Tuesday, June 7, 2011

सुराज के बगैर स्वराज

पहले तय किया विकास का एजेंडा, फिर अमल
बिना शासन-प्रशासन की मदद से बदली गांव की पहचान
बिलासपुर जिले के थाना तखतपुर का झगडालू गांव था मोछ
विकास समझौता करने वाली देश की पहली पंचायत


राज्य सरकार के सुराज अभियान का प्रदेश में अलग-अलग स्थानों पर लगातार विरोध हुआ। ग्रामीणों का आरोप था कि सुराज में शासन-प्रशासन ने जो वादे किए, उसमें से अधिकांश पूरे नहीं हुए। वहीं, बिलासपुर जिले के विकासखंड तखतपुर के एक गांव मोछ में ग्रामीणों ने स्वयं विकास का एजेंडा तय किया और गांव की तकदीर बदल दी। झगडालू गांव में शामिल मोछ विकास समझौता लागू करने वाला देश का पहला गांव है। अब वहां विकास के घोषणा पत्र पर अमल कर नई इबारत लिखी जा रही है।

यहां पंचायत चुनाव से पहले विकास का एजेंडा तय किया गया था। एक साल बाद उसमें से ८० फीसदी काम पूरा कर लिया गया है। सरपंच रामेश्वरी धुर्वें ने बताया कि इस काम में शासन-प्रशासन की ओर से कोई खास मदद नहीं की गई। पंचायत चुनाव के समय ग्रामीणों ने मिलकर गांव के विकास का एजेंडा तय किया। चुनाव के बाद जीतकर आए जनप्रतिनिधियों ने गांव के विकास की प्राथमिकता को पंचायत भवन के सामने लिख दिया। इसके आधार पर गांव के विकास की योजना बनाई गई। इसमें सूचना का अधिकार पर काम करने वाली संस्था ट्रांसपेरेंंसी इडिया इंटरनेशनल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

क्या है विकास का घोषण पत्र
पंचायत चुनाव से पहले मोछ के सभी १९ वार्डों की समस्याएं तय की गई। इन समस्याओं को पूरा करने वाले उम्मीदवार को चुनने के लिए एक घोषणा पत्र तैयार किया गया। घोषण पत्र की समस्याओं को पंचातय भवन के सामने लिखा गया। जो भी काम पूरा होता गया, उसके आगे सही का निशान लगाया गया। पंचायत ने उन्हीं कार्यों को प्राथमिकता दी, जो विकास घोषणा पत्र में शामिल थी।

झगडालुओं से वसूले ४० हजार
विकास घोषणा पत्र में पंचायत में शराबबंदी की बात कही गई थी। सभी ने मिलकर गांव में शराबबंदी कराई। शांति भंग करने वालों पर जुर्माना तय किया गया। अब तक पंचायत ने ४० हजार से ज्यादा का जुर्माना वसूल लिया है। इस पैसे का इस्तेमाल गांव के विकास के लिए किया जा रहा है।


वर्जन
गांव में विकास का घोषणा पत्र लागू करने के लिए ट्रांसपेरेंंसी इडिया इंटरनेशनल के कार्यकर्ताओं ने एक साल से ज्यादा समय तक मेहनत की। इसका परिणाम रहा कि गांव में पंचायत चुनाव में १९ वार्डों में से १४ वार्डों में सूचना का अधिकार कार्यकर्ताओं की जीत हुई। अब वे विकास के एजेंडे पर काम कर रहे हैं।
प्रतीक पांडेय, आरटीआई कार्यकर्ता

Friday, May 20, 2011

फुस्स कारतूस के सहारे कांग्रेस!

-बस्तर लोकसभा चुनाव में जोगी का प्यादा फिर हारा
-नई कार्यकारिणी में पुराने चेहरे, विवाद की स्थिति
-संभले नहीं तो मिषन 2013 षुरु होने से पहले होगा फेल
मृगेंद्र पांडेय

छत्तीसगढ की राजनीति में एक नया बदलाव दस्तक देने की तैयारी में हैै। बस्तर लोकसभा उपचुनाव में हार के बाद कांग्रेस की प्रदेष कार्यकारिणी अटक गई है। प्रदेष अध्यक्ष नंदकुमार पटेल भारी तनाव में है। उम्मीद थी कि चुनाव का परिणाम कांग्रेस में एक नई उर्जा लाएगा, लेकिन हार ने जोष को ठंडा कर दिया। कार्यकारिणी में टाप 30 लोगों को षामिल करने और उसे अंतिम रुप देने के लिए दिल्ली दरबार में माथा टेकने पहुंचे थे, लेकिन सब फेल हो गया। अब नए सिरे से तैयारी करके आना पडेगा।

आला कांग्रेसी नेताओं की मानें तो नंदकुमार पटेल ने जो सूची आलाकमान को सौंपने की तैयारी की है, वह काफी विवादास्पद है। बताया जा रहा है कि इसमें वोरा और विद्या खेमे के चूके हुए कारतूसों का नाम भर दिया गया है। कुल मिलाकर जिस नई टीम की उम्मीद पटेल से की जा रही थी, वह पहली सूची में नजर नहीं आ रही है। आगे का हाल क्या होगा, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है। नंदकुमार के अध्यक्ष बनने के बाद से इस बात की उम्मीद जगी थी कि युवा और उर्जावान कांग्रेसियों की नई टीम बनाएंगे। एक ऐसी टीम जो 2013 में रमन सिंह के भगवा रथ को रोक सके। नहीं तो रमन सिंह भी तरुण गोगोई, षीला दीक्षित की तरह लगातार तीसरी पारी खेलने वाले खिलाडी हो जाएंगे।

एक अनुमान के अनुसार प्रदेष के अगले विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के कई बडे नेता अपनी अंतिम पारी खेल चुके होंगे। माना जा रहा है कि विद्याचरण षुक्ल, मोतीलाल वोरा सक्रिय राजनीति से उम्र के कारण दूर हो जाएंगे। अजीत जोगी को टक्कर देने के लिए पूरी कांग्रेस एक हो जाएगी। क्योंकि राजनीतिक जानकार मानते हैं कि कांग्रेस की इस हालत के सबसे बडे जिम्मेदार अजीत जोगी है। अजीत जोगी की अलगाववादी नीतियों के कारण कांग्रेस के परंपरागत वोट दूर हो गए। नगरीय निकाय चुनाव, पंचायत चुनाव, और उपचुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पडा। बस्तर उपचुनाव के लिए उम्मीदवार कवासी लखमा भी जोगी की पसंद थे। इसके कारण बस्तर टाइगर और जोगी के विरोधी महेंद्र कर्मा गुट ने अंदरुनी तौर पर अपने को चुनाव से अलग कर लिया। इसका यह असर हुआ कि युवा से लेकर आदिवासी वोटर लखमा से अपने को जोड नहीं पाया। महेंद्र कर्मा का बेट बंटी कर्मा बस्तर लोकसभा युवक कांग्रेस का अध्यक्ष है। युवाओं की जिस टीम के दम पर अमित जोगी प्रचार कर रहे थे, उसमें से स्थानीय मतदाताओं को जानने और उन पर पकड रखने वाले एक भी नेता नहीं थे।

युवक कांग्रेस और एनएसयूआई के चुने हुए चेहरे बस्तर टूर के नाम पर आए और बस्तर की सुनहरी वादियों में रायपुर की गर्मी से बचकर मौज मनाए और चले गए। ऐसे में नंदकुमार एक बार फिर उन्हीं लोगों पर दाव लगाएंगे तो यह तय है कि कांग्रेस का मिषन 2013 षुरु होने से पहले ही बंद हो जाएगा। एक अच्छी बात प्रदेष कांग्रेस के नेताओं के लिए है कि पष्चिम बंगाल में कांग्रेस की सरकार बनने जा रही है। इससे थोडा सीख लेने की जरुरत है।

Thursday, May 19, 2011

गंगा जी नहीं गंगा मईया!

कभी किसी का परित्याग नहीं करतीं हैं गंगा जी
मृगेंद्र पांडेय

भारतीय जनसंचार संस्थान में पत्रकारिता की पढाई के दौरान जवाहर लाल नेहरु विश्विद्यालय में रोजाना घूमने का अपना ही मजा रहता था। उन दिनों गंगा ढाबा से लेकर पूर्वांचल हास्टल के चक्कर लगाया करते थे। वैचारिक मुददों पर तकरार वाम पंथ से हल्का है भगवा रंग वगैरह वगैरह। इन सब के बीच एक दिन किसी दोस्त ने एक फिल्म धर्म देखने की सलाह दी। बताया कि बनारस के घाट के बारे में इसमें काफी अच्छा दिखाया गया है। एक पंडित जी हैa जिन्होंने गंगा किनारे बसे बनारस को बडे अच्छे ढंग से पेष किया है। बनारस] गंगाजी] और पंडित] तीनों मेरे फेवरेट थे. तो मैं फिल्म लाकर अपने कंप्यूटर में लगा दिया। उन दिनों बहुत कम लोगों के पास ही अपना लैपटाप हुआ करता था।

धर्म की शुरुआत बनारस में गंगाजी के घाट से होती है। षास्त्रजी पूजा के लिए सुबह सूर्य उगने से पहले निकलते हैं और अपने कार्यकलाप को निपटाने के बाद षिश्यों को पढाने में जुट जाते हैं। संस्कृत के एक ष्लोक का अनुवाद करते हुए उन्होंने बताया कि पिता पुत्र को, पति पत्नी को, संबंधी-संबंधी को भाई बंधु एक दूसरे को त्याग देते हें किंतू गंगाजी गंगा मईया कभी किसी का परित्याग नहीं करती है अगर उसने एक बार भी उसके जल में स्नान किया हो। वो जीवन पर्यंत उसके पापों केा हरकर उसे मोक्ष का अधिकारी बनाती है। इस घोर कलयुग में जहां सदगुणों का लोप हो रहा है, गंगा मईयां की उपस्थिति हमारे बीच सौभाग्य की बात है।

भारत की संस्कृति में गंगा का अपना एक विषेश स्थान है। षास्त्रों में बनारस षहर का जिक्र किया गया है। विष्व का एक मात्र षहर जो कभी नश्ट खत्म नहीं हुआ। बनारस वह स्थान है जहां गंगा धनुस का आकार ले लेती है। अगर हम गंगा के दूसरे किनारे से देखें तो बनारस षहर धनुस के आकार का आज भी दिखाई देता है। मतलब जिस तरह बनारस कभी खत्म नहीं हुआ, उसी तरह गंगा भी जन्मों-जन्म से हमारे बीच है। धर्म को न मानने वाले इस तर्क को नकार सकते हैं। बनासर में लंबे समय तक रहने के कारण मेरा मानना है कि गंगा आम आदमी के जीवन का अभिन्न अंग बन गई है। लेकिन गंगा मईया जिस तरह से प्रदूशित हो रही हैं ऐसा लगता है कि आने वाले समय में कभी समाप्त न होने वाले बनारस और गंगा दोनों का अस्तित्व खतरे में पडने वाला है।

हाल में एक रिपोर्ट आई है जिसमें बताया गया है कि कानपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में उद्योगों का गंदा पानी जिस तरह से गंगा में आ रहा है, वह एक बडे खतरे को चेतावनी दे रहा है। बनारस के आसपास भदोही में बडे पैमाने पर कालीन उद्योग है। इससे निकलने वाला कचरा भी गंगा में गिराया जा रहा है। बची कसर मायावती का डिम प्रोजेक्ट गंगा एक्सप्रेस वे पूरी कर रही है। वडे पैमाने पर उपजाउ जमीन को कब्जा किया जा रहा है और उस पर सिक्स लेन सडक बनाकर गंगा के किनारे षहरों के विकास की तैयारी की जा रही है। इन नए षहरों का कचरा भी गंगा में ही जाएगा। इसके लिए कोई विषेश प्लान अब तक सामने नहीं आया है कि एक्सप्रेस वे के कारण बसने वाले षहरों की गंदगी को क्या गंगा में फेंका जाएगा या नहीं।

सरकार की कोषिष हमेषा से नाकाम होती आई है। क्यों सरकार नहीं चाहती कि समस्याओं का समाधान हो। पैसा खर्च करने के नाम पर अफसरषाही नोट बटोर रही है और गंगा के खाते में कचरा और गंदगी जमा होती जा रही है। क्रेडिट सोसाइटी के फार्मूले को माने तो हमारे हिस्से मूल धन और ब्याज दोनेां में कचरा ही जमा हो रहा है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि आने वाले समय में सरकार, आम आदमी और पर्यावरण विद नहीं चेते तो गंगा के अस्तित्व को खतरा ही होने वाला है। यह खतरा उस संस्कृति के खिलाफ होगा जो कभी समाप्त नहीं हुई है। आओ हम सब मिलकर गंगा को बचाने के लिए प्रण लें। क्योंकि गंगा बचेगी तो हम बचेंगे। जय गंगा जी] जय गंगा मईया।

Monday, April 18, 2011

बदल दो राजनीति के प्यादे

मृगेंद्र पांडेय

राजनीति के प्यादे हाथी कर तरह होते हैं। वह कभी भी, कहीं भी वार कर देते हैं। उनको इस बात का अंदाजा होता है कि उनके जाने या बचने का बडा असर नहीं होने वाला है। लेकिन राजनीति के मंझे खिलाडी की हमेशा कोशिश रहती है कि प्यादे बचे रहें। कई बार प्यादे वजीर बनने में भी सफल हो जाते हैं। इस पर सवाल खडा होता है कि क्या वजीर और प्यादे की दौड के बाद बना वजीर दोनों की ताकत समान होती है। जवाब अलग-अलग आते हैं, लेकिन यह जवाब अधिकांश लोग देेते हैं। दोनों की ताकत भले ही समान मान ली जाए, लेकिन दौड के बाद बना वजीर इतना कमजोर होता है कि वह अपनी पूरी ताकत विरोधी के वार से बचने में खर्च कर देते है। अंत में उसे या तो मरना पडता है या फिर हार का सामना करना पडता है।

छत्तीसगढ की राजनीति में भी कई प्यादे खुद को बचाकर वजीर तो बन गए, लेकिन काम प्यादे का ही किया। वो लगातार हारते रहे। खुद को बचाने की जुगत में पार्टी की लुटिया डूबाते रहे। अंत में एक दिन उनको पद से हटा दिया गया। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष धनेंद्र साहू खुद विधानसभा का चुनाव नहीं जीत पाए। आज जब वे अपनी कुर्सी कांग्रेस के नए वजीर नंद कुमार पटेल को दे रहे थे, तो कहा पार्टी कार्यकर्ताओं ने उन्हें पूरा सहयोग दिया। उनके सहयोग के कारण ही वे अपना तीन साल का कार्यकाल पूरा कर पाए। अध्यक्ष के रुप में दिए अंतिम भाषण में धनेंद्र की लाचारगी, बेचारगी, चेहरे पर कुछ न कर पाने की उदासी साफ नजर आ रही थी।

तीन साल में पार्टी ने विधानसभा, लोकसभा, नगरीय निकाय और पंचायत के चुनाव में करारी हार का सामना किया। विधानसभा में जीते अधिकतर विधायक अजीत जोगी खेमे के हैं। जिनको टिकट दिलाने से लेकर जीताने तक का काम खुद जोगी ने किया। धनेंद्र को तो यहां तक पता नहीं था कि उम्मीदवार को चुनाव लडने के लिए पैसे का इंतजाम कहां से किया जाए। हाल ही में दक्षिण बस्तर के ताडमेटला गए विधायकों के दल के साथ वापस लौट रहा था तो एक वरिष्ठ विधायक ने कहा कि संजारी बालोद में साहू जी ने चुनाव में डयूटी लगा दी। चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे तो बोले होटल में रुकने का इंतजाम पार्टी ने कर दिया गया है, बिल मत देना। बिलासपुर क्षेत्र से तीन बार के विधायक जब चुनाव प्रचार करके लौटने लगे तो होटल के मैनेजर ने चाय से लेकर खाने तक का बिल थमा दिया। उन्होंने पैसा दिया और बिल जेब में रख लिया।

कुछ दिनों बाद रायपुर की कांग्रेस कमेटी में हुई एक बैठक में चुनाव परिणामों की समीक्षा हुई। बात आई कि इतना पैसा खर्च करने के बावजूद पार्टी के लोगों ने ठीक से प्रचार नहीं किया। तब विधायक महोदय ने होटल का बिल धनेंद्र साहू को थमा दिया। बोला, ऐसे मैनेजमेंट करोगे तो उम्मीदवार हारेगा नहीं, तो क्या जीतेगा। यह तो महज एक बानगी है। ऐसे सैकडों वाकया हैं, जो प्यादे से वजीर बने की ताकत का एहसास कराते हैं। खैर, नए अध्यक्ष को वजीर माना जा रहा है। देखते हैं नई कार्यकारिणी में वे कितने प्यादे और कितने वजीर शामिल करते हैं।

Sunday, April 17, 2011

छत्तीसगढ में कांग्रेस की राहुल ब्रिगेड कब!

नए प्रदेश अध्यक्ष से काफी उम्मीद, चुनौतीपूर्ण होगा राहुल के सपनों की टीम चुनना

मृगेंद्र पांडेय

कांग्रेस की राजनीति में छत्तीसगढ के छत्रपों को बदलने का वक्त का गया है। एक दशक की राजनीति में छत्तीसगढ में छह छत्रपों का राज रहा। ये छत्रप पार्टी को वह दिशा नहीं दे सके, जिसकी इनसे उम्मीद की गई थी। नया राज्य बनने के बाद हुए दोनों विधानसभा चुनाव में पार्टी को हार का सामना करना पडा। इस दौरान इन छत्रपों की मनमानी के आगे आलाकमान लाचार था। कोई भी नया प्रयोग करने में पार्टी ने हमेशा अपने पैर पीछे ही रखे। इसका असर मतदाताओं की सोच पर भी पडा।

लोकतंत्र की नंबर वाली भीड में प्रयोग से बचती कांग्रेस के हाथ आम आदमी से दूर होते गए। अब लंबे समय बाद एक उम्मीद जगी है। कांग्रेस ने पार्टी अध्यक्ष के लिए एक ऐसे नेता का चयन किया है, जो तेज-तर्रार है। जिसके पास प्रदेश में बिखरी कांग्रेस को जोडने का माददा है। जो कांग्रेस के जोगी गुट के नजदीक भी है और दूर भी। नए अध्यक्ष पर नए सिरे से प्रदेश में पार्टी को खडा करने का दबाब है। ऐसी पार्टी जो अतीत की नींव पर भविष्य की नींव हो। मतलब साफ है प्रदेश की इंदिरा कांग्रेस में राहुल ब्रिगेड को मौका देना ही होगा।

राहुल गांधी में सक्रिय राजनीति में युवक कांग्रेस और भारतीय राष्टीय छात्र संगठन की जिम्मेदारी संभाल रखी है। इन दोनों संगठनों में राहुल आने वाली कांग्रेस में अपनी ब्रिगेड खडी करने की तैयारी में हैं। लोकसभा चुनाव में भी 80 से ज्याद युवाओं को और केरल, पश्चिम बंगाल और असम विधानसभा चुनाव में 20 फीसदी के करीब युवाओं को टिकट दिलाकर यह संकेत भी दे दिया है कि अब प्रदेशों में और विधानसभा में भी राहुल ब्रिगेड ही चलेगी। ऐसे में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के सामने उन सक्रिय युवाओं को खोजने और निखारने की जिम्मेदारी होगी, जो 35 से 45 की उम्र के हों। इन युवाओं को जिम्मेदारी देने से पार्टी में लंबे समय से जमे छत्रपों को आसानी से किनारे भी किया जा सकता है और शांत पडी पार्टी में नया जोश भी फूंका जा सकता है। अगर नंद कुमार पटेल अपनी टीम में 20 फीसदी युवाओं को मौका दे देते हैं, तो प्रदेश में भाजपा सरकार के लिए मुश्किलें जरुर खडी हो सकती है।

प्रदेश कार्यकारिणी में आए नए युवाओं पर खुद को साबित करने का दबाव तो रहेगा ही, साथ ही पटेल उनसे योजनाबदृध तरीके से काम भी ले सकते हैं। पिछले चुनावों में हार का बडा कारण छत्रपों के आगे कमजोर प्रदेश अध्यक्ष को माना गया है। ऐसे में छत्रपों को किनारे कर नंद कुमार युवाओं को मौका देने की सोचें तो पार्टी में नई पौध विकसित हो सकती है। लेकिन ऐसा करने में नंदकुमार को अपनी कुर्सी जाने का भी डर बना रहेगा। प्रदेश कांग्रेस भवन में तो इस बात की चर्चा है कि नए प्रदेश अध्यक्ष के साथ एक-दो महीने में कार्यकारी अध्यक्ष की भी घोषणा हो जाएगी। मतलब फिर कांग्रेस ढाक के तीन पात होगी। अगर ऐसा होता है तो एक बार फिर प्रदेश को कांग्रेस की राहुल ब्रिगेड के लिए इंतजार ही करना होगा।

रमन सिंह की शांति-पहल के निहितार्थ

अनुज शुक्ला
पिछले कई दिनों से छत्तीसगढ़ राज्य डा.विनायक सेन को लेकर राष्ट्रीय और
अंतर्राष्ट्रीय बहसों के केंद्र में रहा है। राज्य की मौजूदा
प्रवृत्तियों के आधार पर वहां लोकतंत्र को लेकर तमाम तरीके की आशंकाएँ
व्यक्त की जा रही हैं। दस साल पहले कुछ बुनियादी जरूरतों में सुधार को
लेकर राज्य गठन की प्रक्रिया को बल दिया गया था और यह माना गया था कि
अनुसूचित जातियों और जनजातियों की लगभग आधी आबादी वाले इस राज्य में नए
राज्य बनने के बाद, वर्षों-पर्यंत चली आ रही समस्याओं का समाधान कर लिया
जाएगा। समाधान तो संभव नहीं हुआ लेकिन वैश्वीकरण की प्रक्रिया में विकास
के नाम पर एक राज्य के शैशवी सपनों और कौमार्य का गला घोट दिया गया।

उनकी आँखों के सामने ही कार्पोरेटीय पिट्ठुओं के माध्यम से पूरी की पूरी
सभ्यता को नष्ट करने का दुस्साहसी उपक्रम किया जाने लगा। यह निश्चित ही
सत्य माना जाएगा कि पिछले कई दिनों से राज्य नक्सलवाद को लेकर
समस्याग्रस्त रहा है। लेकिन क्या नक्सली हिंसा के इस सत्र में सारा
दोषारोपण पक्ष विशेष पर किया जाना न्यायसंगत होगा, जबकि ऐसे कोई आधार
नहीं मिलते कि राज्य के ऊपर लगे आरोपों को भी बेबुनियाद साबित किया जा
सके? बहरहाल एक राज्य का यह अपना राजनीतिक मामला हो सकता है। लेकिन देश
के अन्य हिस्सों की हजारो-हजार जनता यह अवश्य जानना चाहेगी कि वाकई वहां
हो क्या रहा है? छत्तीसगढ़ की स्थिति और पुलिसिया आतंक का अंदाजा एक
पत्रकार के इस बयान से लगाया जा सकता है कि ‘वहां जाकर सारी जिंदगी जेल
में नहीं गुजारनी है’।

अभी हाल के दिनों में राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने एक प्रेस कान्फ्रेंस और बीबीसी को दिए साक्षात्कार में यह बयान
दिया कि ‘ मैं हर हाल में राज्य में शांति का पक्षधर हूँ’। छत्तीसगढ़ एक विपन्न राज्य की भयावह कहानी है जहां आंकडों के गोलमाल के द्वारा देश-विदेश के दूसरे हिस्सों में भ्रामक सूचनाओं का
सरकारी प्रसार किया जा रहा है। उदाहरण स्वरूप रमन सिंह का यह विज्ञापन
देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपवाया गया कि ‘छत्तीसगढ़ में पाँच सालों
में विकास दर 10.5 फीसदी दर्ज की गई जो मोदी के अतुल्य गुजरात से भी
ज्यादा है’ और एक अनुमान में कहा गया है कि यह 2011 में 11.47 फीसदी तक
पहुँच जाएगा। कृषि दर भी 2.3 के राष्ट्रीय दर की अपेक्षा 4.7 फीसदी है जो
अगले साल छः फीसदी के जादुई आंकड़े को पार कर जायेगी। इन आंकडों पर दूसरी
अन्य सरकारी और गैर सरकारी सांख्यिकीय संस्थाएं अट्ठहास कर रही हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड व्यूरों के अनुसार 2009 में छत्तीसगढ़ में 18011
पात्र किसान आत्महत्याएँ हुई हैं, जो विदर्भ के पात्र किसान आत्महत्याओं
से भी ज्यादा हैं। इन आंकडों को लेकर राज्य सरकार और राष्ट्रीय अपराध
रिकार्ड व्यूरो के बीच मतभेद भी व्याप्त है। जहां विशेषज्ञों का यह मानना
है कि राज्य में आत्महत्याओं को दर्ज करने की पुलिसिया तकनीकी के कारण
ये काफी कम मात्रा में दर्ज की जा सकी हैं जबकि राज्य में इससे कहीं
ज्यादा आत्महत्याओं से इंकार नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर छत्तीसगढ़
प्रशासन अपने बयानों के द्वारा यह आरोप चस्पा कर रहा है कि ये आंकड़े भी
पूर्वाग्रही हैं।

मानो बहस का यह मुद्दा नहीं है कि समस्या का समाधान
कैसे किया जाय बल्कि यह साबित करने का प्रयास हो रहा है कि तुम्हारे यहां
के मुक़ाबले हमारे यहां समस्या कम है। ठीक वैसे ही जैसे महिला उत्पीड़न के
मामलों को लेकर दिल्ली और उत्तर प्रदेश परस्पर एक दूसरे को बढ़ा-चढ़ा कर
पेश करते हैं। चलिए एक क्षण के लिए यह मान लिया जाय कि ये आंकड़े
विरोधाभास लिए हुए हैं लेकिन काबिलेगौर है कि जब राज्य में कृषि विकास की
राष्ट्रीय दर 4.7 फीसदी है तो आखिर वे कौन से कारण हैं जिनसे 18011 किसान
आत्महत्याएं हुई हैं? यह राज्य के कृषि विकास दर की बेबुनियाद बढ़त की पोल
खोलता है। छत्तीस गढ़ का एक कटु सत्य है कि वहाँ के खेतिहर किसान आर्थिक
विपन्नता के कारण देश के अन्य हिस्सों में मजदूरी के लिए पलायन कर रहे
हैं। दूसरी ओर जिस 65 फीसदी बजट को राज्य स्वयं जुटाने की बात कर रहा है
उसकी भी सच्चाई उजागर की जानी चाहिए। क्या इससे इंकार किया जा सकता है कि
इस 65 फीसदी हिस्सेदारी में एक बड़ा हिस्सा राज्य के निगमीकरण के कारण
प्राप्त हो रहा है। राज्यों के खनिजों के दोहन के लिए निगमों द्वारा
प्रदान किया जा रहा है। आखिर जब राज्य अपने बजट का 45 फीसदी हिस्सा
आदिवासियों और अनुसूचित जन जातियों पर खर्च कर रहा है तो फिर क्यों आज
बिहार और उत्तर प्रदेश की बजाय छत्तीसगढ़ की आबादी रोजगार के लिए
पर-प्रान्तों की ओर पलायन कर रही है।

रमन सिंह का पूरा इशारा शांति और तथाकथित विकास के आलाप की ओर है। लेकिन
शांति का आधार क्या? राज्य के आलोकतांत्रिक रवैये की तरफ ध्यान न दिया
जाना या हर हाल में सिर्फ और सिर्फ चुप रहना। राज्य के नागरिकों में रमन
सिंह सरकार को लेकर जैसा लोकतान्त्रिक भय बना हुआ है क्या वह किसी भी ढंग
से जनतंत्र के लिए शुभ कदम माना जाएगा। क्योंकि असहमति को राज्य सीधे
तौर पर देशद्रोह की कृत्यों के साथ जोड़ कर देख रही है। सरकार का
नक्सलियों पर यह आरोप कि वह राज्य में आदिवासी बच्चों को 12 साल की उम्र
में बंदूक पकड़ा देती है तो रमन सरकार भी इस आरोप से नहीं उबर सकती कि
उसने सलवा जुड़ूम के नाम पर हजारों नाबालिक आदिवासियों को कलम और किताबें
देने की बजाय बंदूके पकड़ाकर कभी न थमने वाले हिंसा के रसातल में धकेला
है। पिछले सात सालों में गतिरोध को कम करने की बजाय दमनकारी और
ध्वंसात्मक तरीके से इसे बढ़ाने का ही काम किया। दरअसल राज्य में जन
विरोधी विचारधारा के प्रति संवेदना रखना, राज्य की असंवैधानिक
कार्रवाइयों के खिलाफ असहमति व्यक्त करना छत्तीसगढ़ी होने का राजकीय
अभिशाप है ।

अनुज शुक्ला.(स्वतंत्र पत्रकार)