्ष प्रस्तुत किया था। यह महज संयोग नहीं हो सकता है कि बर्न्‍स के बाद अगले महीने जुलाई में अमेरिकी की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भारत आ रहीं हैं।

कश्मीर जसे पुराने अंतरराष्ट्रीय विवाद को सुलझाने के लिए बातचीत ही एक मात्र विकल्प है इससे शायद ही कोई इनकार करे लेकिन बातचीत की मेज पर जाने के पहले बातचीत का माहौल तो बने। कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार को अपने हनीमून पीरियड में सब कुछ अच्छा लग रहा होगा लेकिन ऐसा हर भारतीय के साथ नहीं है। कांग्रेस नेतृत्व को यह बात समझ लेनी चाहिए कि खुली हवा में सांस ले रहा हाफिज सईद मस्जिद में जाकर इबादत नहीं कर रहा होगा बल्कि वह भारत में एक और आतंकी मंजर की पटकथा लिखने में जी जान से जुट गया हो गया क्योंकि उसकी दुकान इसी से चलती है। मनमोहन जी मुंबई हमले के बाद उभरे आम जनता के आक्रोश को याद करिए और हनीमून सिंड्रोम से जल्दी निकलिए।

Tuesday, June 9, 2009

तैयार हो रहा है विपक्ष

मृगेंद्र पांडेय

लोकसभा चुनाव में हार के बाद भाजपा की चुप्पी ने लोगों को यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया था कि अब विपक्ष की भूमिका कौन निभाएगा। पिछली सरकार में वाम दल भले ही सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे थे, लेकिन विपक्ष की भूमिका में भी वही थे। यही कारण है कि लोकसभा चुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। अब करारे तरीके से विपक्ष की भूमिका नहीं निभा पाने के बाद इस बात की कयास लगाई जाने लगी थी कि अब विपक्ष समाप्त हो गया।

लोकसभा में कार्यवाही के दौरान जिस तरह से भाजपा नेता सुषमा स्वराज ने न केवल पार्टी का पक्ष रखा, बल्कि सरकार पर धावा बोला, इससे पहली बार लगा कि अब विपक्ष तैयार हो रहा है। महिला आरक्षण हो या फिर देश में एम्स बनाने का मामला सुषमा ने अपनी बात जमकर रखी। महिला आरक्षण के मुद्दे पर सुषमा ने कहा कि जब वह संसदीय कार्यमंत्री थीं, तो उन्होंने बिल को बहस के लिए लगा दिया था। लेकिन सरकार सौ दिन में जिस महिला आरक्षण की बात कह रही है, दरअसल वह छलावा है। सुषमा ने कहा कि सरकार ने सौ दिन में महिला आरक्षण का कोई वादा नहीं किया है। सरकार ने तो सिर्फ यह कहा है कि महिला आरक्षण लाना उनकी प्राथमिकता है। अगर उस मुद्दे पर एक भी बहस हो जाती है तो उनके सौ दिन के एजेंडा में शामिल महिला आरक्षण का वादा पूरा हो जाता है।
केंद्र-राज्य के संबंधों के बारे में सुषमा ने केंद्र की कांग्रेस सरकार पर पक्षपात का आरोप लगाया।

सुषमा ने कहा कि जब वह मंत्री थीं, उन्होंने चिकित्सा की दृष्टि से पिछड़े छह राज्यों में एम्स के निर्माण का प्रस्ताव रखा था। उसमें पांच राज्य कांग्रेस शासित थे और एक उड़ीसा एनडीए शासित। लेकिन सरकार ने उस एम्स के निर्माण के बारे में एक भी लाइन अपने सौ दिन की कार्ययोजना में शामिल नहीं किया है। मध्यप्रदेश के साथ हो रहे भेदभाव पर सुषमा ने कहा कि प्रदेश बिजली संकट से जूझ रहा है। प्रदेश के मुखिया केंद्र से मदद की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन केंद्र सहयोग को तैयार नहीं हो रहा है। मध्यप्रदेश का कोयला व्यापारियों को बेचा जा रहा है और प्रदेश सरकार को केंद्र सरकार बाहर से कोयला मंगाने की बात कह रही है।

सुषमा ने सरकार को कई और मुद्दों पर घेरा। इसे विपक्ष के तैयार होने के रूप में देखा जा सकता है। अगर विपक्ष आठ दिन चले संसद सत्र को तैयार होने में लगा भी देता है तो उसे देर नहीं मानी जाएगी। लेकिन भाजापा अगर संसद की अगली बैठक में खुद को तैयार करने में समय काटेगी तो यह जनता न तो बर्दाश्त करेगी, न ही भाजपा को माफ।