Monday, May 4, 2009

प्रचार का छत्तीसगढ़िया अंदाज

मृगेंद्र पांडेय

छत्तीसगढ़ जसे छोटे और आदिवासी बहुल राज्य में भले ही चुनाव विकास के मुद्दों पर लड़े जाते हों, लेकिन उत्तर प्रदेश के मतदाता चुनाव को जाति के चश्मे से बाहर आकर देखने को तैयार नहीं है। इस कड़वी सच्चाई से छत्तीसगढ़ के नेताओं को उस समय रू-ब-रू होना पड़ा, जब वे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के पक्ष में प्रचार करने के लिए गाजियाबाद आए। यहां इन नेताओं को जातिगत समीकरणों से अवगत होना पड़ा, जो इनके लिए नया था। छत्तीगसढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह और उनके सिपहसलार चाहे पर्यटन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल हों या फिर नगरी निकाय और परिवहन मंत्री राजेश मूढ़त, गाजियाबाद में डेरा डाले हुए हैं और लगातार इन समीकरणों को समझते हुए प्रचार में जुटे हैं।

छत्तीसगढ़ से आए ये भाजपा नेता पूरे छत्तीसगढ़िया अंदाज में प्रचार कर रहे हैं। रोजाना छोटी-छोटी सभाएं करके राजनाथ के पक्ष में प्रचार कर रहे हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति के जातीय समीकरण उनको खासे परेशान किए हुए हैं। उन्हें लगता है कि छत्तीसगढ़ में विकास और स्थानीय मुद्दों के आधार पर वोट मांगे जाते हैं। वोट के लिए राजनीतिक दल जाति के हथकंडे का इस्तेमाल कम ही करते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश की सच्चाई इससे परे है।

भाजपा नेता राजेश मूढ़त की माने तो छोटी सभाओं में भी लोग जाति के आधार पर एकत्र होते हैं और वह वोट देने से पहले अपनी जाति के उम्मीदवार को नजरअंदाज नहीं कर सकते। उनका मानना है कि गाजियाबाद में एक बात जो छत्तीसगढ़ से अलग है वह यह कि यहां मुकाबला केवल दो दलों के बीच नहीं होता। उम्मीदवारों की जातियां भी काफी मायने रखती हैं। मतदाता पार्टी को वोट देने से पहले जाति विशेष के उम्मीदवार को प्राथमिकता के रूप में देखते हैं। अलग-अलग जातियों के कई ऐसे नेता भी मैदान में हैं, जो हैं तो निर्दलीय लेकिन उनका मतदाताओं में खासा असर है। बड़ी संख्या में मतदाता उनके साथ खड़े नजर आते हैं।

हालांकि गाजियाबाद में राजनाथ कड़े मुकाबले में फंसे हुए हैं, लेकिन उनके सिपहसलारों का मानना है कि वोटरों की पहली पसंद वही है। इसके पीछे राजनाथ के राष्ट्रीय छवि की बात कही जा रही है। प्रचार के लिए आए छत्तीसगढ़ी नेताओं का असर मतदाताओं पर कितना होता है यह तो सात मई को पता चलेगा, लेकिन इतना तय है कि इन नेताओं ने राजनाथ के पक्ष में हवा बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है।

भविष्य पर टिकी उम्मीदें

मतदान का प्रतिशत कम देखकर भाजपा नेताओं को भीतर ही भीतर यह बात परेशान कर रही है कि कहीं इस बार फिर पार्टी सत्ता की दौड़ में पिछड़ तो नहीं जाएगी।

राजीव पांडे

पंद्रहवीं लोकसभा के लिए 372 सीट पर मतदान हो चुका है लेकिन अभी तक स्थिति साफ नहीं हो पाई है कि इस बार सदन का सदन का स्वरूप कैसा होगा। हालांकि दोनों बड़े दल कांग्रेस तथा भारतीय जनता पार्टी अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं लेकिन सच्चाई तो यह है कि दल तो क्या किसी भी गठबंधन या मोर्चे को अपने बल पर सरकार बनाने के लिए 272 के अंक को छूना मुश्किल नजर आता है।

इन तीन चरणों में औसत मतदान का प्रतिशत बहुत ज्यादा नहीं रहा है, जिससे सत्तारूढ़ गठबंधन में थेड़ी खुशी है क्योंकि उनके विचार में इसका एक अर्थ यह हो सकता है कि सरकार के खिलाफ जनता में कोई नाराजगी नहीं है। अगर जनता में सरकार के खिलाफ गुस्सा होता तो वह बढ़-चढ़कर वोट देती। हालांकि विपक्षी दल इससे सहमत नहीं हैं। उनका मानना है कि इस बार भीषण गर्मी के कारण वोटर बाहर निकलनें से बचा। लेकिन अंदर ही अंदर भारतीय जनता पार्टी को भी यह बात परेशान कर रही है कि कहीं इस बार फिर वह सत्ता की दौड़ में पिछड़ तो नहीं जाएगी।

पहले चरण में जहां यह प्रतिशत साठ के आसपास था, वह दूसरे में कम होकर पचपन और पिछले सप्ताह हुए तीसरे चरण में पचास से नीचे चला गया। तीसरे चरण में जिन 107 सीट पर मतदान हुआ, उसमें से भाजपा के पास चौवालीस, कांग्रेस के पास उनतीस तथा अन्य के पास चौंतीस सीट थी। ये सीटें जिन राज्यों में हैं उनमें मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और बिहार भी शामिल हैं, जहां भाजपा को और अच्छा करने की उम्मीद थी। अगर यह मान भी लें कि कम मतदान का मतलब लोगों का सरकार के कामकाज से विरोध नहीं है, फिर भी कर्नाटक में श्रीराम सेना जसे कुछ मुद्दे निश्चित ही मतदाताओं को प्रभावित करेंगे। कांग्रेस इन राज्यों में अपनी स्थिति सुधारने के लिए भाजपा को कड़ी टक्कर दे रही है और स्थिति में कोई बहुत ज्यादा फर्क आएगा, ऐसा मुश्किल प्रतीत होता है।

अब जिन 171 सीट पर मतदान होना है, उनमें तमिलनाडु की 39, राजस्थान की 25, पंजाब की 13, हरियाणा की दस तथा उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल की बाकी बची 32 और 28 सीट शामिल हैं। इनमें से 46 सीट कांग्रेस के पास, 33 भारतीय जनता पार्टी तथा 89 अन्य के पास थीं। इन राज्यों में भी कमोबेश यथास्थिति ही बने रहने की उम्मीद है। इसके कारण राजग के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी के देश की कमान संभालने के सपने पर एक बड़ा सवालिया निशान लगता नजर आता है।
उत्तर प्रदेश, जहां से सर्वाधिक सांसद चुन कर आते हैं, इस आशय की खबरें आ रही हैं कि यहां कांग्रेस ही नहीं, भाजपा भी अपनी स्थिति में सुधार कर सकती है। इस प्रदेश में दो भाई राहुल तथा वरुण गांधी की कोशिशों को इसका श्रेय दिया जा रहा है। हालांकि दोनों के प्रचार का तरीका एकदम अलग-अलग रहा। कांग्रेस इन खबरों से काफी प्रसन्न है कि उसका पुराना वोट बैंक वापस लौट सकता है। इसके लिए उसे वरुण गांधाी को श्रेय देना चाहिए क्योंकि उनके एक समुदाय विरोधी कड़े बयानों से ध्रुवीकरण की नई प्रक्रिया शुरू हुई है।

इस घटनाक्रम से प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रही प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को धक्का लग सकता है, क्योंकि वहां से रिपोर्ट आ रही है कि इस नए ध्रुवीकरण से मायावती की सोशल इंजीनियरिंग की योजना को नुकसान हो रहा है। इस कार्ड की बदौलत उन्होंने गत विधानसभा में जिस तरह से विरोधियों को मात दी थी वह इस बार उनके लिए बहुत अधिक मददगार साबित नही हो पा रहा है। हालांकि उनकी पार्टी के सांसदों की संख्या में बढ़ोतरी तो होगी लेकिन उतनी नहीं जिसके बल पर वह प्रधानमंत्री बनने की दावेदारी रख पाएं।

इन चुनावों में एक बार फिर छोटे तथा क्षेत्रीय दल अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं इसलिए चुनाव परिणामों के बाद इनकी पूछ एक बार फिर बढ़ जाएगी। इन दलों को लेकर तोड़फोड़ तथा सेंधमारी अभी से शुरू भी हो गई है। तेलंगाना राष्ट्र समिति, जो अभी तक तीसरे मोर्चे के साथ थी, अब यह कह रही है वह उसके साथ जाएगी जो पृथक तेलंगाना राज्य का समर्थन करेगा। इसी तरह तेलगु सुपरस्टार चिरंजीवी की पार्टी प्रजा राज्यम को तेलगु देशम के चंद्रबाबू नायडू अपने साथ लाने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि चिरंजीवी इस बात को सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि वह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार का प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन करते हैं।

भारतीय जनता पार्टी को अभी भी यह उम्मीद है कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में वापस आ सकती है। तृणमूल कांग्रेस इस बार कांग्रेस के साथ मिलकर पश्चिम बंगाल में चुनाव लड़ रही है। भाजपा के प्रधानमत्री पद के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी ने हाल ही में कोलकाता हवाई अड्डे पर संवाददाताओं से कहा कि अब यह तो ममता को ही फैसला करना है कि वह राजग में वापस आना चाहती हैं या कांग्रेस के साथ रहना चाहती हैं। यह बयान वैसा ही है, जसे कोई कुएं में गिरे लोटा तलाशने की कोशिश कर रहा हो। आडवाणी तरह-तरह से क्षेत्रीय दलों को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उनका सपना पूरा होता नहीं लगता।

Saturday, May 2, 2009

राष्ट्रीय राजनीति में उत्तरप्रदेश की पुनर्वापसी

क्या दिल्ली जाने का रास्ता इस बार लखनऊ से होकर गुजरेगा?

आनंद प्रधान

कहते हैं कि दिल्ली जाने का रास्ता लखनऊ होकर गुजरता है। देश में आजादी के बाद हुए पहले नौ आम चुनावों तक यह राजनीतिक मुहावरा बिल्कुल सटीक था। जिस भी पार्टी ने उत्तरप्रदेश की अधिकांश सीटें जीतीं, केन्द्र में सरकार बनाने का मौका उसे ही मिला। पहले 40 वर्षों में केंद्र में कांग्रेस के एकछत्र राज और यहां तक कि जब 1977 और फिर 1989 में केंद्र में गैर कांग्रेसी सरकारें बनीं तो उसमें भी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उत्तरप्रदेश की ही थी। सिर्फ इसलिए नहीं कि उत्तरप्रदेश में तब किसी अन्य राज्य की तुलना में काफी अधिक 85 सीटें थीं बल्कि इसलिए भी कि पहले राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस के एकछत्र वर्चस्व के लिए जरूरी आधार मुहैया करानेवाले इंद्रधनुषी सामाजिक गठबंधन - ब्राह्मण, मुसलमान और दलित की प्रयोगभूमि उत्तरप्रदेश ही था और राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती देनेवाले सामाजिक गठबंधन-पिछड़ी और मध्यवर्ती जातियों का उभार भी यहीं हुआ।

लेकिन 1989 के बाद मंडल, मंदिर और दलित दावेदारी की तीन अलग-अलग धाराओं की राजनीति का अखाड़ा बन गए उत्तरप्रदेश की राष्ट्रीय राजनीति में हैसियत लगातार कमजोर होती चली गयी है। 90 के दशक मंे ऐसा लगने लगा कि उत्तरप्रदेश की राष्ट्रीय राजनीति खासकर केंद्र की सत्ता से विदाई हो गयी है। उत्तरप्रदेश ने ऐसी राह पकड़ ली जो दिल्ली नहीं जाती थी। 1991 में भारतीय जनता पार्टी मंदिर और राम लहर पर चढ़कर राज्य 85 में 51 सीटें जीत ले गयी लेकिन केंद्र में नरसिम्हा राव के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार ने पांच साल तक राज किया। इसी तरह 1996 में उत्तरप्रदेश में 52 सीटें जीतने के बावजूद भाजपा केंद्र में सरकार नहीं बना पायी और वाजपेयी के नेतृत्ववाली सरकार सिर्फ 13 दिन में गिर गयी।

हालांकि 1998 में केंद्र में वाजपेयी के नेतृत्ववाली एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद कुछ समय के लिए ऐसा लगा कि उत्तरप्रदेश की राष्ट्रीय राजनीति में वापसी हो गयी है लेकिन सच्चाई यह थी कि उत्तरप्रदेश में 57 सीटें जीतने के बावजूद वाजपेयी सरकार की चाभी भाजपा के पास नहीं बल्कि तमिलनाडु की नेता जयललिता के पास थी। जयललिता ने 1999 में वाजपेयी सरकार गिराकर यह साबित भी कर दिया। 1999 में हुए चुनावों के बाद एक बार फिर केंद्र में वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी लेकिन उसमें उत्तरप्रदेश की भूमिका बहुत सीमित रह गयी थी क्योंकि प्रदेश मे भाजपा की सीटें घटकर लगभग आधी यानी 29 रह गयीं। दूसरी ओर, सपा, बसपा और कांग्रेस ने लगभग 50 सीटें जीतीं लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में अप्रासंगिक बनी रहीं।

पिछले लोकसभा चुनावों में उत्तरप्रदेश में सपा को 35 सीटें मिलीं लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में वह हाशिए पर ही पड़ी रही। कांग्रेस के नेतृत्व में बनी यूपीए सरकार को समर्थन देने के बावजूद सपा और उसके साथ-साथ उत्तरप्रदेश केन्द्रीय सत्ता से अलग-थलग ही पड़े रहे। यहां तक कि वे दोनों राष्ट्रीय राजनीति में एक मजबूत विपक्ष की धुरी भी नहीं बन पाए। अपनी ही राजनीतिक मजबूरियों के कारण सपा न तो पूरी तरह से केंद्रीय सत्ता और उसकी धुरी बनी कांग्रेस के साथ रह पायी और न ही गैर कांग्रेस-गैर भाजपा विपक्ष का नेतृत्व कर पायी।

आज स्थिति यह है कि सपा न कांगे्रस के साथ है और न उससे दूर है, न वह तीसरे मोर्चे में है और न उससे दूर है। वह त्रिशंकु की तरह कथित चैथे में है जो चुनावों के बाद किस घाट लगेगा, किसी को पता नहीं है। लेकिन उत्तरप्रदेश की राजनीति में सपा अब भी एक मजबूत ताकत बनी हुई है। वह 2004 के चुनावों की तरह सीटें तो नहीं जीत पाएगी लेकिन सवाल यह है कि अपनी मौजूदा रणनीति के कारण क्या वह चुनावों के बाद भी राष्ट्रीय राजनीति में अलग-थलग ही पड़ी रहेगी या केंद्रीय सत्ता में भागीदार बनेगी?

दूसरी ओर, 2007 के विधानसभा चुनावों में शानदार जीत के साथ राज्य में अकेले दम पर सत्ता में पहुँचने वाली बसपा पर सभी की निगाहें हैं। बसपा की नेता और राज्य की मुख्यमंत्री मायावती ने अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं कभी नहीं छुपाई हैं। वे उत्तरप्रदेश में दलित की बेटी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए वोट मांग रही हैं। लेकिन उनके सामने राज्य में 2007 के प्रदर्शन को दोहराने और राष्ट्रीय राजनीति में खुद को सर्व स्वीकार्य बनाने की कठिन चुनौती है। उत्तरप्रदेश में यह लगभग आम राय है कि मायावती 2007 के विधानसभा चुनावों के प्रदर्शन को दोहरा नहीं पाएंगी। इसकी वजह यह है कि न सिर्फ उनके चुनाव जीताऊ सामाजिक गठबंधन में छीजन आई है बल्कि वे कुछ हद तक शुरुआती सत्ता विरोधी (एंटी इन्कम्बेंसी) भावना का भी सामना कर रही हैं। इस कारण उन्हें 50-55 सीटें तो आती नहीं दिख रही हैं और इस बात के आसार बढ़ रहे हैं कि वे 30-35 सीटें जीतकर भी पिछली बार के मुलायम सिंह की तरह राष्ट्रीय राजनीति में अलग-थलग ही पड़ी रहें।

तो क्या इसका यह अर्थ है कि राष्ट्रीय राजनीति में खासकर केंद्र की सत्ता से उत्तरप्रदेश का अलगाव बना रहेगा? इसका ठीक-ठीक उत्तर 16 मई के बाद ही मिलेगा लेकिन इतना तय है कि पिछले दो दशक से राष्ट्रीय राजनीति में हाशिए पर पड़े उत्तरप्रदेश को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है। विकास की दौड़ में बहुत पीछे छूट गया है। इसलिए भी हुआ है कि इन वर्षों में केन्द्रीय सत्ता ने उत्तरप्रदेश की उपेक्षा की है और एक गरीब और पिछड़ा राज्य होने के कारण उसे जितने संसाधन मुहैया कराए जाने चाहिए थे, उनसे महरूम रखा गया है।

लेकिन उत्तरप्रदेश की यह उपेक्षा सिर्फ इसलिए नहीं हुई है कि उसकी राजनीति,राष्ट्रीय राजनीति की विपरीत दिशा पकड़कर चलने की आदती हो गयी है बल्कि इस उपेक्षा के लिए राज्य का वह राजनीतिक नेतृत्व अधिक जिम्मेदार रहा है जिसकी राजनीतिक दृष्टि सत्ता से बाहर कुछ नहीं देख पाती है। उसने ईमानदारी से न तो राज्य और न ही केंद्र में एक सक्रिय, प्रभावी और सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाया है। सपा और बसपा केंद्र की राजनीति में और कांग्रेस और भाजपा राज्य की राजनीति में एक मजबूत विपक्ष की भूमिका भी निभाते तो उत्तरप्रदेश की ऐसी अनदेखी नहीं होती जैसी पिछले डेढ़-दो दशकों में हुई है।

असल में, इससे पता चलता है कि इन चारों राजनीतिक दलों का संघर्ष की राजनीति से कोई रिश्ता नहीं रह गया है। उनका सारा जोर जोड़तोड़ करके सत्ता हासिल करने पर रहता है। लेकिन अगर किसी कारण सत्ता से दूर रह गए तो वे विपक्ष की भूमिका ईमानदारी से निभाने के बजाय निष्क्रियता और सत्तापरस्ती के शिकार हो जाते हैं। राज्य की राजनीति में कांग्रेस और भाजपा की मौजूदा स्थिति उनकी इसी निष्क्रियता और सत्तापरस्ती का नतीजा है। दूसरी ओर, सपा और बसपा के लिए अपने-अपने नेता के व्यक्तिगत हित और सत्ता स्वार्थ इतने बलवान हैं कि वे राष्ट्रीय राजनीति में किसी स्थायी,नीतिगत और व्यापक मोर्चे के हिस्सा बनने की पात्रता ही नहीं रखते हैं।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि राष्ट्रीय राजनीति में उत्तरप्रदेश का कोई महत्व नहीं है। उत्तरप्रदेश के महत्व को सभी अच्छी तरह समझ रहे हैं। उसके बढ़ते महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कंेद्र की सत्ता के सभी दावेदारों ने राज्य में पूरी ताकत झोंक रखी है। कोई भी बिना लड़े, राज्य की एक ईंच राजनीतिक जमीन छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। इस मायने में उत्तरप्रदेश का राष्ट्रीय राजनीति में पुर्नप्रवेश हो रहा है क्योंकि केंद्र की सत्ता के सभी दावेदारों पता चल गया है कि दिल्ली का पक्का रास्ता लखनऊ होकर ही जाता है। प्रदेश की राजनीति में मायावती के उभार के बाद किसी के लिए उत्तरप्रदेश की अनदेखी करना संभव नहीं रह गया है। नतीजा चाहे जा आए लेकिन इसबार दिल्ली में लखनऊ की तूती बोलेगी।

Wednesday, April 22, 2009

बिहारीपन को बेचा अब खरीद रहे हैं

बिहार के बिहारीपन को बेचने के बाद प्रकाश झा अब उसे खरीदने पहुंच गए हैं। पश्चिमी चंपारण से लोजपा उम्मीदवार झा को भले ही पार्टी ने लालू के साले के विरोध के बावजूद टिकट दिया हो, लेकिन अपहरण, गंगाजल बनाने वाले प्रकाश भी चुनाव जितने के लिए उन्हीं नेताओं की तरह व्यवहार कर रहे हैं। जब से झा ‘सामाजिक न्याय रथज् पर सवार हुए हैं उन्हें बिहार की संवेदना, उसका पिछड़ापन, गरीबी, अत्याचार नजर नहीं आ रहे हैं। यहां मकसद साफ है। वह सब करने में कोई गुरेज नहीं, जिसका लगातार विरोध करते रहे हैं। सत्ता होती ही ऐसी है। लोगों को अंधा बना देती है। जिनके पास है उसे भी और जो उसकी तलाश में हैं उसे भी।

प्रकाश के कार्यालय पर पुलिस छापे से बरामद दस लाख रुपए उनकी उस साफ स्वच्छ फिल्मी छवि को झूठलाने के लिए काफी है, जिसे पर्दे पर फिल्माकर वह काफी वाहवाही लूट चुके हैं। दरअसल पर्दे का सच, वास्तविक जिंदगी में सच हो यह जरूरी नहीं है। यही कारण है कि देश की गरीबी, मध्यम वर्ग का शोषण और बदहाल जिंदगी को सिनेमा के पर्दे पर बखुबी उतारने वाले कलाकार जब देश की सर्वोच्च संसद में पहुंचते हैं तो उन्हें शायद यह सब दिखाई देना बंद हो जाता है। वह न तो संसद में सवाल पूछते हैं, न ही बैठक में उपस्थित होते हैं। उन्हें गरीबी केवल फिल्मों में ही नजर आता है। अपनी अदाकरी को दमदार बनाने के लिए ये कलाकार भले ही गरीबों के घरों में जाते हों, उनके साथ समय बिताते हों, लेकिन जब उनका भला करने की बात आती है तो उन्हें वह सब नजर नहीं आता है, जिन दिक्कतों से गरीबों को रोजाना रू-ब-रू होना पड़ता है। यह ठीक वैसा ही है जसा राहुल गांधी करते हैं। गरीबों के घर जाते हैं। उन्हें लंबे चौड़े आश्वासन देते हैं और बाद में भूल जाते हैं। उनका उद्धार कोई एनजीओ करता है। चाहे वह कलावती हो या फिर छत्तीसगढ़ और बुंदेलखंड के गांव में बिताई गई रात।

आखिर यह कैसी संवेदना है, जिसे पर्दे पर तो उतारने के लिए पूरी मेहनत की जाती है। यह कहें कि अपने अभिनय से जितनी भी इमानदारी कर सकते हैं, कलाकार करते हैं। क्या इसे कलाकारों की संवेदनहीनता नहीं कहेंगे, जो पर्दे पर तो सब अच्छा करने के दंभ भरते हैं। क्या यह देश के उन हजारों लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं है। उन कलाकारों का जिनका कोई सामाजिक सरोकार नहीं होता है, वह अगर देश की सर्वोच्च संसद में पहुंचते हैं तो उनका वह खोखलापन सामने आ जाता है, जिसे पर पर्दे पर बखुबी निभाते हैं। इस तरह के नेताओं के राजनीति में प्रवेश का लगातार विरोध होता रहा है। लेकिन राजनीतिक दलों की जिताऊ उम्मीदवारों की खोज फिल्मी कलाकारों पर ही जाकर रुकती है। क्योंकि जनता को वास्तविक मुद्दों से दूर रखने के लिए इनके लटके-झटके ज्यादा कारगर होते हैं। हमें सोचना होगा कि आखिर हम उन नेताओं को क्यों चुने, जिन्हे चुनावी मौसम में ही हमारी याद आती है। मौसम खत्म यह भी मेंढक की तरह नदारद हो जाते हैं। चाहे वह अमिताभ हों, गोविंदा हों या फिर कोई और। अब इस कड़ी में कोई प्रकाश झा न जुड़ जाए।

Sunday, April 12, 2009

कांग्रेस ‘पाने को सबकुछज्

केंद्र में बनते-बिगड़ते गठबंधनों से बेखबर छत्तीसगढ़ की राजनीति में दो महारथी कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने हैं। हार-जीत के गणित में कांग्रेस का पलड़ा भले ही कमजोर हो, लेकिन उसके पास प्रदेश में खोने के लिए कुछ ज्यादा नहीं है। यही कारण है कि कांग्रेस ने उम्मीदवारों के चयन में भी उन नए चेहरों को मौका दिया, जिनके सहारे पार्टी प्रदेश में वापसी के सपने संजो रही है। हालांकि भाजपा, जिसका प्रदेश की 11 में से 9 सीटों पर कब्जा है, उसने भी कई मौजूद सांसदों की दावेदारी को दरकिनार करते हुए उन नए और युवा चेहरों को मौका दिया है, जो प्रदेश की राजनीति में तेजी से उभर रहे हैं।

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को हर सीट पर दो तरफा मुकाबला करना पड़ रहा है। एक तरफ भाजपा से तो दूसरी ओर कांग्रेस के उन कद्दावर नेताओं से जिन्हें पार्टी ने टिकट से नहीं नवाजा है। रायपुर, बस्तर और कांकेर की सीट ऐसी ही है, जहां कांग्रेस को अपनों से भी लड़ना पड़ रहा है। कांग्रेस के उम्मीदवारों और संगठन के बीच तालमेल की कमी भी देखने को मिल रही है। कांग्रेस जहां इन दिक्कतों से पार पाने के लिए जद्दोजहर कर रही है, वहीं भाजपा ने छत्तीसगढ़ में रमन सिंह सरकार को मॉडल मानकार पूरे देश में उनकी योजनाओं को लागू करने का दावा किया। यह रमन सिंह के लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं है।

पार्टी ने नरेंद्र मोदी के उग्र हिंदुत्व से भले ही किनारा न किया हो, लेकिन विकास के लिए छत्तीसगढ़ के मॉडल को अपनाकर इस बात के संकेत जरूर दे दिए हैं कि चुनाव विकास के मुद्दों पर ही जीता जा सकता है। भाजपा चाहे दो रुपए किलो चावल हो या फिर नक्सलियों के खिलाफ चलाए जा रहे सलवा जुडूम की तारीफ, इसे वोट में बदलने की भरपूर कोशिश में है। अब ऐसे में कांग्रेस के सामने इन मुद्दों से पार पाने का संकट भी है।

प्रदेश की तीन सीटों पर कांग्रेस और भाजपा को बसपा, बागी और वाम दल के उम्मीदवार कड़ी टक्कर दे रहे हैं। दुर्ग, बस्तर और जांजगीर की सीट पर मचे त्रिकोणीय घमासान में दो सीट पर नुकसान कांग्रेस को होता नजर आ रहा है, वहीं दुर्ग सीट भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है। दुर्ग सीट पर भाजपा उम्मीदवार सरोज पाड़ेय को भाजपा के वर्तमान सांसद ताराचंद्र साहू कड़ी टक्कर दे रहे हैं। इस सीट पर कांग्रेस के कमजोर प्रत्याशी प्रदीप चौबे दोनों की लड़ाई का कितना फायदा उठा पाते हैं, यह तो 16 अप्रैल को ही देखने को मिलेगा, लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजों के आधार पर आकलन किया जाए तो यहां सरोज पांडेय के वोट को ताराचंद्र साहू काटते नजर आ रहे हैं, ऐसे में प्रदीप चौबे अगर बाजी मार ले जाएं तो उसमें कोई संदेह नहीं होगा।

बस्तर सीट पहले से ही भाजपा के कब्जे में है। इस बार यहां कांग्रेस को भाजपा के साथ वाम दल और पार्टी के कद्दावर नेता महेंद्र कर्मा से भी निपटना पड़ रहा है। हालांकि महेंद्र कर्मा ने खुलकर विरोध नहीं किया है, लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि उन्हें टिकट न मिलने से बढ़ी उनकी नाराजगी पार्टी के लिए भारी पड़ सकती है। जांजगीर में भी कांग्रेस के शिव डहरिया को भाजपा के कमला देवी पाटले और बसपा के दाउराम रत्नाकर से कड़ी टक्कर मिल रही है।
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और भाजपा के लिए बिलासपुर, राजनांदगांव और कोरबा की सीट प्रतिष्ठा का सवाल बनी हुई है। बिलासपुर सीट पर कट्टर प्रतिद्वंद्वी पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पत्नी रेणू जोगी और दिलीप सिंह जूदेव आमने सामने है। जूदेव इससे पहले अजीत जोगी के स्टिंग आपरेशन में फंसकर राजनीतिक वनवास गुजार कर एक बार फिर मैदान में हैं। इस बार जोगी को पटखनी देकर जूदेव अपना पुराना हिसाब चुकता करने की फिराक में हैं।

राजनांदगांव की सीट पर मुख्यमंत्री रमन सिंह का सबकुछ दांव पर है। भाजपा ने यहां से युवा नेता मधुसूदन यादव को कांग्रेस सांसद देवव्रत सिंह के मुकाबले मैदान में उतारा है। ऐसा माना जा रहा है कि यहां मधुसूदन नहीं रमन सिंह चुनाव लड़ रहे हैं। हालांकि देवव्रत सिंह खरागढ़ से विधायक रहे और लंबे समय से प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहे हैं, लेकिन सांसद बनने के बाद लोगों के बीच कम होती उपस्थिति उनके खिलाफ जा रही है। कोरबा में कांग्रेस के कद्दावर नेता चरण दास महंत का मुकाबला सांसद करुणा शुक्ला से है। हालांकि परिसीमन के बाद ऐसा माना जा रहा है कि करुणा शुक्ला की स्थिति कमजोर हुई है, लेकिन कांग्रेस का कमजोर संगठन उसका कितना फायदा उठा पाता है यह तो देखना ही होगा। महंत पर जोगी के विरोधी खेमे के होने के कारण अतिरिक्त दबाव भी है। ऐसे में कोरबा की सीट भले ही कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा की सीट न हो, लेकिन महंत की नाक का सवाल बनी हुई ही है।

Tuesday, April 7, 2009

जदी के बाद जरनैल

जरनैल का जूता सरकार को कितना हिला सकता है, इसका अंदाजा तो लोकसभा चुनाव के परिणाम में सामने आएगा, लेकिन एक बात तो स्पष्ट हो गई है कि राजनीतिक आकाओं ने वोट की राजनीति के लिए जरनैल के जूता की कीमत लगा दी है। जरनैल की भावनाएं भले ही पाक साफ हो। उनके मन में 84 के दंगों में मारे गए सिख भाइयों के प्रति आस्था हो, लेकिन सिखों की राजनीति करने वाले दल शिरोमणी अकाली दल ने जरनैल को दो लाख रुपए देने की बात कहकर एक बात तो सिद्ध ही कर दी कि देश में राजनीति का स्तर गिरता जा रहा है। अगर ऐसा ही रहा तो आने वाले समय में जनता इसी प्रकार राजनेताओं को जूता मारेगी।

जरनैल ने जूता फेंककर एक ऐसे मुद्दे को फिर से जगाने की कोशिश की है, जिसे कांग्रेस सरकार पूरी तरह से दबाने की फिराक में है। इसे सीबीआई का दुरुपयोग ही कहेंगे कि ऐन चुनाव से पहले जगदीश टाइटलर को क्लीन चिट दे दी गई। इसके बाद सिख समुदाय के लोगों के पास अपनी बात कहने, इंसाफ मांगने या फिर विरोध करने के और कौन से तरीके हो सकते हैं, यह उनकी समझ से परे है। ऐसे में एक पत्रकार ने अगर देश के गृह मंत्री के ऊपर जूता फेंककर विरोध दर्ज कराया तो उसने कोई गलत काम नहीं है। मेरा मानना है कि यह ठीक वैसा ही है, जसा भगत सिंह ने देश की सोई सरकार को जगाने के लिए संसद में धमाका किया था।

देश के कुछ पत्रकारों ने जरनैल का यह कहकर विरोध किया कि उन्होंने देश के गृह मंत्री पर जूता चलाकर गलत किया। यह पत्रकारिता के नियमों और सिद्धांतों के खिलाफ है। लेकिन वह यह भूल गए कि अगर पत्रकारिता समाज के लिए होती है तो जरनैल ने कम से कम इतना तो किया कि अपने समाज के लोगों की आवाज को देश की आवाज तो बनाया। देश के सभी समाचार चैनल और अखबर कम से कम इस बात की चर्चा तो कर रहे हैं कि जरनैल ने सिख दंगों में न्याय न मिलने के कारण गृह मंत्री पर जूता फेंका। अगर इसे आप पत्रकारिता के खिलाफ मानते हैं तो मानते रहिए। पत्रकारों में जिस दिन इतना करने का नैतिक बल आ जाएगा तो उनके सामने मानने और नहीं मानने का सवाल नहीं बचेगा। अगर पत्रकार इतने ही जागरूक हो जाएं तो सरकार की खबर नहीं, सरकार खबर बनेगी और तक किसी जदी या जरनैल को जूता नहीं फेंकना पड़ेगा।

Wednesday, April 1, 2009

विकास का नया मॉडल जरूरी

विकास के लिए चुनावों को बाहुबल और धनबल से मुक्त करने की व्यवस्था भी करनी पड़ेगी। इसके लिए राजनीतिक दलों को उत्तरदायी बनाने की शुरुआत होनी चाहिए।

केएन गोविंदाचार्य

पर्यावरण की जिस समस्या से हम दो-चार हो रहे हैं वह और विकराल स्वरूप ग्रहण कर लेगी। जरूरत इस बात की है कि विकास परिस्थितिकी को ध्यान में रखकर किया जाए, न कि अकेले मानव मात्रा को ध्यान में रखकर। पारिस्थितिकी में हर किसी की अपनी एक अलग और विशेष भूमिका है। अगर इस चक्र के किसी भी अंग को नुकसान हुआ तो पूरे चक्र का गड़बड़ाना तय है। विकास जब केवल मानव मात्रा को ध्यान में रखकर करने की कोशिश की जाएगी तो यह सहज और स्वाभाविक है कि प्रकृति में जबर्दस्त असंतुलन कायम होगा और उसके दुष्परिणामों से मनुष्य बच नहीं पाएगा। यदि विकास के पहिए को सही पटरी पर लाना है तो भूख और बेरोजगारी को मिटाना हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। आज भी देश की एक बड़ी आबादी को दो वक्त की रोटी नहीं मिल पाती।


ऐसे लोग भी अपने देश में हैं जो रात में भूखे पेट सोने को मजबूर हैं। उनकी इस स्थिति के लिए यदि हम विकास के मौजूदा माडल को दोषी ठहराएं तो गलत नहीं होगा। बेरोजगारी की मार से नौजवान बेहाल हैं। साफ तौर पर दिख रहा है कि सरकार के पास हर हाथ को रोजगार देने के लिए कारगर नीति का अभाव है। यह अभाव नया नहीं है। हमें विकास की ऐसी अवधारणा पर काम करना होगा जिसमें हर हाथ को काम मिल सके। इसके लिए हमें स्वरोजगार को बढ़ाने की दिशा में भी काम करना होगा। आत्मनिर्भरता की राह पर आगे बढ़ते हुए नौजवानों में ऐसा आत्मविश्वास पैदा करना होगा कि वे किसी का मुंह देखे बिना खुद अपने लिए रोजगार पैदा करने की दिशा में काम करें और प्रगति की राह पर आगे बढ़ सकें।


अभी विकास के जिस माडल को लेकर हम चल रहे हैं, उसमें गरीबी रेखा तय की जाती है। इसका परिणाम सबके सामने है। मेरा मानना है कि सही मायने में अगर हम विकास चाहते हैं तो गरीबी रेखा की बजाय समृद्धि की रेखा तय की जाए और उसी के मुताबिक समय पर कार्यक्रम लागू किए जाएं। भारत के संदर्भ में अगर हम विकास की बात करते हैं तो हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि राजनीतिक सत्ता का विकेंद्रीकरण हो। ग्राम सभा को सभी स्तरों के निर्णय में सहभागी बनाया जाए। राजनीतिक सत्ता में आम सहमति की अवधारणा को हकीकत में बदलने की जरूरत है।
राजनीतिक दलों का रवैया प्रतिस्पर्धात्मक न होकर सकारात्मक होना चाहिए। इसके अलावा भारत के विकास के लिए चुनावों को बाहुबल और धनबल से मुक्त करने की व्यवस्था भी करनी पड़ेगी। इसके लिए राजनीतिक दलों को उत्तरदायी बनाने की शुरुआत होनी चाहिए। देश के समग्र विकास के लिए कर ढांचे को भी सुधारे जाने की जरूरत है। सरकार को चाहिए कि वह आमदनी की बजाए खर्च पर कर लगाने की शुरुआत करे। आर्थिक क्षेत्र में अपने देश में बहुत अव्यवस्था है। इसे सुधारने के लिए अन्य उपायों के साथ-साथ अनार्जित आय को परिभाषित एवं नियंत्रित करना जरूरी है।


न्यायपालिका सहित पूरे प्रशासनिक ढांचे को विकेंद्रीकरण के जरिए जनता के प्रति जवाबदेह बनाना होगा। समग्र विकास के लिए यह भी जरूरी है कि सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक क्षेत्रों को स्वायत्तता दी जाए और उन्हें शक्ति संपन्न बनाकर सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाए। ऐसा होने पर ही ये विकास की गति को बनाए रखने में अपना महत्वपूर्ण योगदान कर पाएंगे। हमें उनकी सकारात्मक सहभागिता सुनिश्चित करनी होगी। शिक्षा को व्यक्तित्व विकास केन्द्रित एंव जीवनोपयोगी बनाया जाना चाहिए। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए कि उससे एक स्वतंत्र और सकारात्मक सोच विकसित हो।
देशी चिकित्सा पद्धतियों को प्रोत्साहित किया जाए और उन्हें सक्षम बनाया जाए। अगर ऐसा किया जाएगा तो विकास को गति मिलनी तय है। हम सब जानते हैं कि बदलती जीवन शैली ने छोटे-बड़े रोगों का प्रकोप बढ़ा दिया है। आनन-फानन में हमें उपचार के लिए अंग्रेजी पद्धतियों का आश्रय लेना पड़ रहा है। इलाज कराते-कराते लोग कंगाल हो जाते हैं, लेकिन प्राय: उन्हें स्वास्थ्य लाभ नहीं मिल पाता। देशी चिकित्सा अपेक्षाकृत सस्ती और कई रोगों में ऐलोपैथी से अधिक कारगर है। हमें इस पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। निष्कर्ष यह है कि भारत में सकल उत्पाद एवं आर्थिक वृद्धि दर के स्थान पर विकास का एक नया ‘सुखमानकज् तैयार करने की जरूरत है। तभी समग्र विकास होगा और इसका फायदा समाज के प्रत्येक वर्ग को
मिल पाएगा।


आज समाज से सभार