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Saturday, August 17, 2019
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Monday, February 27, 2017
डिफरेंट एंगल-27 फरवरी 2017
आध्यात्म से कैसे दूर होगा भ्रष्टाचार
विधानसभा में श्रीश्री रविशंकर महाराज का प्रवचन था। एक पत्रकार साथी ने सवाल किया कि बाबा आध्यात्म से क्या भ्रष्टाचार को दूर किया जा सकता है। बाबा का जवाब था, आध्यात्म अंदर से तृप्ति पैदा करता है। जब व्यक्ति तृप्त हो जाएगा, तो संतुष्टी आ जाएगी और भ्रष्टाचार अपने आप दूर हो जाएगा। गुस्र्जी यह कहने से नहीं चूके कि इसका मतलब यह नहीं है कि दरिद्रता ही आध्यात्म है।
आध्यात्म की बात करे तो बन जाते हैं सांप्रदायिक
विधायक शिवरतन शर्मा ने कहा कि बाबा जब हम लोग आध्यात्म, ज्ञान, ध्यान की बात करते हैं, तो विरोधी सांप्रदायिक बता देते हैं। इसका उपाय क्या है। बाबा ने कहा कि आरोप-प्रत्यारोप लगाना तो आप लोगों का धर्म है। लगाते रहो। लेकिन आध्यात्म को मानों। विरोधियों को तो कुछ भी कहोगे, वो पलटवार तो करेंगे ही।
सोचों, क्यों कम हो रहा नेताओं का गौरव
श्रीश्री ने कहा कि नेताओं का गौरव कम हो रहा है। इसके बारे में सोचने की जरूरत है। तमिलनाडु की एक घटना का जिक्र किया और कहा कि एक कार्यक्रम में दो मंत्रियों को आना था। जब स्टेज से यह सूचना दी गई कि दोनों मंत्री नहीं आ रहे हैं, तो जमकर ताली बजी। अब नेताओं को सोचना चाहिए।
देर से पहुंचे भूपेश तो कुर्सी के लिए खड़े रहे
श्रीश्री के कार्यक्रम में भूपेश बघेल देर से पहुंचे। पहले तो वह अपनी सीट को खोजते रहे। जब नहीं मिली तो आगे से तीसरी लाइन में बैठे नेताजी को बोले, जगह खाली करो। किनारे की सीट पर बैठे और आखिरी तक श्रीश्री का प्रवचन सुने। उन्होंने योग कराया तो उसे भी किया, लेकिन बाहर निकलते ही कहा-श्रीश्री भाजपा के एजेंट हो गए हैं, इसलिए अब मैं इनको नहीं मानता।
हमारे डीएनए में निष्ठा है
बिहार चुनाव में पीएम मोदी ने डीएनए का जिक्र किया तो बवाल मच गया था। अब श्रीश्री ने डीएनए का जिक्र किया। शालिन तरीके से गुस्र्देव ने कहा कि हमारे डीएनए में निष्ठा है। यह निष्ठा खोने की कगार पर पहुंच गई है, इसलिए इसे बचाने की जरूरत है। जरा सोचिए गंभीर बात को बड़ी शालिनता से गुस्र्देव ने कहा, न कोई विवाद हुआ, न किसी ने विरोध किया।
सबको कर्मयोगी चाहिए, लेकिन खुद कर्मयोगी क्यों नहीं बनते
गुस्र्देव ने कहा कि सभी आदमी को कर्मयोगी चाहिए। ड्राइवर, पीए, सेके्रटरी सब कर्मयोगी होना चाहिए, लेकिन खुद कितने कर्मयोगी है, इसके बारे में नहीं सोचते। जब बाबा यह बात बोल रहे थ्ो, तो विधायक एक दूसरे को निहार रहे थे।
पांच साल में एक बार जाते हो जनता के बीच
गुस्र्देव ने कहा कि विधायक कम से कम पांच साल में एक बार तो क्षेत्र में जाते ही हैं। जब वे ऐसा कह रहे थे तो कई विधायक सदमे में आ गए कि आखिरी इनको कैसे पता, पांच साल में हम लोग एक बार ही जाते हैं। बाहर निकलने पर एक विधायक ने कहा कि लगता है गुस्र्देव सबके बारे में जानते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो वे कैसे डंके की चोट पर बोल सकते हैं कि पांच साल में एक बार ही हमलोग विधानसभा में जाते हैं।
शराब वाले को पूछने दो
श्रीश्री से जब सवाल पूछने की बारी आई तो विधायक विमल चोपड़ा खड़े तो हुए लेकिन उनके पास माइक नहीं पहुंच रही थी। इतने में एक मंत्री ने कहा कि अरे भाई, शराब वाले को पूछने दो। विमल ने पूछा कि क्या नशाबंदी के लिए जनजागरण जरूरी है या फिर नशे पर रोक। श्रीश्री ने कहा दोनों साथ-साथ चलना चाहिए। विमल कुर्ते पर शराब की बोतल बनवाकर पहुंचे थे, तो एक मंत्री ने कमेंट किया। नीचे चखने की प्लेट होती तो और मजा आ जाता।
Sunday, August 7, 2016
ये जोगी के उम्मीदों की लांचिंग है
छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी ने नई पार्टी बनाकर कांग्रेस और भाजपा दोनों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। नई पार्टी के अपने-अपने आंकलन होते हैं, लेकिन जोगी की पार्टी जिस अंदाज में मैदान में उतरी है, वह बता रही है कि जंग जारी रहेगी। चाहे वह सरकार के खिलाफ हो या फिर कांग्रेस संगठन के खिलाफ। आज जोगी की पार्टी का थीम सांग लांच किया गया। यह गीत जोगी के उस सपनों की लांचिंग है, उस उम्मीद की लांचिंग है, जिसका परिणाम 2018 के विधानसभा चुनाव में सामने आएगा।
छत्तीसगढ़ की राजनीति के जानकारों की मानें तो पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की राजनीति काफी आक्रामक रही है। उनको जोड़ने, तोड़ने और फोड़ने का माहिर खिलाड़ी माना जाता है। लेकिन सत्ता से 13 साल दूर रहने के बाद जब जोगी नई पार्टी के साथ मैदान में उतरे हैं, तो उनके कदम बेहद सधे हुए हैं। जोगी जब थीम सांग की लांचिंग कर रहे थे, तो पत्रकारों का अधिकांश समूह यही चर्चा कर रहा था कि ये जोगी की स्टाइल नहीं है। उम्मीद, सपने और सौम्य अंदाज में पेश आही राज, जनता कांग्रेस के आही राज थीम सांग को सुनकर अधिकांश लोग यही कह रहे थे कि अब जोगी की सोच में बदलाव आया है। कहा जा रहा है कि जोगी अब जोड़ने के लिए काम कर रहे हैं, जो उनके स्वभाव और कार्यशैली से काफी अलग है। जोगी को जानने वाले नेताओं का तो यहां तक कहना है कि साहब ने अपने काम के तरीके में पिछले छह महीने में जोरदार बदलाव किया है। अब वो भी 14 से 16 घंटे काम कर रहे हैं। बंद कमरे में उनके रणनीतिकार देर रात तक मंथन करते हैं और एक-एक कैंपेन को प्लान कर रहे हैं।
जोगी के करीबी नेताओं की मानें तो जोगी ने नई पार्टी के गठन की शुस्र्आत फरवरी से ही शुरू कर दी थी। उसी समय उनको अंदाजा लग गया था कि अब अलग चलने में ही वजूद बचेगा। अब जोगी छत्तीसगढ़ में अपने वजूद की आखिरी लड़ाई लड़ने के लिए मैदान में है। यही कारण है कि धरना और आंदोलन में किसी युवा नेता की तरह सड़क पर उतर जा रहे हैं। कहीं भी कंबल बिछाकर सड़क पर लेट जा रहे हैं। यह सब जोगी के रणनीतिकारों की सधी हुई और मीडिया को आकष्र्ाित करने की रणनीति का हिस्सा है। यह सच है कि जोगी की पार्टी में चेहरा भी अजीत जोगी है, कानून भी अजीत जोगी है और सरकार भी अजीत जोगी है। ऐसे में इसी चेहरे को 2018 तक इतना मजबूत करने की कोशिश की जा रही है कि कांग्रेस के नेताओं का कद उनके सामने टिक न पाए और अगर सरकार विरोधी लहर का फायदा उठाने का मौका मिले तो वह जोगी कैंप की झोली में गिरे।
Monday, June 6, 2016
मौलिक चिंतन से दूर जोगी के सिपहसलार, केजरी-कन्हैया के विचार चुराए
मृगेंद्र पांडेय
अजीत जोगी ने भले ही नई पार्टी बनाने की तैयारी कर ली हो, लेकिन उनके सिपहसलार मौलिक चिंतन से काफी दूर हैं। कोटमी के सभा में जो पर्चे बांटे गए, उसमें जोगी की मौलिकता नजर नहीं आ रहीहै। जोगी की पार्टी का संभावित नाम छत्तीसगढ़ अपना दल होगा। उत्तर प्रदेश में सोनेलाल पटेल की पार्टी का नाम अपना दल है। सोनेलाल की बेटी अनुप्रिया पटेल ने पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा के साथ गठजोड़ करके भदोही से लोकसभा सीट भी जीती है। सोनेलाल को जानने वाले साफ कहते हैं कि सिर्फ सवर्णों का विरोध करके पूरी जिंदगी अपनी नेतागिरी चमकाते रहे। ऐसे में क्या जोगी का एजेंडी भी सवर्ण विरोधी होगा।
जोगी ने बसपा का टैगवर्ड सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय को चुना है। इसमें भी छत्तीसगढ़ियां कोई भी शब्द शामिल कर सकते थे, लेकिन वे सिर्फ बातों से ही छत्तीगढ़ियां राग अलाप रहे हैं। माना जा रहा है कि वे दलित और पिछड़ों पर फोकस राजनीति को बढ़ावा देंगे। उनके घोषणा पत्र में जेएनयू के छात्रसंघ्ा अध्यक्ष कन्हैया का आजादी वाला राग भी शामिल है। कन्हैया ने तो मौलिक आजादी का सवाल उठाया था, लेकिन जोगी के करीबी नेताओं ने इसे अपने घोषणा पत्र में शामिल करके बता दिया कि वे कुछ भ्ाी नया नहीं करने जा रहे हैं।
सीजी खबर में एक आर्टिकल में अन्वेषा गुप्ता ने भी लिखा है कि छत्तीसगढ; में अजीत जोगी के पास ऐसे कौन से मुद्दे हैं जिनके बल पर वे कांग्रेस व भाजपा का विकल्प पेश कर सकते हैं. उनके पुत्र अमित जोगी द्वारा केवल यह कह देना कि जनता का समर्थन उ)की सबसे बड;ी संपत्ति है कह देना आज के राजनीतिक दौर में नाकाफ;ी है. जनता उसे वोट देती है जिसमें उसे अपनी बेहतरी की उम्मीद होती है. रमन सिंह या भूपेश बघेल की आलोचना करना उन्हें 2018 के विधानसभा में वोट नहीं दिला सकता है. जोड;-तोड; करके तो हरगिज भी 90 सदस्यीय छत्तीसगढ; विधानसभा में बहुमत हासिल नहीं किया जा सकता है.
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ के मरवाही विधानसभा में अमित जोगी ने भले ही 40 हजार से ज्यादा वोट से जीत दर्ज की हो, लेकिन उसी मरवाही की पहली बैठक में सिर्फ दस हजार लोग ही पहुंचे। कांग्रेसी मान रहे हैं कि बाकी 30 हजार से ज्यादा वोटर कांग्रेसी है, जो कांग्रेस उम्मीदवार होने के कारण अमित जोगी के साथ थे। ऐसे में यह संदेश साफ है कि जोगी की एकला चलो की राह आसान नहीं है।
Thursday, May 12, 2016
चुटकी लेने वाले राज्यपाल क्या बचा पाएंगे गरिमा
मृगेंद्र पांडेय
छत्तीसगढ़ में पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की जाति को लेकर कांग्रेस ने मोर्चा खोला है। सड़क से लेकर हर अभियान में कांग्रेस का एक ही मुद्दा है और वह है जोगी की जाति। प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल और कांग्रेसी राज्यपाल को मिले और जोगी की जाति के मुद्दे पर ज्ञापन सौंपा। एक दिन बार राजभवन से जो विज्ञप्ति जारी हुई उसे राज्यपाल की गरिमा के अनुरूप नहीं माना जा सकता। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि यह विज्ञप्ति किसी पार्टी के एक नेता की हो सकती है, लेकिन किसी राज्य के संवैधानिक प्रमुख की तरफ से अगर इस तरह की विज्ञप्ति जारी होती है, तो उसे राज्यापाल की गरिमा के अनुकूल नहीं माना जा सकता।
राजभवन से जारी विज्ञप्ति के अनुसार, प्रतिनिधि मंडल द्वारा व्यक्ति विशेष के जाति प्रमाण पत्र के संबंध में कार्रवाई के लिए ध्यान आकर्षित कराए जाने पर चुटकी लेते हुए राज्यपाल श्री टंडन ने कहा कि यह मामला तो घर का है इसे अपने स्तर पर सुलझा सकते हैं। क्या किसी संवैधानिक प्रमुख को इस तरह का बयान देना चाहिए। अगर ऐसा नहीं है तो क्या राजभवन की गरिमा को गिराने का काम नहीं किया जा रहा है। यह हो सकता है कि राज्यपाल को दिखाए बिना ही यह विज्ञप्ति जारी कर दी गई हो, लेकिन जब तक जिम्मेदार पर कोई कार्रवाई नहीं होगी, यह सवाल उठता रहेगा।
http://dprcg.gov.in/884-12-05-2016
यह है राजभवन से जारी विज्ञप्ति
राज्यपाल श्री बलरामजी दास टंडन से गत दिवस यहां राजभवन में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष श्री भूपेश बघेल के नेतृृत्व में प्रतिनिधि मंडल ने भेंट कर फर्जी जाति प्रमाण पत्र के प्रकरणों में त्वरित कार्रवाई के संबंध में ज्ञापन सौंपा। राज्यपाल श्री टंडन ने प्रतिनिधि मंडल को बताया कि राज्य सरकार फर्जी जाति प्रमाण पत्र के मामले पर पूरी गम्भीरता और तत्परता से कार्रवाई कर रही है। उन्होंने बताया कि सरकार को इस संबंध में लगभग 550 शिकायतें मिली थी। विजिलेंस कमेटी द्वारा इनमें से लगभग 375 मामलों की विवेचना की गई और 184 मामलों में शिकायतें सही पाई गई है। हाईपावर कमेटी की अनुशंसा पर 25 मामलों में राज्य सरकार द्वारा कार्रवाई करते हुए संबंधितों को नौकरी से निकाला गया है। शेष मामले उच्च न्यायालय में लंबित हैं।
प्रतिनिधि मंडल द्वारा व्यक्ति विशेष के जाति प्रमाण पत्र के संबंध में कार्रवाई के लिए ध्यान आकर्षित कराए जाने पर चुटकी लेते हुए राज्यपाल श्री टंडन ने कहा कि यह मामला तो घर का है इसे अपने स्तर पर सुलझा सकते हैं। प्रतिनिधिमंडल से चर्चा के दौरान राज्यपाल श्री टंडन ने कहा कि ऐसे विशिष्ट मामले जिन पर कार्रवाई नहीं की गई हो बताएं, ताकि उन पर कार्रवाई की जा सके। उन्हांेने कहा कि हाईकोर्ट में सरकार की ओर से सही पक्ष नहीं रखने के संबंध में प्रमाण सहित जानकारी उपलब्ध कराएं जिससे कि सरकार को इस संबंध में अवगत कराया जा सके।
उल्लेखनीय है कि कांग्रेस प्रतिनिधि मंडल द्वारा पूर्व में प्रेषित अपने 6 सूत्रीय ज्ञापन में से व्यक्ति विशेष के फर्जी जाति प्रमाण पत्र से संबंधित बिन्दु पर ही जोर दिया जा रहा था। राज्यपाल द्वारा अनेक बार यह कहने पर कि इसके अलावा कोई नई बात हो तो समक्ष में लाएं किन्तु प्रतिनिधि मंडल ने अन्य बिन्दुओं का जिक्र नहीं किया। ज्ञापन में प्रदेश में आउट सोर्संिग, वन अधिकार अधिनियम, पांचवी अनुसूची, अधिसूचित क्षेत्रों में पेसा एक्ट आदि बिन्दुओं का समावेश किया गया था। अंत में प्रतिनिधि मंडल द्वारा समक्ष में राज्यपाल को सौंपे गए ज्ञापन में फर्जी जाति प्रमाण पत्र संबंधित 338 प्रकरणों की सूची संलग्न की गई।
Thursday, May 5, 2016
विवादों वाले ब्यूरोक्रेट्स, नबंर वन छत्तीसगढ़
मृगेंद्र पांडेय
भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसरों को लेकर छत्तीसगढ़ एक बार फिर सुर्खियों में है। हाल ही में एक के बाद एक ऐसे आईएएस अफसर विवादों में आए हैं, जो नए हैं और जिनसे कुछ बेहतर करने की उम्मीद है। ये अफसर अब अपने अच्छे काम से नहीं, बल्कि विवादों के कारण पहचान बना रहे हैं। एक सीनियर आईएएस अधिकारी ने कहा कि छत्तीसगढ़ की ब्रांडिंग नंबर वन के रूप में की जा रही है, इसलिए नए नवेले आईएएस विवादों में लाकर नंबर वन बनवा रहे हैं। सवाल है कि आखिर ये अफसर विवादों में क्यों आ रहे हैं। क्या इनका प्रशिक्षण कमजोर हो गया है, या फिर आईएएस बनने के बाद ये खुद को लोकतंत्र में राजा की जगह रखकर देखने लगे हैं।
छत्तीसगढ़ में एक अफसर रणबीर शर्मा कुछ स्र्पए की रिश्वत के मामले में फंस जाते हैं।
जगदीश सोनकर डाक्टर होने के बावजूद मरीज से बेअदबी से पेश आते हैं। अमित कटारिया जैसा सुलझा हुआ अफसर पर प्रधानमंत्री को रिसिव करने जाता है, तो प्रोटोकाल का पालन नहीं करता है और किरकिरी होती है। एलेक्स पाल मेनन काफी समझदार माने जाते हैं। सोशल मीडिया पर एक्टिव है। दलित चिंतन से लेकर समाज में बदलाव पर नजर रखते हैं, लेकिन जिस कन्हैया का केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की भाजपा सरकार विरोध कर रही है, उसका समर्थन करते हैं। खास बात यह है कि कलेक्टर को ही कानून का पालन कराने की जिम्मेदारी है। जबकि ये कलेक्टर कानून का ही सोशल मीडिया पर विरोध कर रहे हैं। मेरा सवाल यह है कि क्या ये आईएएस अफसर अपने अच्छे काम के जरिए पहचान नहीं बना सकते हैं। देश की सर्वोच्च सेवा के लिए चयनित अगर कोई अफसर 500 या हजार स्र्पए के लिए गरीब जनता को प्रताड़ित करता है, तो उसे इस नौकरी में आना ही नहीं था। मेरे व्यक्तिगत विचार हैं कि पैसा कमाने के लिए और भी कई रोजगार हो सकते हैं। नए अफसरों को यह भी सोचना चाहिए कि अब सरकार इतनी तनख्वाह दे रही है कि रिश्वत मांगने की शायद जरूरत नहीं है।
मेरे के साथी ने यह पोस्ट किया कि ये तस्वीर उस यूपीएससी के गाल पर करारा तमाचा है जो सिविल सर्विसेज की प्रारंभिक परीक्षा में उम्मीदवारों के सिविल सर्विस एप्टीट्यूट और मेन परीक्षा के जनरल स्टडीज पेपर-4 में उम्मीदवारों के इथिक्स, इंटीग्रीटी और एप्टीट्यूट को को परखता है। मुझे भी लगता है कि इन अफसरों का चयन करने वालों को भी एक बार सोचना चाहिए कि क्या उनको प्रशिक्षण देने में कहीं चूक हुई है। क्या सरकार की जिम्मेदारी नहीं होती कि इनको कुछ सिखाएं। अगर सरकार सिखाने में असफल है, तो उसे पद पर बने रहने का कोई हक नहीं है। ऐसी सरकार और सरकार को चलाने वाले ब्यूरोक्रेट एक बार फिर अपनी जिम्मेदारी और अपने काम करने के तरीके के बारे में जरूर सोचें। नहीं तो ऐसा ही होगा कि कोई नेता या मंत्री लोकसुराज जैसे अभियान में किसी आईएएस को मुर्गा बना देगा और जनता ताली पीटेगी।
भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसरों को लेकर छत्तीसगढ़ एक बार फिर सुर्खियों में है। हाल ही में एक के बाद एक ऐसे आईएएस अफसर विवादों में आए हैं, जो नए हैं और जिनसे कुछ बेहतर करने की उम्मीद है। ये अफसर अब अपने अच्छे काम से नहीं, बल्कि विवादों के कारण पहचान बना रहे हैं। एक सीनियर आईएएस अधिकारी ने कहा कि छत्तीसगढ़ की ब्रांडिंग नंबर वन के रूप में की जा रही है, इसलिए नए नवेले आईएएस विवादों में लाकर नंबर वन बनवा रहे हैं। सवाल है कि आखिर ये अफसर विवादों में क्यों आ रहे हैं। क्या इनका प्रशिक्षण कमजोर हो गया है, या फिर आईएएस बनने के बाद ये खुद को लोकतंत्र में राजा की जगह रखकर देखने लगे हैं।
छत्तीसगढ़ में एक अफसर रणबीर शर्मा कुछ स्र्पए की रिश्वत के मामले में फंस जाते हैं।
जगदीश सोनकर डाक्टर होने के बावजूद मरीज से बेअदबी से पेश आते हैं। अमित कटारिया जैसा सुलझा हुआ अफसर पर प्रधानमंत्री को रिसिव करने जाता है, तो प्रोटोकाल का पालन नहीं करता है और किरकिरी होती है। एलेक्स पाल मेनन काफी समझदार माने जाते हैं। सोशल मीडिया पर एक्टिव है। दलित चिंतन से लेकर समाज में बदलाव पर नजर रखते हैं, लेकिन जिस कन्हैया का केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की भाजपा सरकार विरोध कर रही है, उसका समर्थन करते हैं। खास बात यह है कि कलेक्टर को ही कानून का पालन कराने की जिम्मेदारी है। जबकि ये कलेक्टर कानून का ही सोशल मीडिया पर विरोध कर रहे हैं। मेरा सवाल यह है कि क्या ये आईएएस अफसर अपने अच्छे काम के जरिए पहचान नहीं बना सकते हैं। देश की सर्वोच्च सेवा के लिए चयनित अगर कोई अफसर 500 या हजार स्र्पए के लिए गरीब जनता को प्रताड़ित करता है, तो उसे इस नौकरी में आना ही नहीं था। मेरे व्यक्तिगत विचार हैं कि पैसा कमाने के लिए और भी कई रोजगार हो सकते हैं। नए अफसरों को यह भी सोचना चाहिए कि अब सरकार इतनी तनख्वाह दे रही है कि रिश्वत मांगने की शायद जरूरत नहीं है।
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