जगदीश्वर चतुर्वेदी
अन्ना हजारे -अरविंद केजरीवाल और बाबा रामदेव के बयानों में एक खास किस्म का भ्रष्टाचार निरंतर चल रहा है। इन लोगों की बातों और समझ में भ्रष्टाचार कोई नई बात नहीं है। यह एनजीओ राजनीति विमर्श की पुरानी बीमारी है। जन लोकपाल बिल का लक्ष्य है आर्थिक भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सक्रिय कानूनी तंत्र का गठन। यह बहुत ही सीमित उद्देश्य है। निश्चित रूप से इतने सीमित लक्ष्य की जंग को आप धर्मनिरपेक्षता, साम्प्रदायिकता, संघ परिवार आदि के पचड़ों नहीं फंसा सकते।
अरविंद केजरीवाल ने 14 अप्रैल 2011 को टाइम्स आफ इण्डिया में लिखे अपने स्पष्टीकरण में साफ कहा है कि “हमारा आंदोलन धर्मनिरपेक्ष और गैरदलीय है।” सतह पर इस बयान से किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती। समस्या है अन्ना हजारे के कर्म की। वे क्या बयान देते हैं उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है उनका कर्म। पर्यावरण के नाम पर उन्होंने जो आंदोलन चलाया हुआ है और अपने हरित गांवों में जो सांस्कृतिक वातावरण पैदा किया है वो उनके विचारधारात्मक चरित्र को समझने के लिए काफी है। कायदे से अरविंद केजरीवाल को मुकुल शर्मा के द्वारा काफिला डॉट कॉम पर लिखे लेख का जबाब देना चाहिए। बेहतर तो यही होता कि अन्ना हजारे स्वयं जबाव दें।
अरविंद केजरीवाल का टाइम्स ऑफ इण्डिया में जो जबाव छपा है वह अन्ना हजारे को धर्मनिरपेक्ष नहीं बना सकता। अन्ना ने पर्यावरण को धर्म से जोड़ा है। पर्यावरण संरक्षण का धर्म से कोई संबंध नहीं है। अन्ना ने पर्यावरण संरक्षण को हिन्दू संस्कारों और रीति-रिवाजों से जोड़ा है। अन्ना का सार्वजनिक आंदोलन को धर्म से जोड़ना अपने आप में साम्प्रदायिक कदम है।
अन्ना के तथाकथित एनजीओ आंदोलन की धुरी है संकीर्ण हिन्दुत्ववादी विचारधारा। जिसकी किसी भी समझ से हिमायत नहीं की जा सकती। अन्ना हजारे को लेकर चूंकि मीडिया में महिमामंडन चल रहा है और अन्ना इस महिमामंडन को भुना रहे हैं, इसलिए उनके इस वर्गीय चरित्र की मीमांसा करने की भी जरूरत महसूस नहीं की गई ।
अन्ना ने अपने एक बयान में कहा है कि ” मेरा अनशन किसी सरकार या व्यक्ति के खिलाफ पूर्वाग्रहग्रस्त नहीं था बल्कि वह तो भ्रष्टाचार के खिलाफ था। क्योंकि इसका आम आदमी पर सीधे बोझा पड़ रहा है।” अन्ना का यह बयान एकसिरे से गलत है अन्ना ने अनशन के साथ ही अपना स्टैंण्ड बदला है। अन्ना का आरंभ में कहना था केन्द्र सरकार संयुक्त मसौदा समिति की घोषणा कर दे मैं अपना अनशन खत्म कर दूँगा। बाद में अन्ना को लगा कि केन्द्र सरकार उनके संयुक्त मसौदा समिति के प्रस्ताव को तुरंत मान लेगी और ऐसे में अन्ना ने तुरंत एक नयी मांग जोड़ी कि मसौदा समिति का अध्यक्ष उस व्यक्ति को बनाया जाए जिसका नाम अन्ना दें। केन्द्र ने जब इसे मानने से इंकार किया तो अन्ना ने तुरंत मिजाज बदला और संयुक्त अध्यक्ष का सुझाव दिया लेकिन सरकार ने यह भी नहीं माना और अंत में अध्यक्ष सरकारी मंत्री बना और सह-अध्यक्ष गैर सरकारी शांतिभूषण जी बने। लेकिन दिलचस्प बात यह हुई कि अन्ना इस समिति में आ गए। जबकि वे आरंभ में स्वयं नहीं रहना चाहते थे। मात्र एक कमेटी के निर्माण के लिए अन्ना ने जिस तरह प्रतिपल अपने फैसले बदले उससे साफ हो गया कि पर्दे के पीछे कुछ और चल रहा था।
अन्ना हजारे के इस आंदोलन के पीछे मनीपावर भी काम करती रही है इसका साक्षात प्रमाण है मात्र 4 दिन में इस आंदोलन के लिए मिला 83 लाख रूपये चंदा और इस समिति के लोगों ने इसमें से तकरीबन 32 लाख रूपये खर्च भी कर दिए। टाइम्स ऑफ इण्डिया में 15 अप्रैल 2011 को प्रकाशित बयान में इस ग्रुप ने कहा है -
“it has received a total donation of Rs 82,87,668.”.. “spokesperson said, they have spent Rs 32,69,900.” यानी अन्ना हजारे के लिए आंदोलन हेतु संसाधनों की कोई कमी नहीं थी। मात्र 4 दिनों 83 लाख चंदे का उठना इस बात का संकेत है कि अन्ना के पीछे समर्थ लॉबी काम करती रही है। अन्ना हजारे के आंदोलन की मीडिया हाइप का यह सीधे फल है जो अन्ना के भक्तों को मिला है। एनजीओ संस्कृति नियोजित पूंजी की संस्कृति है। स्वतःस्फूर्त संस्कृति नहीं है बल्कि निर्मित वातावरण की संस्कृति है।
एनजीओ समुदाय में काम करने वाले लोगों की अपनी राजनीति है।विचारधारा है और वर्गीय भूमिका भी है। वे परंपरागत दलीय राजनीति के विकल्प के रूप में काम करते रहे हैं। अन्ना हजारे के इस आंदोलन के पीछे जो लोग हठात सक्रिय हुए हैं उनमें एक बड़ा अंश ऐसे लोगों का है जो विचारों से संकीर्णतावादी हैं।
मीडिया उन्माद,अन्ना हजारे की संकीर्ण वैचारिक प्रकृति और भ्रष्टाचार इन तीनों के पीछे सक्रिय सामाजिक शक्तियों के विचारधारा त्मक स्वरूप का विश्लेषण जरूर किया जाना चाहिए। इस प्रसंग में इंटरनेट पर सक्रिय भ्रष्टाचार विरोधी फेसबुक मंच पर आयी टिप्पणियों का सामाजिक संकीर्ण विचारों के नजरिए से अध्ययन करना बेहतर होगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ सक्रिय लोग इतने संकीर्ण और स्वभाव से फासिस्ट हैं कि वे अन्ना हजारे के सुझाव से इतर यदि कोई व्यक्ति सुझाव दे रहा है तो उसके खिलाफ अपशब्दों का जमकर प्रयोग कर रहे हैं। वे इतने असहिष्णु हैं कि अन्ना की सामान्य सी भी आलोचना करने वाले पर व्यक्तिगत कीचड उछाल रहे हैं। औगात दिखा देने की धमकियां दे रहे हैं। यह अन्ना के पीछे सक्रिय फासिज्म है।
अन्ना की आलोचना को न मानना,आलोचना करने वालों के खिलाफ हमलावर रूख अख्तियार करना संकीर्णतावाद है। इस संकीर्णतावाद की जड़ें भूमंडलीकरण में हैं। अन्ना हजारे और उनकी भक्तमंडली के सामाजिक चरित्र में व्याप्त इस संकीर्णतावाद का ही परिणाम है कि अन्ना हजारे स्वयं भी कपिल सिब्बल की सामान्य सी टिप्पणी पर भड़क गए और उनसे मसौदा कमेटी से तुरंत हट जाने की मांग कर बैठे।
अन्ना हजारे फिनोमना हमारे सत्ता सर्किल में पैदा हुए संकीर्णतावाद का एनजीओ रूप है जिसका समाजविज्ञान में भी व्यापक आधार है। वरना यह कैसे हो सकता है कि अन्ना हजारे के संकीर्ण हिन्दुत्ववादी विचारों को जानने के बाबजूद बड़े पैमाने पर लोकतांत्रिक मनोदशा के लोग उनके साथ हैं। ये ही लोग प्रत्यक्षतः आरएसएस के साथ खड़े होने के लिए तैयार नहीं हैं लेकिन अन्ना हजारे के साथ खड़े होने के लिए तैयार हैं जबकि अन्ना के विचार उदार नहीं संकीर्ण हैं। इससे यह भी पता चलता है कि एजीओ संस्कृति की आड़ में संकीर्णतावादी -प्रतिगामी विचारों की जमकर खेती हो रही है,उनका तेजी से मध्यवर्ग में प्रचार-प्रसार हो रहा है।
अन्ना मार्का संकीर्ण विचार के प्रसार का बड़ा कारण है उनका सत्ता के विचारों का विरोध करना। वे सत्ता की विचारधारा का विरोध करते हैं और अपने विचारों को सत्ता के विचारों के विकल्प के रूप में पेश करते हैं। उन्होंने अपने को सुधारवादी -लिबरल के रूप में पेश किया हैं। वे हर चीज को तात्कालिक प्रभाव के आधार पर विश्लेषित कर रहे हैं। वे सत्ता के विकल्प का दावा पेश करते हुए जब भी कोई मांग उठाते हैं ,उसके तुरंत समाधान की मांग करते हैं, और जब वे चटपट समाधान कराने में सफल हो जाते हैं तो दावा करते हैं कि देखो हम कितने सही हैं और हमारा नजरिया कितना सही है। अन्ना हजारे का मानना यही है, उन्होंने जन लोकपाल बिल की मांग की और 4 दिन में केन्द्र सरकार ने उनकी मांग को मान लिया।यही सरकार 42 साल से नहीं मान रही थी,लेकिन अन्ना की मांग को 4 दिन में मान लिया।
अन्ना हजारे टाइप लोग ‘पेंडुलम इफेक्ट’ की पद्धति का व्यवहार करते हैं। चट मगनी पट ब्याह। इसके विपरीत लोकपाल बिल का सत्ता विमर्श बोरिंग,दीर्घकालिक और अवसाद पैदा करने वाला था। इसके प्रत्युत्तर में अन्ना हजारे टाइप एक्शन रेडीकल और तुरत-फुरत वाला था। यह बुनियादी तौर पर संकीर्णतावादी आर्थिक मॉडल से जुड़ा फिनोमिना है।
अन्ना के एक्शन ने संदेश दिया कि वह चटपट काम कर सकते हैं। जो काम 42 सालों में राजनीतिक दलों ने नहीं किया उसे हमने मात्र 4 दिन में कर दिया। लोकपाल बिल के पास होने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी हमने इसके पास होने की उम्मीदें जगा दी। निराशा में आशा पैदा करना और इसकी आड़ में वैज्ञानिक बुद्धि और समझ को छिपाने की कला काम करती रही है। दूसरा संदेश यह गया कि सरकार परफेक्ट नहीं हम परफेक्ट हैं। सरकार की तुलना में अन्ना की प्रिफॉर्मेंश सही है।जो काम 42 साल से राजनीतिक दल नहीं कर पाए वह काम एनजीओ और सिविल सोसायटी संगठनों ने कर दिया। इस काम के लिए जरूरी है कि सत्ता के साथ एनजीओ सक्रिय भागीदारी निभाएं।
रामविलास पासवान ने जब लोकपाल बिल की मसौदा कमेटी में दलित भागीदारी की मांग की तो भ्रष्टाचार विरोधी मंच के लोग बेहद खफा हो गए। दूसरी ओर अन्ना ने भी कमेटी के लिए जिन लोगों के नाम सुझाए वे सभी अभिजन हैं। इससे अन्ना यह संदेश देना चाहते हैं कि वे लोकतंत्र में अभिजन के प्रभुत्व को मानते हैं। आम जनता सिर्फ वोट दे,शिरकत करे। लेकिन कमेटी में अभिजन ही रहेंगे। अन्ना हजारे इस सांकेतिक फैसले का अर्थ है लोकतंत्र में सत्ता और आम जनता के बीच खाई बनी रहेगी।
इसके अलावा अन्नामंडली ने इस पूरे लोकतांत्रिक मसले को गैरदलीय और अ-राजनीतिक बनाकर पेश किया। इससे यह संदेश गया कि लोकतंत्र में राजनीति की नहीं अ-राजनीति की जरूरत है। अन्ना हजारे के अनशन स्थल पर उमाभारती आदि राजनेताओं के साथ जो दुर्व्यवहार किया गया उसने यह संदेश दिया कि जनता और राजनीति के संबंधों का अ-राजनीतिकरण हो गया है। और आम जनता को राजनीतिक प्रक्रिया से अलग रहना चाहिए राजनीति दल चोर हैं,भ्रष्ट हैं। इस तरह अन्ना मुक्त बाजार में मुक्त राजनीति के नायक के रूप में उभरकर सामने आए हैं।
अन्ना ने एनजीओ राजनीति को उपभोक्ता वस्तु की तरह बेचा है। जिस तरह किसी उपभोक्ता वस्तु का एक व्यावसायिक और विज्ञापन मूल्य होता है।ठीक वैसे ही अन्ना हजारे मार्का आमरण अनशन का मासमीडिया ने इस्तेमाल किया है। उन्होंने अन्ना के आमरण अनशन और उसकी उपयोगिता पर बार बार बलदिया। उसका टीवी चैनलों के जरिए लंबे समय तक लाइव टेलीकास्ट किया।
अन्ना के आमरण अनशन की प्रचार नीति वही है जो किसी भी माल की होती है। अन्ना ने कहा ‘तेरी राजनीति से मेरी राजनीति श्रेष्ठ है।’ इसके लिए उन्होंने नागरिकों की व्यापक भागीदारी को मीडिया में बार बार उभारा और सिरों की गिनती को महान उपलब्धि बनाकर पेश किया। यह वैसे ही है जैसे वाशिंग मशीन के विज्ञापनदाता कहते हैं कि 10 करोड़ घरों में लोग इस्तेमाल कर रहे हैं तुम भी करो। अन्ना की मीडिया टेकनीक है चूंकि इतने लोग मान रहे हैं अतः तुम भी मानो। यह विज्ञापन की मार्केटिंग कला है।
टीवी कवरेज में बार-बार एक बात पर जोर दिया गया कि देखो अन्ना के समर्थन में “ज्यादा से ज्यादा” लोग आ रहे हैं। “ज्यादा से ज्यादा” लोगों का फार्मूला आरंभ हुआ चंद लोगों से और देखते ही देखते लाखों -लाख लोगों के जनसमुद्र का दावा किया जाने लगा। चंद से लाखों और लाखों से करोड़ों में बदलने की कला विशुद्ध विज्ञापन कला है। इसका जनता की हिस्सेदारी के साथ कोई संबंध नहीं है। यह विशुद्ध मीडिया उन्माद पैदा करने की कला है जिसका निकृष्टतम ढ़ंग से अन्नामंडली ने इस्तेमाल किया।
टीवी कवरेज में एक और चीज का ख्याल रखा गया और वह है क्रमशः जीत या उपलब्धि की घोषणा। विज्ञापन युद्ध की तरह शतरंज का खेल है। इसमें आप जीतना जीतते हैं उतने ही सफल माने जाते हैं।जितना अन्य का व्यापार हथिया लेते हैं उतने ही सफल माने जाते हैं। अन्नामंडली ने ठीक यही किया आरंभ में उन्होंने प्रचार किया कि केन्द्र सरकार जन लोकपाल बिल के पक्ष में नहीं है। फिर बाद में दो दिन बाद खबर आई कि सरकार झुकी, फिर खबर आई कि सरकार ने दो मांगें मानी,फिर खबर आई कि खाली मसौदा समिति के अध्यक्ष के सवाल पर मतभेद है,बाद में खबर आई कि सरकार ने सभी मांगें मान लीं। क्रमशः अन्ना की जीत की खबरों का फ्लो बनाए रखकर अन्नामंडली ने अन्ना को एक ब्राँण्ड बना दिया। उन्हें भ्रष्टाचारविरोधी ब्राँण्ड के रूप में पेश किया।
अन्ना के व्यक्तिवाद को खूब उभारा गया। अन्ना के व्यक्तिवाद को सफलता के प्रतीक के रूप में पेश किया गया। मीडिया कवरेज में अन्ना मंडली ने आंदोलन के ‘युवापन’ को खूब उभारा,जबकि सच यह है कि अन्ना ,अग्निवेश,किरन बेदी में से कोई भी युवा नहीं है। आमरण अनशन का नेतृत्व एक बूढ़ा कर रहा था। इसके बाबजूद कहा गया यह युवाओं का आंदोलन है। आरंभ में इसमें युवा कम दिख रहे थे लेकिन प्रचार में युवाओं पर तेजी से इंफेसिस दिया गया। आखिर इन युवाओं को प्रचार में निशाना बनाने की जरूरत क्यों पड़ी ? आखिर अन्ना के आंदोलन में किस तरह का युवा था ?
अन्ना की मीडिया टेकनीक ‘सफलता’ पर टिकी है। ‘सफलता’ पर टिके रहने के कारण अन्ना को सफल होना ही होगा। यदि अन्ना असफल होते हैं तो संकीर्णतावाद का प्रचार मॉडल पिट जाता है। अन्ना के बारे में बार-बार यही कहा गया कि देखो उन्होंने कितने ‘सफल’ आंदोलनों का नेतृत्व किया। एनजीओ संस्कृति और संघर्ष की रणनीति में ‘सफलता’ एक बड़ा फेक्टर है जिसके आधार पर अ-राजनीति की राजनीति को सफलता की ऊँचाईयों के छद्म शिखरों तक पहुँचाया गया।
अन्नामंडली की मीडिया रणनीति की सफलता है कि वे अपने आंदोलन को नियोजित और पूर्व कल्पित की बजाय स्वतःस्फूर्त और स्वाभाविक रूप में पेश करने में सफल रहे। जबकि यह नियोजित आंदोलन था। जब आप किसी आंदोलन को स्वतःस्फूर्त और स्वाभाविक रूप में पेश करते हैं तो सवाल खड़े नहीं किए जा सकते। यही वजह है अन्ना हजारे,उनकी भक्तमंडली,आमरण अनशन,लोकपाल बिल,भ्रष्टाचार आदि पर कोई परेशानी करने वाला सवाल करने वाला तुरंत बहिष्कृतों की कोटि में डाल दिया जाता है। अन्ना ने इस समूचे प्रपंच को बड़ी ही चालाकी के साथ भ्रष्टाचार के कॉमनसेंस में रखकर पेश किया। भ्रष्टाचार के कॉमनसेंस में आमरण अनशन को पेश करने का लाभ यह हुआ कि आमरण अनशन पर सवाल ही नहीं उठाए जा सकते थे। भ्रष्टाचार के कॉमनसेंस में पेश करने के कारण ही अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार को अतिसरल बना दिया और उसकी तमाम जटिलताओं को छिपा दिया। भ्रष्टाचार के कॉमनसेंस में जब जन लोकपाल बिल और भ्रष्टाचार को पेश किया तो दर्शक को इस मांग और आंदोलन के पीछे सक्रिय विचारधारा को पकड़ने में असुविधा हुई। भ्रष्टाचार के कॉमनसेंस को दैनंदिन जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार के फुटेजों के जरिए पुष्ट किया गया।
एनजीओ संकीर्णतावाद के पीछे लोगों को गोलबंद करने के लिए कहा गया कि राजनीतिज्ञ ,राजनीतिक प्रक्रिया,चुनाव आदि भ्रष्ट हैं। इससे एनजीओ संकीर्णतावाद और अन्नामंडली के प्रतिगामी विचारों को वैधता मिली।
Saturday, April 16, 2011
भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के प्रति सकारात्मक सोच रखने की ज़रूरत
निर्मल रानी
वरिष्ठ गांधीवादी नेता अन्ना हज़ारे द्वारा जंतर मंतर पर अपना आमरण अनशन समाप्त किए जाने के बाद देश में भ्रष्टाचार जैसे नासूर रूपी मुद्दे को लेकर अब एक और नई बहस छिड़ गई है। अब यह शंका ज़ाहिर की जाने लगी है कि केंद्र सरकार द्वारा अन्ना हज़ारे की जन लोकपाल विधेयक बनाए जाने की मांग को स्वीकार करने के बाद तथा इसके लिए प्रारूप समिति का गठन किए जाने के बाद क्या अब इस बात की उमीद की जा सकती है कि देश से भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा? इसके अतिरिक्त और भी कई प्रकार के प्रश्न जंतर मंतर के इस ऐतिहासिक अनशन के बाद उठने लगे हैं। उदाहरण के तौर पर क्या अन्ना हज़ारे के इर्द गिर्द रहने वाले सभी प्रमुख सहयोगी व सलाहकार भ्रष्टाचार से पूरी तरह मुक्त हैं? एक प्रश्र यह भी खड़ा हो रहा है कि समाजसेवियों तथा राजनेताओं की तुलना में राजनेता कहीं अब अपनी विश्वसनीयता खोते तो नहीं जा रहे हैं? एक और प्रश्र यह भी लोगों के ज़ेहन में उठ खड़ा हुआ है कि भ्रष्टाचार के विरूद्ध आखिर राजनेताओं अथवा राजनैतिक दलों के बीच से आखिर भ्रष्टाचार विरोधी ऐसी आवाज़ अब तक पहले क्यों नहीं उठी जो सामाजिक संगठनों तथा स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा आज़ादी के 64 वर्षों बाद उठाई गई।
एक अनुमान के अनुसार हमारे देश में लगभग दस प्रतिशत लोग ही ऐसे हैं जो भ्रष्टाचार को अपनी दिनचर्या में प्रमुख रूप से शामिल करते हैं। चाहे वे राजनीति के क्षेत्र में हों या सरकारी सेवा अथवा उद्योग आदि से संबंधित। इसी प्रकार 10प्रतिशत के लगभग लोग ही ऐसे हैं जो इन भ्रष्टाचारियों के सर्मथक हैं या इनके नेटवर्क का हिस्सा हैं। देश की शेष लगभग 80 प्रतिशत आबादी भ्रष्टाचार से मुक्त है। इसके बावजूद 20प्रतिशत भ्रष्टाचारी तबके ने पूरे देश को बदनाम कर रखा है। इतना ही नहीं बल्कि इन भ्रष्टाचारियों के कारण ईमानदार व्यक्ति का जीना भी दुशवार हो गया है। देश में तमाम ईमानदार व कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति इन भ्रष्टाचारियों के हाथों अपनी जान की कुर्बानी तक दे चुके हैं। परंतु चिंतनीय विषय यह है कि भ्रष्टाचारियों के लगभग बीस प्रतिशत के इस नेटवर्क ने देश की लोकसभा, राज्य सभा तथा देश की अधिकतर विधानसभाओं से लेकर अफसरशाही तक पर अपना शिकं जा इस प्रकार कस लिया है कि ईमानदार नेता व अधिक ारी भी या तो इनको संरक्षण देने के लिए मजबूर होते दिखाई दे रहे हैं या फिर इनके विरूद्ध जानबूझ कर किसी प्रकार की क़ कानूनी कारवाई करने से कतराते व हिचकिचाते रहते हैं। कहा जा सकता है कि ईमानदार नेताओं व अधिकारियों की यही खामोशी, निष्क्रियता व उदासीनता ही भ्रष्टाचार व भ्रष्टाचारियों के नापाक इरादों को परवान चढ़ाने का एक प्रमुख कारण है।
अब यदि सत्ता में बने रहने या चुनाव में धन बल का समर्थन प्राप्त करने के लिए भ्रष्टाचारियों से समझौता करना राजनीतिज्ञों की मजबूरी समझ ली जाए फिर तो देश को भ्रष्टाचार को एक यथार्थ के रूप मेंस्वीकार करना ही बेहतर होगा। और यदि देश ने ऐसा किया तो यह गांधी, सुभाष, आज़ाद, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू, अशफाक़उल्ला, तिलक, नेहरू तथा पटेल जैसे उन तमाम स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों पर कुठाराघात होगा जिन्होंने देश को अंग्रेज़ों से मुक्त कराकर स्वाधीन, प्रगतिशील एवं आत्मर्निार भारत के निर्माण का सपना देखा था। इसी स्वर्णिम स्वप्र को साकार रूप देने हेतु भारतीय संविधान की रचना की गई थी जिसके तहत भारत को एक धर्म निरपेक्ष लोकतंत्र घोषित किया गया था। परंतु यह हमारे स्वतंत्रता सेनानियों तथा शहीदों का घोर अपमान ही समझा जाएगा कि उनकी बेशकीमती कुर्बानियों की बदौलत देश आज़ाद तो ज़रूर हो गया परंतु वास्तविक लोकतंत्र शायद अब तक नहीं बन सका । इसके विपरीत देशवासियों को आज ऐसा महसूस होने लगा है कि देश में लोकतंत्र के नाम पर भ्रष्टतंत्र स्थापित हो चुका है। और इससे बड़े दुर्भाग्य की बात यह है कि गत् 64 वर्षों से आज़ाद हिंदुस्तान के इतिहास में भ्रष्टाचार को लेकर छाती पीटने का ढोंग करते तो तमाम नेता व राजनैतिक दल दिखाई दिए परंतु भ्रष्टाचार के विरुद्ध सड़कों पर तिरंगा लहराता तथा भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को सड़कों पर लाता हुआ कोई भी राजनेता नज़र नहीं आया। और इन 64 वर्षों के बाद पहली बार यदि किसी व्यक्ति ने राष्ट्रव्यापी भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम की अगुवाई का साहस किया तो वह श़िसयत केवल अन्ना हज़ारे जैसा बुज़ुर्ग गांधीवादी नेता की ही हो सकती थी।
अन्ना हज़ारे की कोशिशों तथा आमरण अनशन जैसे उनके बलिदानपूर्ण प्रयास के बाद अब भाजपा के वरिष्ठ नेता तथा पार्टी द्वारा घोषित प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री लाल कृष्ण अडवाणी ने जंतर मंतर पर आयोजित धरने के विषय में अपने ब्लॉग पर यह लिखा है कि- ‘मेरा विचार है कि जो लोग राजनेताओं और राजनीति के विरुद्ध घृणा का माहौल बना रहे हैं वह लोकतंत्र को बड़ा नुकसान पहुंचा रहे हैं। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा अपनाया गया रुख लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह है’। अडवाणी ने अपने यह विचार उस परिपेक्ष्य में व्यक्त किए हैं जबकि जंतर मंतर पर आयोजित हुए भ्रष्टाचार विरोधी धरने व आमरण अनशन के दौरान वहां पहुंचे कई प्रमुख नेताओं जैसे ओम प्रकाश चौटाला, मदन लाल खुराना, मोहन सिंह तथा उमा भारती को उत्साही आंदोलन कर्ताओं ने धरना स्थल से वापस कर दिया था। इन नेताओं के विरूद्ध सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा नारेबाज़ी भी की गई थी। हालांकि नेताओं के विरूद्ध जनता ने किसी प्रकार का अभद्र व्यवहार नहीं किया न ही किसी प्रकार की हिंसा का सहारा लिया। परंतु भ्रष्टाचार से तंग आ चुकी जनता द्वारा भ्रष्टाचार या भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने या इनका समर्थन करने वाले नेताओं के विरूद्ध अपने मामूली से गुस्से या विरोध का प्रदर्शन करना भी स्वाभाविक था। क्या देश की जनता ने 64 वर्षों तक इन्हीं नेताओं से यह आस नहीं बांधे रखी कि आज नहीं तो कल यही नेेता हमें व हमारे देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराएंगे तथा देश को साफ सुथरा शासन व प्रशासन प्रदान करेंगे ? परंतु जनता ने यही देखा कि नेताओं से ऐसी सकारात्मक उमीद रखना तो शायद पूरी तरह बेमानी ही था। क्योंकि इनमें से तमाम नेता या तो भ्रष्टाचार के रंग में स्वयं को पूरी तरह रंग चुके हैं या फिर किसी न किसी प्रकार से भ्रष्टाचार से या भ्रष्टाचारियों से अपना नाता जोड़े हुए हैं।
और यदि ऐसा न होता तो बिना कि सी समाज सेवी संगठन के प्रयासों के तथा अन्ना हज़ारे के आमरण अनशन किए बिना लोकपाल विधेयक अपने वास्तविक तथा जनहित की आकांक्षाओं के अनुरूप अब तक कानून का रूप धारण कर चुका होता। परंतु अफसोस कि यह तब होने जा रहा है जबकि समाजसेवी संगठनों व कार्यकर्ताओं ने सरकार को ऐसा करने के लिए बाध्य किया है। अन्ना हज़ारे ने राजनेताओं के प्रति अडवाणी की चिंताओं के जवाब में अपनी त्वरित टिप्पणी देते हुए यह कहा है कि-‘अडवाणी जी ने जो भी कहा है वह गलत कहा है। यदि अडवाणी जी जैसे नेता सही रास्ते पर होते तो हमें भ्रष्टाचार के खि़लाफ इतना बड़ा क़ दम उठाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।’ अन्ना हज़ारे ने गत दिनों महाराष्ट्र में अपने पैतृक गांव रालेगंज पहुंच कर वहां भी भ्रष्टाचार विरोधी अपने कड़े तेवर उस समय दिखाए जबकि उनके मंच पर भाऊसाहेब आंधेड़कर नामक एक ऐसा पुलिस इंस्पेक्टर सुरक्षा व्यवस्था को नियंत्रित करते हु़ए पहुंच गया जिस पर कि कुछ समय पूर्व ही भ्रष्टाचार का आरोप लगा था। अन्ना हज़ारे ने उसे फौरन अपने मंच से नीचे उतर जाने का निर्देश दिया। और साफ किया कि उनके साथ भ्रष्टाचारियों की जमात के सदस्यों की कोई आवश्यकता नहीं है।
जहां तक भ्रष्टाचार के आरोपों का प्रश्र है तो इलाहाबाद से समाचार तो यहां तक आ रहे हैं कि जन लोक पाल विधेयक की प्रारूप समिति के दो प्रमुख सदस्य पूर्व केंद्रीय मंत्री शांतिभूषण तथा उनके वकील पुत्र प्रशांत भूषण ने इलाहाबाद में 19, एल्गिन रोड, सिविल लाईन्स स्थित एक विशाल कोठी जिसकी कीमत बाज़ार के हिसाब से 20 करोड़ रूपये आंकी जा रही है, को अपने किरायेदार के हाथों मात्र एक लाख रूपये में एग्रीमेंट टू सेल कर दिया है। यदि इस डील में अनियमितताएं उजागर हुईं तो हमें इस बात की भी प्र्रतीक्षा करनी चाहिए कि अन्ना हज़ारे अपने ऐसे क़ानूनी सलाहाकारों से भी अवश्य पीछा छुड़ा लेंगे। परंतु इन सब बातों के बावजूद हमें व हमारे देशवासियों को भ्रष्टाचार विरोधी इस राष्ट्रव्यापी मुहिम के प्रति सकारात्मक सोच अवश्य रखनी चाहिए तथा प्रत्येक व्यक्ति को अपने-अपने स्तर पर इस मुहिम के प्रति अपनी सकारात्मक भूमिका भी निभानी चाहिए।
देश की जनता बिना किसी पूर्व नियोजित कार्यकम के तथा बिना किसी दबाव व लालच के तमाम आशाओं व उमीदों के साथ जिस प्रकार भ्रष्टाचार के विरूद्ध देश में पहली बार लामबंद हुई है उससे अन्ना हज़ारे जैसे समर्पित गांधीवादी नेता को भी काफी बल मिला है तथा वृद्धावस्था में उनके बलिदानपूर्ण हौसले को देखकर जनता में काफी उम्मीदें जगी हैं। लिहाज़ा जनता को भी चाहिए कि वह भ्रष्टाचार जैसे संवेदनशील मुद्दे के विरुद्ध चलने वाली इस राष्ट्रव्यापी मुहिम के प्रति सिर्फ सकारात्मक सोच ही रखे।
वरिष्ठ गांधीवादी नेता अन्ना हज़ारे द्वारा जंतर मंतर पर अपना आमरण अनशन समाप्त किए जाने के बाद देश में भ्रष्टाचार जैसे नासूर रूपी मुद्दे को लेकर अब एक और नई बहस छिड़ गई है। अब यह शंका ज़ाहिर की जाने लगी है कि केंद्र सरकार द्वारा अन्ना हज़ारे की जन लोकपाल विधेयक बनाए जाने की मांग को स्वीकार करने के बाद तथा इसके लिए प्रारूप समिति का गठन किए जाने के बाद क्या अब इस बात की उमीद की जा सकती है कि देश से भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा? इसके अतिरिक्त और भी कई प्रकार के प्रश्न जंतर मंतर के इस ऐतिहासिक अनशन के बाद उठने लगे हैं। उदाहरण के तौर पर क्या अन्ना हज़ारे के इर्द गिर्द रहने वाले सभी प्रमुख सहयोगी व सलाहकार भ्रष्टाचार से पूरी तरह मुक्त हैं? एक प्रश्र यह भी खड़ा हो रहा है कि समाजसेवियों तथा राजनेताओं की तुलना में राजनेता कहीं अब अपनी विश्वसनीयता खोते तो नहीं जा रहे हैं? एक और प्रश्र यह भी लोगों के ज़ेहन में उठ खड़ा हुआ है कि भ्रष्टाचार के विरूद्ध आखिर राजनेताओं अथवा राजनैतिक दलों के बीच से आखिर भ्रष्टाचार विरोधी ऐसी आवाज़ अब तक पहले क्यों नहीं उठी जो सामाजिक संगठनों तथा स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा आज़ादी के 64 वर्षों बाद उठाई गई।
एक अनुमान के अनुसार हमारे देश में लगभग दस प्रतिशत लोग ही ऐसे हैं जो भ्रष्टाचार को अपनी दिनचर्या में प्रमुख रूप से शामिल करते हैं। चाहे वे राजनीति के क्षेत्र में हों या सरकारी सेवा अथवा उद्योग आदि से संबंधित। इसी प्रकार 10प्रतिशत के लगभग लोग ही ऐसे हैं जो इन भ्रष्टाचारियों के सर्मथक हैं या इनके नेटवर्क का हिस्सा हैं। देश की शेष लगभग 80 प्रतिशत आबादी भ्रष्टाचार से मुक्त है। इसके बावजूद 20प्रतिशत भ्रष्टाचारी तबके ने पूरे देश को बदनाम कर रखा है। इतना ही नहीं बल्कि इन भ्रष्टाचारियों के कारण ईमानदार व्यक्ति का जीना भी दुशवार हो गया है। देश में तमाम ईमानदार व कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति इन भ्रष्टाचारियों के हाथों अपनी जान की कुर्बानी तक दे चुके हैं। परंतु चिंतनीय विषय यह है कि भ्रष्टाचारियों के लगभग बीस प्रतिशत के इस नेटवर्क ने देश की लोकसभा, राज्य सभा तथा देश की अधिकतर विधानसभाओं से लेकर अफसरशाही तक पर अपना शिकं जा इस प्रकार कस लिया है कि ईमानदार नेता व अधिक ारी भी या तो इनको संरक्षण देने के लिए मजबूर होते दिखाई दे रहे हैं या फिर इनके विरूद्ध जानबूझ कर किसी प्रकार की क़ कानूनी कारवाई करने से कतराते व हिचकिचाते रहते हैं। कहा जा सकता है कि ईमानदार नेताओं व अधिकारियों की यही खामोशी, निष्क्रियता व उदासीनता ही भ्रष्टाचार व भ्रष्टाचारियों के नापाक इरादों को परवान चढ़ाने का एक प्रमुख कारण है।
अब यदि सत्ता में बने रहने या चुनाव में धन बल का समर्थन प्राप्त करने के लिए भ्रष्टाचारियों से समझौता करना राजनीतिज्ञों की मजबूरी समझ ली जाए फिर तो देश को भ्रष्टाचार को एक यथार्थ के रूप मेंस्वीकार करना ही बेहतर होगा। और यदि देश ने ऐसा किया तो यह गांधी, सुभाष, आज़ाद, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू, अशफाक़उल्ला, तिलक, नेहरू तथा पटेल जैसे उन तमाम स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों पर कुठाराघात होगा जिन्होंने देश को अंग्रेज़ों से मुक्त कराकर स्वाधीन, प्रगतिशील एवं आत्मर्निार भारत के निर्माण का सपना देखा था। इसी स्वर्णिम स्वप्र को साकार रूप देने हेतु भारतीय संविधान की रचना की गई थी जिसके तहत भारत को एक धर्म निरपेक्ष लोकतंत्र घोषित किया गया था। परंतु यह हमारे स्वतंत्रता सेनानियों तथा शहीदों का घोर अपमान ही समझा जाएगा कि उनकी बेशकीमती कुर्बानियों की बदौलत देश आज़ाद तो ज़रूर हो गया परंतु वास्तविक लोकतंत्र शायद अब तक नहीं बन सका । इसके विपरीत देशवासियों को आज ऐसा महसूस होने लगा है कि देश में लोकतंत्र के नाम पर भ्रष्टतंत्र स्थापित हो चुका है। और इससे बड़े दुर्भाग्य की बात यह है कि गत् 64 वर्षों से आज़ाद हिंदुस्तान के इतिहास में भ्रष्टाचार को लेकर छाती पीटने का ढोंग करते तो तमाम नेता व राजनैतिक दल दिखाई दिए परंतु भ्रष्टाचार के विरुद्ध सड़कों पर तिरंगा लहराता तथा भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को सड़कों पर लाता हुआ कोई भी राजनेता नज़र नहीं आया। और इन 64 वर्षों के बाद पहली बार यदि किसी व्यक्ति ने राष्ट्रव्यापी भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम की अगुवाई का साहस किया तो वह श़िसयत केवल अन्ना हज़ारे जैसा बुज़ुर्ग गांधीवादी नेता की ही हो सकती थी।
अन्ना हज़ारे की कोशिशों तथा आमरण अनशन जैसे उनके बलिदानपूर्ण प्रयास के बाद अब भाजपा के वरिष्ठ नेता तथा पार्टी द्वारा घोषित प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री लाल कृष्ण अडवाणी ने जंतर मंतर पर आयोजित धरने के विषय में अपने ब्लॉग पर यह लिखा है कि- ‘मेरा विचार है कि जो लोग राजनेताओं और राजनीति के विरुद्ध घृणा का माहौल बना रहे हैं वह लोकतंत्र को बड़ा नुकसान पहुंचा रहे हैं। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा अपनाया गया रुख लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह है’। अडवाणी ने अपने यह विचार उस परिपेक्ष्य में व्यक्त किए हैं जबकि जंतर मंतर पर आयोजित हुए भ्रष्टाचार विरोधी धरने व आमरण अनशन के दौरान वहां पहुंचे कई प्रमुख नेताओं जैसे ओम प्रकाश चौटाला, मदन लाल खुराना, मोहन सिंह तथा उमा भारती को उत्साही आंदोलन कर्ताओं ने धरना स्थल से वापस कर दिया था। इन नेताओं के विरूद्ध सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा नारेबाज़ी भी की गई थी। हालांकि नेताओं के विरूद्ध जनता ने किसी प्रकार का अभद्र व्यवहार नहीं किया न ही किसी प्रकार की हिंसा का सहारा लिया। परंतु भ्रष्टाचार से तंग आ चुकी जनता द्वारा भ्रष्टाचार या भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने या इनका समर्थन करने वाले नेताओं के विरूद्ध अपने मामूली से गुस्से या विरोध का प्रदर्शन करना भी स्वाभाविक था। क्या देश की जनता ने 64 वर्षों तक इन्हीं नेताओं से यह आस नहीं बांधे रखी कि आज नहीं तो कल यही नेेता हमें व हमारे देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराएंगे तथा देश को साफ सुथरा शासन व प्रशासन प्रदान करेंगे ? परंतु जनता ने यही देखा कि नेताओं से ऐसी सकारात्मक उमीद रखना तो शायद पूरी तरह बेमानी ही था। क्योंकि इनमें से तमाम नेता या तो भ्रष्टाचार के रंग में स्वयं को पूरी तरह रंग चुके हैं या फिर किसी न किसी प्रकार से भ्रष्टाचार से या भ्रष्टाचारियों से अपना नाता जोड़े हुए हैं।
और यदि ऐसा न होता तो बिना कि सी समाज सेवी संगठन के प्रयासों के तथा अन्ना हज़ारे के आमरण अनशन किए बिना लोकपाल विधेयक अपने वास्तविक तथा जनहित की आकांक्षाओं के अनुरूप अब तक कानून का रूप धारण कर चुका होता। परंतु अफसोस कि यह तब होने जा रहा है जबकि समाजसेवी संगठनों व कार्यकर्ताओं ने सरकार को ऐसा करने के लिए बाध्य किया है। अन्ना हज़ारे ने राजनेताओं के प्रति अडवाणी की चिंताओं के जवाब में अपनी त्वरित टिप्पणी देते हुए यह कहा है कि-‘अडवाणी जी ने जो भी कहा है वह गलत कहा है। यदि अडवाणी जी जैसे नेता सही रास्ते पर होते तो हमें भ्रष्टाचार के खि़लाफ इतना बड़ा क़ दम उठाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।’ अन्ना हज़ारे ने गत दिनों महाराष्ट्र में अपने पैतृक गांव रालेगंज पहुंच कर वहां भी भ्रष्टाचार विरोधी अपने कड़े तेवर उस समय दिखाए जबकि उनके मंच पर भाऊसाहेब आंधेड़कर नामक एक ऐसा पुलिस इंस्पेक्टर सुरक्षा व्यवस्था को नियंत्रित करते हु़ए पहुंच गया जिस पर कि कुछ समय पूर्व ही भ्रष्टाचार का आरोप लगा था। अन्ना हज़ारे ने उसे फौरन अपने मंच से नीचे उतर जाने का निर्देश दिया। और साफ किया कि उनके साथ भ्रष्टाचारियों की जमात के सदस्यों की कोई आवश्यकता नहीं है।
जहां तक भ्रष्टाचार के आरोपों का प्रश्र है तो इलाहाबाद से समाचार तो यहां तक आ रहे हैं कि जन लोक पाल विधेयक की प्रारूप समिति के दो प्रमुख सदस्य पूर्व केंद्रीय मंत्री शांतिभूषण तथा उनके वकील पुत्र प्रशांत भूषण ने इलाहाबाद में 19, एल्गिन रोड, सिविल लाईन्स स्थित एक विशाल कोठी जिसकी कीमत बाज़ार के हिसाब से 20 करोड़ रूपये आंकी जा रही है, को अपने किरायेदार के हाथों मात्र एक लाख रूपये में एग्रीमेंट टू सेल कर दिया है। यदि इस डील में अनियमितताएं उजागर हुईं तो हमें इस बात की भी प्र्रतीक्षा करनी चाहिए कि अन्ना हज़ारे अपने ऐसे क़ानूनी सलाहाकारों से भी अवश्य पीछा छुड़ा लेंगे। परंतु इन सब बातों के बावजूद हमें व हमारे देशवासियों को भ्रष्टाचार विरोधी इस राष्ट्रव्यापी मुहिम के प्रति सकारात्मक सोच अवश्य रखनी चाहिए तथा प्रत्येक व्यक्ति को अपने-अपने स्तर पर इस मुहिम के प्रति अपनी सकारात्मक भूमिका भी निभानी चाहिए।
देश की जनता बिना किसी पूर्व नियोजित कार्यकम के तथा बिना किसी दबाव व लालच के तमाम आशाओं व उमीदों के साथ जिस प्रकार भ्रष्टाचार के विरूद्ध देश में पहली बार लामबंद हुई है उससे अन्ना हज़ारे जैसे समर्पित गांधीवादी नेता को भी काफी बल मिला है तथा वृद्धावस्था में उनके बलिदानपूर्ण हौसले को देखकर जनता में काफी उम्मीदें जगी हैं। लिहाज़ा जनता को भी चाहिए कि वह भ्रष्टाचार जैसे संवेदनशील मुद्दे के विरुद्ध चलने वाली इस राष्ट्रव्यापी मुहिम के प्रति सिर्फ सकारात्मक सोच ही रखे।
डॉक्टरों ने 226 महिलाओं को बनाया बांझ
राजस्थान के दौसा जिले में 3 प्राइवेट अस्पतालों द्वारा 226 महिलाओं की बच्चेदानी निकाल देने का मामला सामने आया है। इस काम के बदले इन अस्पतालों ने मोटा पैसा कमाया और हर मरीज से 14 हजार रुपए ऐंठे। एक एनजीओ की ओर से दाखिल आरटीआई में इस बात का खुलासा हुआ है।
इन प्राइवेट अस्पतालों को सरकारी स्कीम ' जननी सुरक्षा योजना ' के तहत डिलिवरी कराने की मान्यता मिली हुई है। इस बात का खुलासा होने के बाद जिला प्रशासन ने जांच के लिए दौसा के चीफ मेडिकल ऑफिसर ओ.पी. मीणा की अध्यक्षता में 3 सदस्यीय समिति का गठन किया है।
आरटीआई से जानकारी मिलने के बाद एनजीओ अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत के जनरल सेक्रेटरी दुर्गा प्रसाद ने बताया कि 3 अस्पतालों ने पिछले साल मार्च से सितंबर में इलाज के लिए आईं 385 महिला मरीजों में से 226 औरतों की बच्चेदानी निकाल दी।
दुर्गा के बताया कि बिना जरूरत के इतनी बड़ी संख्या में बच्चेदानियां निकाली गई है। दुर्गा ने कहा, ' पूरे शरीर में इंफेक्शन फैल जाने का डर दिखाकर अस्पताल मरीज को इस काम के लिए मना लेते थे और इसके लिए वे 12 हजार से 14 हजार रुपए तक ऐंठते थे'।
जांच समिति के अध्यक्ष मीणा ने कहा, ' अभी इस बात की पुष्टि नहीं हुई है कि डॉक्टरों ने यह काम पैसे कमाने के चक्कर में किया और बिना इंफेक्शन के बच्चेदानी निकाल दी। सच्चाई पता करने के लिए मेडिकल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट को इकट्ठा किया जा रहा है। हमने 5 अस्पतालों के रिकॉर्ड जब्त कर लिए हैं। महिलाओं और डॉक्टरों से पूछताछ की जा रही है'।
एक पीडित महिला ने बताया, ' मेरे पेट में दर्द था। डॉक्टरों ने मेरी बच्चेदानी निकाल दी लेकिन फिर भी दर्द नहीं गया। फिर जब मैं जयपुर गई तो वहां पता चला कि बच्चेदानी निकालने की कोई जरूरत नहीं थी'। एक अन्य महिला ने बताया, ' डॉक्टरों ने मुझसे कहा कि अगर मेरी बच्चेदानी नहीं निकाली गई तो मेरी जान चली जाएगी इसलिए मैंने बच्चेदानी निकलवा दी। इस पर करीब 15 हजार रुपए खर्च हुए लेकिन मेरी बीमारी अभी भी वैसी ही है'।
जोधपुर में कुछ दिन पहले ही खराब ग्लूकोज चढ़ाने की वजह से 17 गर्भवती महिलाओं की मौत हो गई थी।
इन प्राइवेट अस्पतालों को सरकारी स्कीम ' जननी सुरक्षा योजना ' के तहत डिलिवरी कराने की मान्यता मिली हुई है। इस बात का खुलासा होने के बाद जिला प्रशासन ने जांच के लिए दौसा के चीफ मेडिकल ऑफिसर ओ.पी. मीणा की अध्यक्षता में 3 सदस्यीय समिति का गठन किया है।
आरटीआई से जानकारी मिलने के बाद एनजीओ अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत के जनरल सेक्रेटरी दुर्गा प्रसाद ने बताया कि 3 अस्पतालों ने पिछले साल मार्च से सितंबर में इलाज के लिए आईं 385 महिला मरीजों में से 226 औरतों की बच्चेदानी निकाल दी।
दुर्गा के बताया कि बिना जरूरत के इतनी बड़ी संख्या में बच्चेदानियां निकाली गई है। दुर्गा ने कहा, ' पूरे शरीर में इंफेक्शन फैल जाने का डर दिखाकर अस्पताल मरीज को इस काम के लिए मना लेते थे और इसके लिए वे 12 हजार से 14 हजार रुपए तक ऐंठते थे'।
जांच समिति के अध्यक्ष मीणा ने कहा, ' अभी इस बात की पुष्टि नहीं हुई है कि डॉक्टरों ने यह काम पैसे कमाने के चक्कर में किया और बिना इंफेक्शन के बच्चेदानी निकाल दी। सच्चाई पता करने के लिए मेडिकल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट को इकट्ठा किया जा रहा है। हमने 5 अस्पतालों के रिकॉर्ड जब्त कर लिए हैं। महिलाओं और डॉक्टरों से पूछताछ की जा रही है'।
एक पीडित महिला ने बताया, ' मेरे पेट में दर्द था। डॉक्टरों ने मेरी बच्चेदानी निकाल दी लेकिन फिर भी दर्द नहीं गया। फिर जब मैं जयपुर गई तो वहां पता चला कि बच्चेदानी निकालने की कोई जरूरत नहीं थी'। एक अन्य महिला ने बताया, ' डॉक्टरों ने मुझसे कहा कि अगर मेरी बच्चेदानी नहीं निकाली गई तो मेरी जान चली जाएगी इसलिए मैंने बच्चेदानी निकलवा दी। इस पर करीब 15 हजार रुपए खर्च हुए लेकिन मेरी बीमारी अभी भी वैसी ही है'।
जोधपुर में कुछ दिन पहले ही खराब ग्लूकोज चढ़ाने की वजह से 17 गर्भवती महिलाओं की मौत हो गई थी।
Wednesday, April 6, 2011
अन्ना हजारे कहीं बहादुर शाह जफर तो नहीं!
मृगेंद्र पांडेय
राजनीति अपनी सहुलियत देखती है। उसे इसकी परवाह नहीं कि कल क्या होगा। आज को सही तरीके से निपटा लें, तो उससे बेहतर कुछ नहीं होता है। अन्ना हजारे ने अचानक आजादी की दूसरी लडाई लडने की तैयारी कर ली। देश के कुछ बुदृधजीवियों ने उनको अपना नेता मान लिया। अन्ना हजारे दिल्ली में जंतर मंतर पर धरना और आमरण अनशन पर बैठ गए। अन्ना को भ्रष्टाचार के खिलाफ अपना नेता बनाने का फैसला ठीक वैसा ही है, जैसा 1857 की लडाई में स्वतंत्रता के दीवानों ने मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को बनाया था। जफर अपने जीवन के अंतिम दौर में थे। देश के पास एक भी ऐसा आदमी नहीं था, जो उनका नेता बन सके। ठीक इस बार ऐसा ही है। पद, प्रतिष्ठा और सम्मान। सब कुछ अन्ना के पास है, इसलिए अन्ना हमारे नेता बना दिए गए हैं।
भ्रष्ट हो चुका मध्यमवर्ग अब भ्रष्टाचार की लडाई लड रहा है। उसके लिए कानून बनाने की बात कह रहा है। सवाल यह है कि क्या भ्रष्टाचार को कानून बनाकर लडा जा सकता है। अगर यह सही है तो क्या देश में बने कानून भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए काफी नहीं है। देश की अदालतों में करोडों मामले पेंडिंग पडे है। लोवर कोर्ट से अगर कोई मामला हाईकोर्ट में चला जाता है तो उसका नंबर आने में कम से कम एक महीने लगता है। सीबीआई जांच का परिणाम जीवन के अंतिम दौर तक नहीं आ पाता। ऐसे देश में एक और कानून की जरुरत क्यों है। यह कानून उन लोगों पर ही लगाया जाएगा, जिनके कारण यह सिस्टम भ्रष्ट हुआ है। भारत का भ्रष्ट मध्यमवर्ग जो आज अन्ना हजारे के साथ खडा है, कल वही भ्रष्टाचार का सरगना रहेगा।
बाबा रामदेव भी भ्रष्टाचार की लडाई लड रहे हैं। देश में भूख से मौत और नक्सली हिंसा की जगह काला धन सबसे बडा मुददा है। इसे चुनावी मुददा बनाकर बाबा राजनीति में आने की तैयारी कर रहे हैं। बस्तर, दांतेवाडा और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास को लेकर कोई आंदोलन क्यों नहीं किया जा रहा है। टूटी सडकें और गंदा पानी देश के लिए मुददा क्यों नहीं है। मेरी सहानभूति है अन्ना हजारे के साथ कम से कम उन्होंने पहल की, लेकिन यह पहल कोई बदलाव करेगी, यह मेरी समझ से परे हैं। बदलाव के लिए उस मध्यमवर्ग को सुधारने की जरुरत है, जो अपनी छोटी जरुरतों के लिए समझौता करने को तैयार है। उस सिस्टम को बदलने की जरुरत है, जो हमें भ्रष्ट बनाता, न कि किसी कानून की।
राजनीति अपनी सहुलियत देखती है। उसे इसकी परवाह नहीं कि कल क्या होगा। आज को सही तरीके से निपटा लें, तो उससे बेहतर कुछ नहीं होता है। अन्ना हजारे ने अचानक आजादी की दूसरी लडाई लडने की तैयारी कर ली। देश के कुछ बुदृधजीवियों ने उनको अपना नेता मान लिया। अन्ना हजारे दिल्ली में जंतर मंतर पर धरना और आमरण अनशन पर बैठ गए। अन्ना को भ्रष्टाचार के खिलाफ अपना नेता बनाने का फैसला ठीक वैसा ही है, जैसा 1857 की लडाई में स्वतंत्रता के दीवानों ने मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को बनाया था। जफर अपने जीवन के अंतिम दौर में थे। देश के पास एक भी ऐसा आदमी नहीं था, जो उनका नेता बन सके। ठीक इस बार ऐसा ही है। पद, प्रतिष्ठा और सम्मान। सब कुछ अन्ना के पास है, इसलिए अन्ना हमारे नेता बना दिए गए हैं।
भ्रष्ट हो चुका मध्यमवर्ग अब भ्रष्टाचार की लडाई लड रहा है। उसके लिए कानून बनाने की बात कह रहा है। सवाल यह है कि क्या भ्रष्टाचार को कानून बनाकर लडा जा सकता है। अगर यह सही है तो क्या देश में बने कानून भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए काफी नहीं है। देश की अदालतों में करोडों मामले पेंडिंग पडे है। लोवर कोर्ट से अगर कोई मामला हाईकोर्ट में चला जाता है तो उसका नंबर आने में कम से कम एक महीने लगता है। सीबीआई जांच का परिणाम जीवन के अंतिम दौर तक नहीं आ पाता। ऐसे देश में एक और कानून की जरुरत क्यों है। यह कानून उन लोगों पर ही लगाया जाएगा, जिनके कारण यह सिस्टम भ्रष्ट हुआ है। भारत का भ्रष्ट मध्यमवर्ग जो आज अन्ना हजारे के साथ खडा है, कल वही भ्रष्टाचार का सरगना रहेगा।
बाबा रामदेव भी भ्रष्टाचार की लडाई लड रहे हैं। देश में भूख से मौत और नक्सली हिंसा की जगह काला धन सबसे बडा मुददा है। इसे चुनावी मुददा बनाकर बाबा राजनीति में आने की तैयारी कर रहे हैं। बस्तर, दांतेवाडा और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास को लेकर कोई आंदोलन क्यों नहीं किया जा रहा है। टूटी सडकें और गंदा पानी देश के लिए मुददा क्यों नहीं है। मेरी सहानभूति है अन्ना हजारे के साथ कम से कम उन्होंने पहल की, लेकिन यह पहल कोई बदलाव करेगी, यह मेरी समझ से परे हैं। बदलाव के लिए उस मध्यमवर्ग को सुधारने की जरुरत है, जो अपनी छोटी जरुरतों के लिए समझौता करने को तैयार है। उस सिस्टम को बदलने की जरुरत है, जो हमें भ्रष्ट बनाता, न कि किसी कानून की।
Monday, February 14, 2011
भारत की वर्तमान दुर्दशा पर महात्मा गाँधी के विचार
आज की मुख्यधारा राजनीति की प्रवक्ता अख़बार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में कांग्रेस पार्टी की प्रवक्ता जयंती नटराजन का एक लेख छपा है। लेख की आख़िरी पंक्ति में गाँधी (महात्मा गाँधी न कि कोई अन्य नकली गाँधी) के 1917 के किसी बयान को उद्धृत करते हुए संसद के महिमामंडन का प्रयास उसी तरीके से किया गया है जिसके लिए अंग्रेजी में एक मुहावरा प्रचलित है- ‘डेविल क्वोटिंग बाइबिल’। इसलिए ऐसे दुष्प्रयासों को आईना दिखाने के लिए ही मैंने हिन्द स्वराज के उस अध्याय को नए आलोक में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है जिसमें गाँधी ने ईंगलैंड के तत्कालीन संसद और संसदीय राजनीति पर कुछ खरे शब्दों में एक लाज़वाब विश्लेषण किया था। पढ़कर देखिए यह भारत के संदर्भ में आज भी उतना ही प्रासंगिक है। इसलिए मूल लेख में जहाँ-जहाँ ‘ईंगलैंड’ या ‘अंग्रेज’ आदि शब्द का प्रयोग हुआ था वहाँ यदि हम क्रमशः भारत और भारतीय रख कर भी देखें तो वह उतना ही प्रासंगिक जान पड़ता है।
हिन्द स्वराज: भारत की हालत
-पाठक: आप जो कहते हैं उस पर से तो मैं यही अंदाजा लगाता हूं कि भारत में जो राज्य चलता है वह ठीक नहीं है और हमारे लायक नहीं है।
संपादक: आपका यह खयाल सही है। ईंगलैंड (यानि आज के भारत) में आज जो हालत है वह सचमुच दयनीय तरस खाने लायक है। मैं तो भगवान से यही मांगता हूं कि हिन्दुस्तान की ऐसी हालत कभी न हो। जिसे आप पार्लियामेन्टों की माता कहते हैं वह संसद तो बांझ और बेसवा है। ये दोनों शब्द बहुत कड़े हैं तो भी उसे अच्छी तरह लागू होते हैं। मैंने उसे बांझ कहा क्योंकि अब तक उस संसद ने अपने आप एक भी अच्छा काम नहीं किया। अगर उस पर जोर दबाव डालनेवाला कोई न हो तो वह कुछ भी न करे, ऐसी उसकी कुदरती हालत है। और वह बेसवा है क्योंकि जो मंत्रिमंडल उसे रखे उसके पास वह रहती है। आज उसका मालिक कोई एस्क्विथ (आज के संदर्भ में कोई सिंह) है तो कल कोई बालफर (कोई नकली गांधी) होगा और परसों कोई तीसरा।
पाठक: आपके बोलने में कुछ व्यंग्य है। बांझ शब्द को अब तक आपने लागू नहीं किया। संसद लोगों की बनी है इसलिए बेशक लोगों के दबाव से ही वह काम करेगी। वही उसका गुण है। उसके ऊपर का अंकुश है।
संपादक: यह बड़ी गलत बात है। अगर संसद बांझ न हो तो इस तरह होना चाहिये- लोग उसमें अच्छे से अच्छे सदस्य चुनकर भेजते हैं। सदस्य तनख्वाह नहीं लेते इसलिए उन्हें लोगों की भलाई के लिए संसद में जाना चाहिये। लोग खुद सुशिक्षित संस्कारी माने जाते हैं इसलिए उनसे भूल नहीं होती। ऐसा हमें मानना चाहिये ऐसी संसद को अर्जी की जरूरत नहीं होनी चाहिये। न दबाव की। उस संसद का काम इतना सरल होना चाहिये कि दिन ब दिन उसका तेज बढ़ता जाय और लोगों पर उसका असर होता जाय। लेकिन इससे उलटे इतना तो सब कबूल करते हैं कि संसद के सदस्य दिखावटी और स्वार्थी पाये जाते हैं। सब अपना मतलब साधने की सोचते हैं।
सिर्फ डर के कारण ही संसद कुछ काम करती है। जो काम आज किया वह कल उसे रद्द करना पड़ता है। आज तक एक भी चीज को संसद ने ठिकाने लगाया हो, ऐसी कोई मिसाल देखने में नहीं आती। बडे सवालों की चर्चा जब संसद में चलती है तब उसके सदस्य पैर फैलाकर लेटते हैं या बैठे बैठे झपकियां लेते हैं। उस संसद में सदस्य इतने जोरों से चिल्लाते हैं कि सुनने वाले हैरान परेशान हो जाते हैं।
उसके एक महान लेखक ने उसे दुनिया की बातूनी जैसा नाम दिया है। सदस्य जिस पक्ष के हों उस पक्ष के लिए अपना मत वे बगैर सोचे विचारे देते हैं। देने को बंधे हुए हैं। अगर कोई सदस्य इसमें अपवाद रूप निकल आये तो उसकी कमबख्ती ही समझिये। जितना समय और पैसा संसद खर्च करती है उतना समय और पैसा अगर अच्छे लोगों को मिले तो प्रजा का उद्धार हो जाय। ब्रिटिश (भारतीय) संसद महज प्रजा का खिलौना है और वह खिलौना प्रजा को भारी खर्च में डालता है। ये विचार मेरे खुद के हैं, ऐसा आप न मानें। बडे और विचारशील अंग्रेज (भारतीय) ऐसा विचार रखते हैं।
एक सदस्य ने तो यहां तक कहा है कि संसद धार्मिक आदमी के लायक नहीं रही। दूसरे सदस्य ने कहा है कि संसद एक बच्चा (बेबी) है। बच्चों को कभी आपने हमेशा बच्चे ही रहते देखा है। आज सात सौ (भारत के संदर्भ में एकसठ बरस) बरस के बाद भी अगर संसद बच्चा ही हो तो वह बड़ी कब होगी?
पाठक: आपने मुझे सोच में डाल दिया यह सब मुझे तुरंत मान लेना चाहिये ऐसा तो आप नहीं कहेंगे आप बिलकुल निराले विचार मेरे मन में पैदा कर रहे हैं। मुझे उन्हें हजम करना होगा। अच्छा अब बेसवा शब्द का विवेचन कीजिये।
संपादक: मेरे विचारों को आप तुरन्त नहीं मान सकते यह बात ठीक है। उसके बारे में आपको जो साहित्य पढ़ना चाहिये वह आप पढ़ेंगे तो आपको कुछ ख्याल आयेगा। संसद को मैंने बेसवा कहा, वह भी ठीक है। उसका कोई मालिक नहीं है। उसका कोई एक मालिक नहीं हो सकता लेकिन मेरे कहने का मतलब इतना ही नहीं है। जब कोई उसका मालिक बनता है जैसे प्रधानमंत्री तब भी उसकी चाल एक सरीखी नहीं रहती। जैसे बुरे हाल बेसवा के होते हैं वैसे ही सदा संसद के होते हैं। प्रधानमंत्री को संसद की थोड़ी ही परवाह रहती है। वह तो अपनी सत्ता के मद में मस्त रहता है। अपना दल कैसे जीते इसी की लगन उसे रहती है। संसद सही काम कैसे करे इसका वह बहुत कम विचार करता है। अपने दल को बलवान बनाने के लिए प्रधानमंत्री संसद से कैसे कैसे काम करवाता है इसकी मिसालें जितनी चाहिये उतनी मिल सकती हैं। यह सब सोचने लायक है।
पाठक: तब तो आज तक जिन्हें हम देशभिमानी और ईमानदार समझते आये हैं, उन पर भी आप टूट पड़ते है।
संपादक: हां, यह सच है। मुझे प्रधानमंत्रियों से द्वेष नहीं है। लेकिन तर्जुबे से मैंने देखा है कि वे सच्चे देशाभिमानी नहीं कहे जा सकते। जिसे हम घूस कहते हैं वह घूस वे खुल्लमखुल्ला नहीं लेते-देते इसलिए भले ही वे ईमानदार कहे जायें। लेकिन उनके पास वसीला काम कर सकता है। वे दूसरों से काम निकालने के लिए उपाधि वगैरह की घूस बहुत देते हैं। मैं हिम्मत के साथ कह सकता हूं कि उनमें शुद्ध भावना और सच्ची ईमानदारी नहीं होती।
पाठक: जब आपके ऐसे खयाल हैं तो जिन अंग्रेजों (अथवा भारतीयों) के नाम से संसद राज करती है उनके बारे में अब कुछ कहिये, ताकि उनके स्वराज्य का पूरा ख्याल मुझे आ जाये।
संपादक: जो अंग्रेज (भारतीय) वोटर हैं (चुनाव करते हैं), उनकी धर्म पुस्तक (बाइबल) तो है अखबार। वे अखबारों से अपने विचार बनाते हैं। अखबार अप्रमाणिक होते हैं। एक ही बात को दो शक्लें देते हैं। एक दल वाले उसी बात को बड़ी बनाकर दिखलाते हैं तो दूसरे दलवाले उसी को छोटी कर डालते हैं। एक अखबारवाला किसी भारतीय नेता को प्रामाणिक मानेगा तो दूसरा अखबार वाला उसको अप्रामाणिक मानेगा। जिस देश में ऐसे अखबार हैं उस देश के आदमियों की कैसी दुर्दशा होगी?
पाठक: यह तो आप ही बताइये।
संपादक: उन लोगों के विचार घड़ी घड़ी में बदलते हैं। उन लोगों में यह कहावत है कि ‘सात सात बरस में रंग बदलता है।’ घड़ी के लोलक की तरह वे इधर उधर घूमा करते है। जमकर वे बैठ ही नहीं सकते। कोई दौर दमामवाला आदमी हो और उसने अगर बड़ी बड़ी बातें कर दीं या दावतें दे दीं तो वे नक्कारची की तरह उसी के ढोल पीटने लग जाते हैं। ऐसे लोगों की संसद भी ऐसी ही होती है। उनमें एक बात जरूर है। वह यह कि वे अपने देश को खोयेंगे नहीं। अगर किसी ने उस पर बुरी नजर डाली तो वे उसकी मिट्टी पलीद कर देंगे। लेकिन इससे उस प्रजा में सब गुण आ गये या उस प्रजा की नकल की जाय ऐसा नहीं कह सकते, अगर हिन्दुस्तान अंग्रेज प्रजा की नकल करे तो हिन्दुस्तान पागल हो जाय, ऐसा मेरा पक्का खयाल है।
पाठक: अंग्रेज (भारतीय) प्रजा ऐसी हो गई है, इसके आप क्या कारण मानते हैं?
संपादक: इसमें अंग्रेजों (भारतीयों) का कोई खास कसूर नहीं है पर उनकी बल्कि यूरोप (पश्चिम) की आजकल की सभ्यता का कसूर है। वह सभ्यता नुकसान देह है और उससे यूरोपा (भारत) की प्रजा पागल होती जा रही है।
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हिन्द स्वराज: भारत की हालत
-पाठक: आप जो कहते हैं उस पर से तो मैं यही अंदाजा लगाता हूं कि भारत में जो राज्य चलता है वह ठीक नहीं है और हमारे लायक नहीं है।
संपादक: आपका यह खयाल सही है। ईंगलैंड (यानि आज के भारत) में आज जो हालत है वह सचमुच दयनीय तरस खाने लायक है। मैं तो भगवान से यही मांगता हूं कि हिन्दुस्तान की ऐसी हालत कभी न हो। जिसे आप पार्लियामेन्टों की माता कहते हैं वह संसद तो बांझ और बेसवा है। ये दोनों शब्द बहुत कड़े हैं तो भी उसे अच्छी तरह लागू होते हैं। मैंने उसे बांझ कहा क्योंकि अब तक उस संसद ने अपने आप एक भी अच्छा काम नहीं किया। अगर उस पर जोर दबाव डालनेवाला कोई न हो तो वह कुछ भी न करे, ऐसी उसकी कुदरती हालत है। और वह बेसवा है क्योंकि जो मंत्रिमंडल उसे रखे उसके पास वह रहती है। आज उसका मालिक कोई एस्क्विथ (आज के संदर्भ में कोई सिंह) है तो कल कोई बालफर (कोई नकली गांधी) होगा और परसों कोई तीसरा।
पाठक: आपके बोलने में कुछ व्यंग्य है। बांझ शब्द को अब तक आपने लागू नहीं किया। संसद लोगों की बनी है इसलिए बेशक लोगों के दबाव से ही वह काम करेगी। वही उसका गुण है। उसके ऊपर का अंकुश है।
संपादक: यह बड़ी गलत बात है। अगर संसद बांझ न हो तो इस तरह होना चाहिये- लोग उसमें अच्छे से अच्छे सदस्य चुनकर भेजते हैं। सदस्य तनख्वाह नहीं लेते इसलिए उन्हें लोगों की भलाई के लिए संसद में जाना चाहिये। लोग खुद सुशिक्षित संस्कारी माने जाते हैं इसलिए उनसे भूल नहीं होती। ऐसा हमें मानना चाहिये ऐसी संसद को अर्जी की जरूरत नहीं होनी चाहिये। न दबाव की। उस संसद का काम इतना सरल होना चाहिये कि दिन ब दिन उसका तेज बढ़ता जाय और लोगों पर उसका असर होता जाय। लेकिन इससे उलटे इतना तो सब कबूल करते हैं कि संसद के सदस्य दिखावटी और स्वार्थी पाये जाते हैं। सब अपना मतलब साधने की सोचते हैं।
सिर्फ डर के कारण ही संसद कुछ काम करती है। जो काम आज किया वह कल उसे रद्द करना पड़ता है। आज तक एक भी चीज को संसद ने ठिकाने लगाया हो, ऐसी कोई मिसाल देखने में नहीं आती। बडे सवालों की चर्चा जब संसद में चलती है तब उसके सदस्य पैर फैलाकर लेटते हैं या बैठे बैठे झपकियां लेते हैं। उस संसद में सदस्य इतने जोरों से चिल्लाते हैं कि सुनने वाले हैरान परेशान हो जाते हैं।
उसके एक महान लेखक ने उसे दुनिया की बातूनी जैसा नाम दिया है। सदस्य जिस पक्ष के हों उस पक्ष के लिए अपना मत वे बगैर सोचे विचारे देते हैं। देने को बंधे हुए हैं। अगर कोई सदस्य इसमें अपवाद रूप निकल आये तो उसकी कमबख्ती ही समझिये। जितना समय और पैसा संसद खर्च करती है उतना समय और पैसा अगर अच्छे लोगों को मिले तो प्रजा का उद्धार हो जाय। ब्रिटिश (भारतीय) संसद महज प्रजा का खिलौना है और वह खिलौना प्रजा को भारी खर्च में डालता है। ये विचार मेरे खुद के हैं, ऐसा आप न मानें। बडे और विचारशील अंग्रेज (भारतीय) ऐसा विचार रखते हैं।
एक सदस्य ने तो यहां तक कहा है कि संसद धार्मिक आदमी के लायक नहीं रही। दूसरे सदस्य ने कहा है कि संसद एक बच्चा (बेबी) है। बच्चों को कभी आपने हमेशा बच्चे ही रहते देखा है। आज सात सौ (भारत के संदर्भ में एकसठ बरस) बरस के बाद भी अगर संसद बच्चा ही हो तो वह बड़ी कब होगी?
पाठक: आपने मुझे सोच में डाल दिया यह सब मुझे तुरंत मान लेना चाहिये ऐसा तो आप नहीं कहेंगे आप बिलकुल निराले विचार मेरे मन में पैदा कर रहे हैं। मुझे उन्हें हजम करना होगा। अच्छा अब बेसवा शब्द का विवेचन कीजिये।
संपादक: मेरे विचारों को आप तुरन्त नहीं मान सकते यह बात ठीक है। उसके बारे में आपको जो साहित्य पढ़ना चाहिये वह आप पढ़ेंगे तो आपको कुछ ख्याल आयेगा। संसद को मैंने बेसवा कहा, वह भी ठीक है। उसका कोई मालिक नहीं है। उसका कोई एक मालिक नहीं हो सकता लेकिन मेरे कहने का मतलब इतना ही नहीं है। जब कोई उसका मालिक बनता है जैसे प्रधानमंत्री तब भी उसकी चाल एक सरीखी नहीं रहती। जैसे बुरे हाल बेसवा के होते हैं वैसे ही सदा संसद के होते हैं। प्रधानमंत्री को संसद की थोड़ी ही परवाह रहती है। वह तो अपनी सत्ता के मद में मस्त रहता है। अपना दल कैसे जीते इसी की लगन उसे रहती है। संसद सही काम कैसे करे इसका वह बहुत कम विचार करता है। अपने दल को बलवान बनाने के लिए प्रधानमंत्री संसद से कैसे कैसे काम करवाता है इसकी मिसालें जितनी चाहिये उतनी मिल सकती हैं। यह सब सोचने लायक है।
पाठक: तब तो आज तक जिन्हें हम देशभिमानी और ईमानदार समझते आये हैं, उन पर भी आप टूट पड़ते है।
संपादक: हां, यह सच है। मुझे प्रधानमंत्रियों से द्वेष नहीं है। लेकिन तर्जुबे से मैंने देखा है कि वे सच्चे देशाभिमानी नहीं कहे जा सकते। जिसे हम घूस कहते हैं वह घूस वे खुल्लमखुल्ला नहीं लेते-देते इसलिए भले ही वे ईमानदार कहे जायें। लेकिन उनके पास वसीला काम कर सकता है। वे दूसरों से काम निकालने के लिए उपाधि वगैरह की घूस बहुत देते हैं। मैं हिम्मत के साथ कह सकता हूं कि उनमें शुद्ध भावना और सच्ची ईमानदारी नहीं होती।
पाठक: जब आपके ऐसे खयाल हैं तो जिन अंग्रेजों (अथवा भारतीयों) के नाम से संसद राज करती है उनके बारे में अब कुछ कहिये, ताकि उनके स्वराज्य का पूरा ख्याल मुझे आ जाये।
संपादक: जो अंग्रेज (भारतीय) वोटर हैं (चुनाव करते हैं), उनकी धर्म पुस्तक (बाइबल) तो है अखबार। वे अखबारों से अपने विचार बनाते हैं। अखबार अप्रमाणिक होते हैं। एक ही बात को दो शक्लें देते हैं। एक दल वाले उसी बात को बड़ी बनाकर दिखलाते हैं तो दूसरे दलवाले उसी को छोटी कर डालते हैं। एक अखबारवाला किसी भारतीय नेता को प्रामाणिक मानेगा तो दूसरा अखबार वाला उसको अप्रामाणिक मानेगा। जिस देश में ऐसे अखबार हैं उस देश के आदमियों की कैसी दुर्दशा होगी?
पाठक: यह तो आप ही बताइये।
संपादक: उन लोगों के विचार घड़ी घड़ी में बदलते हैं। उन लोगों में यह कहावत है कि ‘सात सात बरस में रंग बदलता है।’ घड़ी के लोलक की तरह वे इधर उधर घूमा करते है। जमकर वे बैठ ही नहीं सकते। कोई दौर दमामवाला आदमी हो और उसने अगर बड़ी बड़ी बातें कर दीं या दावतें दे दीं तो वे नक्कारची की तरह उसी के ढोल पीटने लग जाते हैं। ऐसे लोगों की संसद भी ऐसी ही होती है। उनमें एक बात जरूर है। वह यह कि वे अपने देश को खोयेंगे नहीं। अगर किसी ने उस पर बुरी नजर डाली तो वे उसकी मिट्टी पलीद कर देंगे। लेकिन इससे उस प्रजा में सब गुण आ गये या उस प्रजा की नकल की जाय ऐसा नहीं कह सकते, अगर हिन्दुस्तान अंग्रेज प्रजा की नकल करे तो हिन्दुस्तान पागल हो जाय, ऐसा मेरा पक्का खयाल है।
पाठक: अंग्रेज (भारतीय) प्रजा ऐसी हो गई है, इसके आप क्या कारण मानते हैं?
संपादक: इसमें अंग्रेजों (भारतीयों) का कोई खास कसूर नहीं है पर उनकी बल्कि यूरोप (पश्चिम) की आजकल की सभ्यता का कसूर है। वह सभ्यता नुकसान देह है और उससे यूरोपा (भारत) की प्रजा पागल होती जा रही है।
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Saturday, February 12, 2011
शराब कारोबार के विज्ञापन में गांधी
-रायपुर में लगाए फ्लैक्स और हार्डिंग, गांधीवादी चुप
मृगेंद्र पांडेय
शराब का कारोबार करने वाले राज्य सरकार के एक उपक्रम बेवरेज कार्पोरेशन ने अपनी ब्रांडिंग के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम और फोटो का इस्तेमाल शुरू किया है। कार्पोरेशन के एक विज्ञापन में राष्ट्रपिता की बड़ी-बड़ी फोटो लगाई गई है। साथ ही उसमें गांधी जी के उन शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, जो उन्होंने शराबबंदी के लिए दिया है। विज्ञापन में गांधी जी के बगल में मुख्यमंत्री रमन सिंह की तस्वीर भी लगाई गई है। कार्पोरेशन के इस विज्ञापन गांधीवादी चुप है। बेवरेज कार्पोरेशन के विज्ञापन में इन्हें लगाना राष्ट्रपिता का अपमान है।
गांधी जी शराब के खिलाफ थे। वे हमेशा आबकारी से मिले राजस्व का विरोध करते थे। यही नहीं, कई मौके पर गांधी जी ने शराबबंदी के आंदोलन की अगुवाई कर चुके हैं। बेवरेज कार्पोरेशन के अध्यक्ष भाजपा विधायक देवजी पटेल हैं। बेवरेज कार्पोरेशन राज्य सरकार की एक संस्था है, जो शराब की बिक्री को बढ़ाकर राजस्व उपजाने का काम करती है। हाल ही में मुख्यमंत्री ने इसके अध्यक्ष का चयन किया है। गांधीजी की फोटो लगा विज्ञापन जेल रोड पर अरण्य भवन के सामने लगाया गया है।
मृगेंद्र पांडेय
शराब का कारोबार करने वाले राज्य सरकार के एक उपक्रम बेवरेज कार्पोरेशन ने अपनी ब्रांडिंग के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम और फोटो का इस्तेमाल शुरू किया है। कार्पोरेशन के एक विज्ञापन में राष्ट्रपिता की बड़ी-बड़ी फोटो लगाई गई है। साथ ही उसमें गांधी जी के उन शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, जो उन्होंने शराबबंदी के लिए दिया है। विज्ञापन में गांधी जी के बगल में मुख्यमंत्री रमन सिंह की तस्वीर भी लगाई गई है। कार्पोरेशन के इस विज्ञापन गांधीवादी चुप है। बेवरेज कार्पोरेशन के विज्ञापन में इन्हें लगाना राष्ट्रपिता का अपमान है।
गांधी जी शराब के खिलाफ थे। वे हमेशा आबकारी से मिले राजस्व का विरोध करते थे। यही नहीं, कई मौके पर गांधी जी ने शराबबंदी के आंदोलन की अगुवाई कर चुके हैं। बेवरेज कार्पोरेशन के अध्यक्ष भाजपा विधायक देवजी पटेल हैं। बेवरेज कार्पोरेशन राज्य सरकार की एक संस्था है, जो शराब की बिक्री को बढ़ाकर राजस्व उपजाने का काम करती है। हाल ही में मुख्यमंत्री ने इसके अध्यक्ष का चयन किया है। गांधीजी की फोटो लगा विज्ञापन जेल रोड पर अरण्य भवन के सामने लगाया गया है।
Tuesday, February 1, 2011
पल भर में बदली रोहित की जिंदगी
मीरा जैन।। मुंबई
पता नहीं कब किसकी तकदीर पलट जाए। दो साल पहले एक के बाद एक दो माह के भीतर माता-पिता को गंवाने वाले रोहित ने सपने में भी खुद के भाग्योदय की बात नहीं सोची होगी। 13 साल के अनाथ रोहित ने पेट भरने के लिए लोकल ट्रेन में हेयर क्लिप बेचना शुरू कर दिया था। शनिवार को मानो प्रकृति उसे उन्नति के द्वार पर धकेल रही थी। रोहित दुबे ने राहुल गांधी की सभा का पोस्टर देखा और यह सोचकर वहां जा पहुंचा कि भीड़ में उसका धंधा हो जाएगा और शायद उसे राहुल को करीब से देखने का मौका भी मिल जाए, पर उसका तो जीवन ही बदल गया।
पल भर की बात जीने का सामान दे गई
पालघर के आर्यन स्कूल मैदान में पास न होने के कारण रोहित को अंदर नहीं जाने दिया गया, तो वह मायूस होकर वहीं खड़ा रहा और सोचने लगा इतनी दूर आया हूं राहुल गांधी की एक झलक पा लूं। वह भी न हुआ, तो हेलिकॉप्टर ही देख लेता हूं। सभा के बाद भीड़ यहीं से बाहर निकलेगी, तब बात बन सकती है और बात क्या खूब बनी। करीब 2000 लोगों की भारी भीड़ के बीच कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी की नजर रोहित दुबे पर पड़ी। बस एक मिनट की बात हुई और राहुल गांधी का दिल भर आया। उन्होंने तत्काल आदिवासी विकास राज्यमंत्री राजेंद्र गावित को निर्देश दिया कि वे रोहित को फिर से स्कूल भेजने का इंतजाम करें। साथ ही, यह भी कहा कि गावित साल दर साल उसकी प्रगति की जानकारी देते रहें।
कांटों भरा बचपन
दु:ख और परेशानियों के पहाड़ तले दबे रोहित को लगा उसका पूरा बोझ उतर गया है और अब वह उड़नखटोले में बैठकर उड़ रहा है। रोहित के पिता बिल्डर के यहां दिहाड़ी मजदूर थे। 2009 में मलेरिया ने उनकी जान ले ली थी, फिर भी मां घर काम करके रोहित की शिक्षा का खर्च जुटा लेती थी। अक्टूबर 2009 में ही पेट की बीमारी ने 11 साल के रोहित से मां भी छीन ली। शोक मनाने से बड़ा पेट का सवाल मुंह बाए खड़ा था। रोहित जगह-जगह काम खोजने लगा, तभी एक साथी उसे लोकल में हेयर क्लिप बेचने की सलाह दी। उसके लिए भी राहुल को 500 रुपये चाहिए थे, तभी माल मिलता।
मुफलिसी में मदद का हाथ
इस कठिन घड़ी में रोहित को एक घर याद आया, जहां उसकी मां काम करती थी। कई बार वह कुछ सामान लेने मां के साथ वसई के उस गुजराती परिवार के घर गया था। उस दयालु परिवार ने न सिर्फ 500 रुपये दिए, बल्कि यह भी कहा कि ये पैसे लौटाने की जरूरत नहीं है। बस, रोहित क्लिप बेचकर पेट पालने लगा और दिन कटने लगे। अब तक उसने दोस्तों के साथ मिलकर नाला सोपारा (पूर्व) की चाल में खोली ले ली थी। इसके लिए वे सभी मिलकर 2000 रुपये मासिक किराया देते हैं।
दादा-दादी से मिलने की तमन्ना
आगामी 2 फरवरी को गावित ने रोहित को बुलाया है। इसके बाद वह अपने पुराने हिंदी माध्यम के स्कूल में पढ़ने लगेगा। उसके रहने का क्या इंतजाम होगा और खर्च कैसे मिलेगा? ये सारी बातें तभी बताई जाएंगी। उसे लगता है सिर्फ पढ़ाई पर ही मेहनत के दिन आ गए हैं। छूट जाएगी यह खस्ताहाल खोली और लेडीज डिब्बे की भीड़। अब, उसे जौनपुर के खेतों में मजदूरी करके जीवन यापन करने वाले दादा-दादी याद आ रहे हैं। उसका कहना है कि कुछ पैसे जुटे, तो जौनपुर जाकर दादा-दादी से मिलूंगा।
नवभारत टाइम्स से साभार
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/7403222.cms
पता नहीं कब किसकी तकदीर पलट जाए। दो साल पहले एक के बाद एक दो माह के भीतर माता-पिता को गंवाने वाले रोहित ने सपने में भी खुद के भाग्योदय की बात नहीं सोची होगी। 13 साल के अनाथ रोहित ने पेट भरने के लिए लोकल ट्रेन में हेयर क्लिप बेचना शुरू कर दिया था। शनिवार को मानो प्रकृति उसे उन्नति के द्वार पर धकेल रही थी। रोहित दुबे ने राहुल गांधी की सभा का पोस्टर देखा और यह सोचकर वहां जा पहुंचा कि भीड़ में उसका धंधा हो जाएगा और शायद उसे राहुल को करीब से देखने का मौका भी मिल जाए, पर उसका तो जीवन ही बदल गया।
पल भर की बात जीने का सामान दे गई
पालघर के आर्यन स्कूल मैदान में पास न होने के कारण रोहित को अंदर नहीं जाने दिया गया, तो वह मायूस होकर वहीं खड़ा रहा और सोचने लगा इतनी दूर आया हूं राहुल गांधी की एक झलक पा लूं। वह भी न हुआ, तो हेलिकॉप्टर ही देख लेता हूं। सभा के बाद भीड़ यहीं से बाहर निकलेगी, तब बात बन सकती है और बात क्या खूब बनी। करीब 2000 लोगों की भारी भीड़ के बीच कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी की नजर रोहित दुबे पर पड़ी। बस एक मिनट की बात हुई और राहुल गांधी का दिल भर आया। उन्होंने तत्काल आदिवासी विकास राज्यमंत्री राजेंद्र गावित को निर्देश दिया कि वे रोहित को फिर से स्कूल भेजने का इंतजाम करें। साथ ही, यह भी कहा कि गावित साल दर साल उसकी प्रगति की जानकारी देते रहें।
कांटों भरा बचपन
दु:ख और परेशानियों के पहाड़ तले दबे रोहित को लगा उसका पूरा बोझ उतर गया है और अब वह उड़नखटोले में बैठकर उड़ रहा है। रोहित के पिता बिल्डर के यहां दिहाड़ी मजदूर थे। 2009 में मलेरिया ने उनकी जान ले ली थी, फिर भी मां घर काम करके रोहित की शिक्षा का खर्च जुटा लेती थी। अक्टूबर 2009 में ही पेट की बीमारी ने 11 साल के रोहित से मां भी छीन ली। शोक मनाने से बड़ा पेट का सवाल मुंह बाए खड़ा था। रोहित जगह-जगह काम खोजने लगा, तभी एक साथी उसे लोकल में हेयर क्लिप बेचने की सलाह दी। उसके लिए भी राहुल को 500 रुपये चाहिए थे, तभी माल मिलता।
मुफलिसी में मदद का हाथ
इस कठिन घड़ी में रोहित को एक घर याद आया, जहां उसकी मां काम करती थी। कई बार वह कुछ सामान लेने मां के साथ वसई के उस गुजराती परिवार के घर गया था। उस दयालु परिवार ने न सिर्फ 500 रुपये दिए, बल्कि यह भी कहा कि ये पैसे लौटाने की जरूरत नहीं है। बस, रोहित क्लिप बेचकर पेट पालने लगा और दिन कटने लगे। अब तक उसने दोस्तों के साथ मिलकर नाला सोपारा (पूर्व) की चाल में खोली ले ली थी। इसके लिए वे सभी मिलकर 2000 रुपये मासिक किराया देते हैं।
दादा-दादी से मिलने की तमन्ना
आगामी 2 फरवरी को गावित ने रोहित को बुलाया है। इसके बाद वह अपने पुराने हिंदी माध्यम के स्कूल में पढ़ने लगेगा। उसके रहने का क्या इंतजाम होगा और खर्च कैसे मिलेगा? ये सारी बातें तभी बताई जाएंगी। उसे लगता है सिर्फ पढ़ाई पर ही मेहनत के दिन आ गए हैं। छूट जाएगी यह खस्ताहाल खोली और लेडीज डिब्बे की भीड़। अब, उसे जौनपुर के खेतों में मजदूरी करके जीवन यापन करने वाले दादा-दादी याद आ रहे हैं। उसका कहना है कि कुछ पैसे जुटे, तो जौनपुर जाकर दादा-दादी से मिलूंगा।
नवभारत टाइम्स से साभार
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/7403222.cms
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