Monday, August 11, 2008
करार से मची थी पार्टी में रार
राजीव पांडे
भारत अमेरिका असैनिक परमाणु करार ने न केवल कभी नजदीकी सहयोगी रहे कांग्रेस और वामपंथी दलों को एक-दूसरे का धुर विरोधी बना दिया और भारतीय जनता पार्टी के अंदर भी रार पैदा कर दी थी। हालांकि यह मतभेद खुलकर कम ही सामने आये लेकिन कांग्रेस सांसद और महासचिव राहुल गांधी ने जब यह कहा कि भाजपा के कई युवा नेता करार के पक्ष में हैं तो वह सच से बहुत दूर नही थे ।
यह वर्ग पूरी तरह से करार के प्रावधानों से खुश नही था उसका मानना था कि पार्टी को इस करार का अंध विरोध करने की बजाय यह कहना चाहिये कि करार बराबरी के आधार पर किया जाये और यह बात साफ होनी चाहिये कि इस करार की जितनी जरूरत भारत को है उतनी ही अमेरिका को भी है। अंतत पार्टी की भी यही राय बनी जब विपक्ष के नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने लोकसभा में कहा कि उनकी पार्टी की सरकार आने के बाद इस करार पर फिर से बातचीत की जायेगी।
ऐसा नजर आता है कि पार्टी इस करार को लेकर शुरू से ही दिग्भ्रमित रही। पार्टी के कुछ नेताओं ने करार पर पार्टी का आधिकारिक रुख सामने आने से पहले ही लाठी भांजनी शुरू कर दी। इन नेताओं ने जिनमे यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी प्रमुख थे इस करार का खुलकर विरोध शुरू कर दिया । कुछ अन्य नेता जो इनके साथ थे, इस करार का साथ देने वालों को अमेरिकी दलाल तक कहने लग गये थे।
करार का सशर्त समर्थन करने वाले पार्टी के इस वर्ग को इस बात पर और अधिक नाराजगी थी कि ये नेता इस बात को भूल गये कि करार का अंध विरोध पार्टी की इस पुरानी लाइन के साथ किसी तरह से भी मेल नही खाता था कि चीन की तुलना में अमेरिका के साथ संबंधों को बेहतर बनाये जाने की कोशिश की जानी चाहिये।
पार्टी का यह वही वर्ग था जो अटल बिहारी वाजपेयी की चीन के प्रति नरम नीति से भी खुाश नही था । यह वर्ग वाजपेयी सरकार द्वारा तिब्बत पर चीन की संप्रभुता स्वीकार कर लिये जाने से काफी नाराज था क्योंकि इसका कहना था कि चीन की साम्राज्यवादी लिप्साओं का पहला निशाना भारत ही होगा । ये लॊग हमेशा से यह कहते आये हैं कि चीन हमारा दुश्मन नंबर एक है और वह भारत के हितों के खिलाफ हमेशा काम करता रहेगा ।
इसी संदर्भ में वह चीन की तथाकथित पशुपति से तिरुपति तक के लाल गलियारे की योजना के प्रति समय-समय पर चेतावनी भी देता रहता है। उसका कहना है कि पशुपतिनाथ यानी नेपाल में माओवादी शासन लाकर चीन ने सफलतापूर्वक पहला कदम उठा लिया है ।
इन्हीं नेताओं ने पार्टी के अंदर ही करार विरोधियो के खिलाफ अभियान शुरू किया। उनका कहना था कि करार को एकदम ठुकराया नही जाये क्योंकि यह भारत और अमेरिका के बीच दीर्धकालिक सामरिक साङोदारी मे नींव का पहला पत्थर होगा। लेकिन वह करार को बराबरी के आधार पर किये जाने का पक्षधर था । यह वर्ग इस बात से नाखुश था कि करार पर ढुलमुल रुख के चलते वामपंथियों को निशाना बनाने की जगह उनकी पार्टी उसके साथ चलती दिखायी दी जो राजनीतिक दृष्टि से किसी तरह से भी सही नही ठहराया जा सकता ।
इस मामले पर पार्टी अपना अलग पक्ष रखकर लीड ले सकती थी लेकिन उसने यह मौका खो दिया। हालांकि यह मुद्दा महंगाई जसा मुद्दा नहीं है जो आम आदमी से जुड़ा है और चुनाव में जिसका लाभ मिल सकता है। लेकिन प्रबुद्ध नागरिकों के लिये यह एक प्रमुख मुददा है और पार्टी इस मामले पर पूरी तरह दिग्भ्रमित नजर आयी। आडवाणी ने हालांकि इस करार पर पुन बातचीत की बात कह कर पार्टी की छवि को बचाने की कोशिश की लेकिन तब तक काफी नुक्सान हो चुका था।
मार्क्सवादी पार्टी के एक नेता तथा मायावती ने करार को मुस्लिम विरोधी बता कर इस करार से जुडे विवाद को एक नया आयाम दे दिया। यह एक विडंबना ही थी कि मुस्ल्मि समर्थक समङो जानी वाली कांग्रेस तथा समाजवादी पार्टी करार के समर्थन में थी तो मार्क्सवादी नीत वाम मोर्चा इसके खिलाफ। भारतीय जनता पार्टी के वामपंथियों के साथ चलने के कारण लगा कि धर्मनिरपेक्ष दल और सांप्रदायिक दल जसी अगर कोई बात है तो वह राजनीतिक लक्ष्यों के सामने गौण होती दिखायी दी और यही बात भारतीय जनता पार्टी को भाविष्य मे लाभ पहंचा सकती है।
आस्था का अलगाव
आस्था के अमरनाथ को लेकर भयावह अशांति और आतंक का माहौल है। जम्मू-कश्मीर का उग्रवाद के घोर त्रासद दिनों में जिस संकट से सामना नहीं हुआ वह एकाएक मुंह बाये खड़ा हो गया है। राजनीतिक अदूदर्शिता और फिर राजनीतिक मौकापरस्ती ने शांति की ओर लौटते जम्मू-कश्मीर को अलगाव की आग में झोक दिया है। अमरनाथ श्राइन बोर्ड का विवाद भी अगर हमारे राजनेताओं को कोई सबक नहीं सिखाता तो फिर वही कहा जा सकता है जो सुप्रंीम कोर्ट ने कुछ दिन पहले कहा था 'इस देश को भगवान भी नहीं बचा सकते।
सीतेश द्विवेदी
पिछले 40 दिनों से जम्मू-कश्मीर में अशांति है। पहले कश्मीर सुलगा अब जम्मू जल रहा है। इस आग के लपेट में राज्य सरकार जा चुकी है और केंद्र सरकार किंकर्तव्यविमूढ़ है। आजादी के बाद से राजनीतिज्ञों की दोमुंहे पन से कश्मीर सुलग रहा है। जहांगीर आज होते तो धरती के स्वर्ग के बारे में अपनी राय अवश्य बदलते। बीते पांच सालों में पहली बार ऐसा लग रहा था कि अब सब कुछ ठीक हो जाएगा। राज्य में पर्यटक आ रहे थे। लोग मुख्यधारा से जुड़ रहे थे। अलगाववादियों की हताशा भरी कायराना हरकतों को छोड़ दे तो कश्मीर शांति के रास्ते पर था लेकिन इसी समय राजनीतिज्ञों के एक फैसले कश्मीर को वहीं छोड़ दिया जहां यह सन् 47 में खड़ा था। महबूबा मुफ्ती और अलगाववादी जम्मू के लोगों घाटी की आपूíत बाधित किए जाने को लेकर मुजफ्फराबाद का रास्ता खोलने की बात कह रहे हैं तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को यही समय अपने इस राज्य को तीन भागों में बांटने वाले सपने के लिए मुफीद लग रहा है।
कश्मीर में लोगों के सड़कों पर उतरने का लम्बा इतिहास रहा है लेकिन जम्मू के लिए यह मंजर नया है। खुद जम्मू वालों के शब्दों में यह 60 साल के अन्याय के विरोध में है। निषेधाज्ञा का उल्लघंन कर लोग सड़कों पर है, पुलों पर है, नदी में है। इस आक्रोश को राजनीतिक चश्मे से देखने वाले कांग्रेस सरीखे कुछ राजनीतिक दल इसे अन्य पाíटयों की वोट बढ़ाने वाली चाल कहकर खारिज करने का प्रयास भले ही करें, लेकिन हकीकत यह है कि यह स्वत:स्फूर्त विरोध है और अगर ऐसा न होता तो जम्मू के कांग्रेसी विधायक, पूर्व सदर-ए-रियासत कर्ण सिंह के साथ आंदोलकारियों की (जमीन वापस देने को छोड़कर) मांग ना दोहरा रहे होते।
ताजा विवाद की वजह जम्मू कश्मीर सरकार का वह फैसला है जिसमें अमरनाथ यात्रियों के लिए पवित्र गुफा से 22 किलोमीटर पहले बालटाल में आठ सौ कैनाल (लगभग चालीस एकड़) जमीन अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दिए जाने की बात कही गई थी। सरकार के इस फैसले के बाद सरकार में शामिल रही पीडीपी की और अलगाववादियों की शह पर कश्मीर में व्यापक पैमाने पर प्रदर्शन हुए। पीडीपी ने सरकार से समर्थन वापस लेने का फैसला लिया और विश्वासमत से पहले बहुमत का दावा कर रही आजाद सरकार ने मत विभाजन से पहले इस्तीफा दे दिया। दरअसल यह सारा मामला कांग्रेस की उन्हीं राजनीतिक भूलों की एक कड़ी है जसा कि वह शाहबानों से लेकर ताला खुलवाने तक अंजाम देती आयी है। राजनीतिक तिकड़मों के माहिर माने जाने गुलाम नबी आजाद ने इस पूरे मामले को बेहद सतही ढंग से अंजाम दिया। विधानसभा चुनावों से ऐन पहले जम्मू के लोगों की सहानुभूति बटोरने के लिए आजाद सरकार का यह फैसला घाटी में वोटों की फसल काटने की ललक में खड़ी पीडीपी ने लपक लिया और कांग्रेस की हालत 'माया मिली न रामज् वाली हो गई।
सरकार के इस रवैये ने दम तोड़ रहे अलगाववादियों को खड़े होने के लिए एक बार फिर जमीन दे दी जहां से वे कश्मीरियों को केंद्र द्धारा राज्य के जनसंख्या अनुपात के बदले जाने का षडयंत्र करने का आरोप लगा कर अपनी दुकानें चला सकते थे। उन्होंने इसका फायदा उठाया और घाटी में एक बार फिर भारत विरोधी माहौल को खुलकर हवा दी। विभिन्न चैनलों पर देश के हजारों लोगों ने प्र्दशनकारियों को पकिस्तानी झंडा लहराते और भारत विरोधी नारे लगाते देखा व सुना। आंदोलन से सकते में आई राज्य सरकार ने बिना इस बात पर विचार किए आगे क्या होगा जमीन वापस लेने का फैसला कर लिया। अब जम्मू की बारी थी। सरकार के इस फैसले की वही प्रतिक्रिया जम्मू में हुई जो जमीन दिए जाने पर घाटी में हो रही थी। बहुसंख्यक डोगरा आबादी वाले जम्मूवासियों में अमरनाथ गुफा और यात्रा को लेकर गहरा भावनात्मक लगाव है। आजादी के बाद से सरकारों का ध्यान अशांत रहने वाले कश्मीर के मुकाबले शांत रहने वाले जम्मू की ओर कम ही गया है।
जम्मू वासियों ने कभी विरोध भी नहीं किया। यही नहीं जब कश्मीर में पाक प्रायोजित आतंकवाद चरम पर था और घाटी से तीन लाख से अधिक कश्मीरी पंडितों ने जान बचाने के लिए घाटी को छोड़ा तो इन्हीं जम्मू वासियों ने उनके लिए अपने घरों को खोल दिया। लेकिन सरकार के इस देकर वापस लेने वाले फैसले ने लोगों की संवेदनाएं झकझोर दी, लोग इसके विरोध में सड़को पर उतर आए जगह-जगह तोड़फोड़ की रास्ते रोके और घाटी की ओर जाने वाली रसद आपूíत को रोकने की कोशिश की। मजबूरन सरकार को सेना बुलानी पड़ी। लेकिन आंदोलनकारियों को इससे भी फर्क नहीं पड़ा और कई जगह उनकी तीखी झड़पें हुईं जिनमें कई आंदोलकारी मारे गए। एक सवाल यह भी उटता है कि हर मामले में सेना को बुलाने और नागरिकों के साथ होने वाले उनके इन टकरावों का क्या प्रभाव पड़ेगा। जम्मू के इस गुस्से को राज्य में जमीन तलाश रही भाजपा ने हवा दी। सियासत के इस झगड़े में देश की चिंता किसी को नहीं हुई।
इस पूरे घटना क्रम में केंद्रीय भूमिका निभाने वाले तत्कालीन मुख्यमंत्री गुलामनबी आजाद ने परिस्थतियों का आंकलन ठीक से नहीं किया यह बात तो दबी जुबान से वरिष्ठ कांग्रेसी नेता भी स्वीकार करते है। खुद आजाद के शब्दों में पीडीपी के समर्थन वापस लेने के बाद बहुमत सबित करने का उनका दांव इसलिए विफल हो गया क्योंकि विधानसभा चुनावों के बेहद करीब होने की वजह से विधायकों ने उनका साथ देने की बजाय कट्टरपंथियों की करीब मानी जानी वाली पीडीपी के साथ जाने में खुद को सुरक्षित माना। दरअसल घाटी से आने वाले ज्यादातर पीडीपी विधायक जमीन देने का विरोध कर रहे स्थानीय लोगों की मंशा के खिलाफ नहीं जा सकते थे। बात यहीं तक नहीं ठहरी जम्मू का गुस्सा शांत करने के लिए तर्क दिया जा रहा है कि जमीन कोई मुद्दा नहीं है और अमरनाथ यात्रियों के लिए पूरे यात्रा मार्ग में कही भी सुविधा पूर्वक ठहरने वाले टेंट, लंगर जसी सुविधाएं जुटाई जा सकती है। अगर बात इतनी ही थी तो फिर यह जमीन का नाटक क्यों खेला गया? इसका जवाब तो कांग्रेस पार्टी को ही देना होगा। जम्मू के आंदोलन की प्रतिक्रिया में कश्मीर घाटी में भी प्रतिक्रिया हो रही है। इतना सब होने के बवजूद राजनीतिक पार्टियां इसको अपने
Sunday, August 10, 2008
बंटवारे की ओर ले जाएगा जम्मू का रास्ता
महबूबा मुफ्ती
पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती मानती है कि जमीन के विवाद कहां नहीं है। लेकिन अमरनाथ यात्रा के मामले में कुछ नहीं बदला है। सिर्फ यह बदलाव हुआ है कि जो सुविधाएं श्राइन बोर्ड जुटाता था। वह अब सरकार जुटाएगी। इससे कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ा है।
देश को इस मुद्दे पर गुमराह किया जा रहा है। एक गुलाम नबी जब से आए स्थितियां बिगड़ती गयीं। और फिर गर्वनर सिन्हा साहब आग लगाकर चले गए। जम्मू में जो हो रहा है वह खतरनाक है। हमारे लिए सामान आने का रास्ता रोक दिया है। फिर हमारे पास दूसरा रास्ता खोलने के सिवा क्या विकल्प बचता है। याद रखिए यह रास्ता एक और बंठवारे की ओर जा रहा है। जम्मू-कश्मीर बंटा तो देश के बंटने में समय नहीं लगेगा।
जसा कि राज्य के पूर्व राज्पाल जनरल सिन्हा ने कहा मुफ्ती साहब श्राइन बोर्ड के खिलाफ है। ठीक नहीं है। पीडीपी पहले दिन से श्राइन बोर्ड को जमीन देने के खिलाफ थी। लेकिन गुलाम नबी आजाद सरकार ने श्राइन बोर्ड को जमीन देने का फैसला किया। नतीजन आज जम्मू जल रहा है, कश्मीर जल रहा है और उस आग ने समूचे मुल्क को चपेट में ले लिया है। हम श्राइन बोर्ड के खिलाफ नहीं है, हम यात्रियों के खिलाफ नहीं हैं। हम उनके द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाली जमीन का विरोध भी नहीं करते।
यात्रा के मार्ग में वे जहां चाहें लगंर लगा सकते हैं। पड़ाव बना सकते हैं। हमारे विरोध की दो वजहें हैं। एक तो अमरनाथ यात्रियों की भारी तादात की वजह से पार्यावरण को होने वाले नुकसान को लेकर, दूसरी वजह राजनीतिक वजह थी, जो अब लोगों की समझ में आ रही है और जिसने एक बटवारे जसी स्थिति पैदा कर दी है।
हकीकत में पूरे देश को इस मुद्दे पर गुमराह किया जा रहा है। मैं कहती हूं कि पूरे देश से लोग मेरे साथ चल कर देख लें वहां क्या बदला है। शेल्टर वही है, लंगर वहीं है, यात्रियों को वो सारी सुविधाएं वैसे ही मिल रही हैं, जसी कि पहले मिलती रही हैं। अगर कुछ बदला है तो सिर्फ इतना ही कि पहले यह सुविधाएं श्राइन बोर्ड जुटाता था अब सरकार एेसा कर रही है। इसमें कोई पहाड़ टूटने वाली बात मुङो नार नहीं आती।
यह सही है कि जम्मू-कश्मीर सरकार में हम शामिल थे, लेकिन यह पूरी तरह से तत्कालीन मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद और उनकी सरकार का फैसला था हमें जसे ही लगा कि यह फैसला लिया गया है। हमने उन्हें कहा कि यह गलत फैसला है इसके नतीो ठीक नहीं होंगे, इसे वापस लीजिए, क्योंकि इसके खिलाफ घाटी में विरोध शुरू हो गया है। लेकिन वे इसे टालते रहे बाद में उन्होंने इसे वापस लिया लेकिन यह बहुत देर से उठाया गया कदम था।
इसके बाद जम्मू में जिस तरह से कश्मीर की ओर जाने वाली रसद को रोका जा रहा है. जिस तरह से दवाइ्यों और अन्य जरूरी चीाों को घाटी में नहीं आने दिया जा रहा है. वह ठीक नहीं है। जम्मू-कश्मीर एक आजाद मुल्क था। भारत, पाकिस्तान के बनने से पहले हमारी रियासत से चीन की ओर रास्ता जाता था, हम रूस, ईरान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान से जुड़े थे। इसे एशिया का गेट-वे कहा जाता था। लेकिन कश्मीरियों ने इन सारे रास्तों सारी संभावनाओं को कुर्बान करके एक रास्ता चुना वह था ‘टनल का रास्ताज् एक जम्हूरी मुल्क के साथ राब्ता कायम करने का रास्ता। आज जब वह रास्ता बंद कर दिया गया है तो सारा मुल्क तमाशा देख रहा है।
हम कहना चाहते हैं कि अगर यह रास्ता बंद किया गया तो हमें मजबूरन 1947 वाले रास्ते चुनने पड़ेंगे और अगर ऐसा हुआ तो इसका परिणाम एक और बंटवारे के रूप में सामने आएगा। आज अगर यह देश मजहब के नाम पर बंटेगा तो कल यह, भाषा के नाम पर और आने वाले दिनों में जात-पात के नाम पर बटेगा। फिर बचेगा क्या?
हमारा मानना है कि आंदोलनकारियों से बात होनी चाहिए। आखिर एेसा तो कुछ भी नहीं हुआ है, जो अस्वीकार हो। क्या भोलेनाथ सिर्फ श्राइन बोर्ड के हैं। श्राइन बोर्ड भोलेनाथ से बड़ा तो नहीं है। दसअसल यह सारा फजाद पूर्व राज्यपाल सिन्हा साहब का फैलाया हुआ है। वह तो जम्मू में आग लगाकर चले गए।
आखिर फसाद है किस बात का? जिस जमीन की बात हो रही है वह जंगल की है। कानूनन उसका स्थानांतरण हो ही नहीं सकता। किराए पर देने की बात हुई थी। ढ़ाई करोड़ किराया था। वह भी नहीं लिया गया। अब ्अगर सरकार यह कह रही कि वह बिना इन सब मामलों में पड़े यात्रियों को सहूलियत देगी, चाहें जो भी खर्च आए तो समस्या कहां है, हम चाहते हैं कि लोग आकर वस्तुस्थिति को देखे। अगर उन्हें लगता है कि पूजा में या दर्शन में कोई विघ्न पड़ा है तो हम अपनी गलती मान लेंगे।
दरअसल आजाद सरकार ने कभी हमारी सुनी ही नहीं।
हम सेना को कश्मीर से बाहर करना चाहते थे, लेकिन उन्होंने इस पर मंत्रिमंडलीय बैठकों में कभी बात ही नहीं होने दी। वे चाहते थे कि जमीन दी जाए। उनके ऊपर राज्यपाल का दबाव था। जिसके कारण उन्होंने यह फैसला लिया। लेकिन बदकिस्मती से वे इसके परिणामों का सही आंकलन नहीं कर पाए और यह सारा बवाल हो गया।
जमीन का झगड़ा कहां नहीं है। नन्दीग्राम, सिंगूर, उड़ीसा अगर कश्मीर के लोगों ने एेसा फैसला किया तो क्या गलत हो गया। आखिर उत्तरांचल भाजपा सरकार ने भी गंगोत्री की यात्रा करने वालों की संख्या सीमित करने की बात कही है। हम श्राइन बोर्ड को इसलिए जमीन नहीं देना चाहते क्योंकि इससे पर्यावरण को नुकसान होता। आखिर हमारे पास पर्यटन के अलावा है क्या। जम्मू-कश्मीर में, कोयला खानें नहीं हैं, उद्योग नहीं और सुविधाएं नहीं हैं। केवल देखने की खूबसूरती ही है। अगर यह भी नहीं रही तो?
हमारी सरकार आने के बाद स्थितियां सुधरी थीं लेकिन जब से आजाद साहब आए वे चीज़ों की संभाल नहीं पाए। वे एक को खुश करने में दूसरे को नाराज करते रहें। इस समय तो मेरी सबसे यह विनती है कि लोग सामने आएं। मैं फिर कह रही हूं कि अगर जम्मू-कश्मीर बंटेगा तो देश को बंटने में समय नहीं लगेगा। अगर आप हमारा एकमात्र रास्ता बंद करेंगे तो कल यह सवाल खड़ा होगा कि फिर इस देश से जुड़े रहने का क्या औचित्य है। लोग कहेंगे कि उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाए।
Saturday, August 9, 2008
आप देखते रहें लॊकशाही
कब सुलझेगा अमरनाथ का सवाल
अमरनाथ श्राइन बोर्ड से जमीन वापस लेने का मामला जम्मू में तूल पकड़ता जा रहा था। इसने जम्मू में इतना तूल पकड़ा कि वहाँ एक महीने से कर्फ्यू लगा हुआ है। जम्मू में लोग कर्फ्यू और सेना के फ्लेग मार्च की पहवाह किए बिना ही सड़कों पर आ रहे हैं और पुलिस के साथ पत्थरबाजी कर रहे हैं।हिंदुओं में इस बात को लेकर रोष है कि हिन्दुस्तान में रहते हुए चंद मुसलमानों के द्वारा किए गए हंगामे के बाद कांग्रेसी सरकार ने श्राइन बोर्ड से जमीन वापस ले ली जो निहायत ही गलत बात है। यह बहुसंख्यक समुदाय की भावनाओं के साथ खिलवाड़ है। उस समुदाय के साथ जो अभी तक शांत बना हुआ था।
जानकार बता रहे हैं कि जम्मू में ऐसा पहली बार हो रहा है और यह रोष इस बार धार्मिक के साथ-साथ राजनीतिक भी है। क्योंकि श्राइन बोर्ड भूमि को वापस लेने के फैसले को जिस कांग्रेसी मुख्यमंत्री ने लिया है वो जम्मू के लोगों की मदद के बूते पर ही मुख्यमंत्री बने थे या कहें कि वे जम्मू के ही थे और उन्हें वहाँ के हिंदुओं ने ही वोट देकर जिताया था।
गुलाम नबी आजाद ने यह फैसला लेकर ना सिर्फ जम्मू के लोगों को नाराज किया है वरन उन्होंने अपने लिए आगे के भी रास्ते बंद कर लिए हैं। जम्मू इस समय आजाद को दोगला करार दे रहा है और स्वतः व्यापार व्यवसाय बंद कर आंदोलन में कूद गया है।
भारत, इंडोनेशिया के बाद संसार का दूसरा सबसे बड़ा मुस्लिम देश है। यहाँ से मक्का जाने वाले हज यात्रियों को विशेष रियायतें दी जाती हैं। मस्जिदों को बनाने के लिए भी केन्द्र, शासन और प्रशासन विशेष सुविधाएं और रियायतें प्रदान करता है। लेकिन अमरनाथ श्राइन बोर्ड मामले ने देश कॊ दॊ भागॊं में बांटने का काम किया है। इसकी आग में कई लॊग बली चढ़ चुके हैं।
ऐसा नहीं है कि आंदॊलन का असर केवल हिंदूऒं पर पड़ रहा है। यात्रा में आने वाले हिंदू उन हजारॊं मुसलमानॊं कॊ रॊजगार देतें हैं जॊ रास्तॊं में दुकान लगाए बैठे हैं। वहाँ के मुस्लिम भी अभी तक सौहदार्यपूर्वक ही पेश आते रहे हैं और कुछ आतंकी गतिविधियों को छोड़ दिया जाए तो कभी वहाँ के लोगों से तीर्थयात्रियों को परेशानी या शिकायत नहीं रही।
आखिर पहाड़ के ऊपर मिलने वाली उस जमीन से कश्मीर के निवासियों का ऐसा क्या बिगड़ा जा रहा था कि उन्हें उसके लिए आंदोलन करना पड़ा और ये भी कि अब उन्हें क्या मिल गया जब जम्मू के लोगों ने उस पैदा हुई दरार को खाई जितना चौड़ा कर दिया है।जहां कांग्रेस कश्मीर में वोटों की रोटी सेंकने के चक्कर में तो पीडीपी कश्मीर को स्वायत्तशासी घोषित करवाने के चक्कर में एक ऐसी चाल चल गए हैं जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं क्योंकि अमरनाथ से पूरे देश के हिंदुओं की भावनाएँ जुड़ी हैं।
धर्म और लॊगॊं की भावनाऒं कॊ भड़काकर तनाव पैदा करने वाले राजनेताऒ से हम यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि वे लॊगॊं के मरने के बाद उस पर राजनीति नहीं करेंगे। भाजपा और उसके सहयॊग संगठन पूरी तैयारी में बैठे हैं और अगर मामले कॊ जल्द न सुलझाया गया तॊ अयॊध्या जैसे कारनामें करने में वे चुकने वाले नहीं हैं। इसकी हुंकार लालकृष्ण आडवाणी और राजनाथ दे आज की युवा क्रांति रैली में दे चुकें हैं।
इन नेताऒं की घिनौनी साजिशॊं से बचना है तॊ हम लॊगॊं कॊ खुद ही अमरनाथ मामले का सही और सटीक उपाय खॊजना हॊगा।
सदमें में माया के सर्वजन
माया के ताजा बयान से सवर्ण कार्यकर्ता सदमें में हैं। उन्हें लगने लगा है कि क्या माया उनका भी इस्तेमाल कर रहीं हैं दलित वॊटॊं की तरह। अगर इनकॊ इसका आभास हुआ तॊ यह मायावती के लिए खतरनाक हॊ सकता है।
मायावती ने आज ये कहकर सबको चौंका दिया कि उन्होंने अपना उत्तराधिकारी चुन लिया है। मायावती ने ये भी कहा कि उनका उत्तराधिकारी दूसरी पार्टियों की तरह उनके ही परिवार का नहीं होगा। उसकी उम्र १८ साल है और वह उनकी ही जाति का है। माया की यह घॊषणा एक तरह से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर सीधी चोट है।
मायावती ने दहाड़कर कहा कि उनका राजनीतिक उत्तराधिकारी एक सामान्य दलित परिवार से होगा। उसमें भी वो चमार जाति से है। उसे वो पिछले कुछ सालों से तैयार कर रही हैं लेकिन उसका नाम उनके मरने या गंभीर रूप से बीमार होने की स्थिति में ही पता चलेगा। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि उसका नाम उनके अलावा पार्टी के सिर्फ दो लोगों को पता है।
अब मायावती से 18 साल छोटा उनका ये राजनीतिक उत्तराधिकारी सचमुच कहीं है या फिर वो सिर्फ शगूफा छोड़ रही हैं। इसकॊ लेकर राजनीतिक हलकॊ में चर्चा जॊरॊं पर है। क्योंकि वो अभी नाम किसी को नहीं बताने जा रहीं। लेकिन इतना तो तय है कि बसपा के आंख बंदकर हाथी पर ठप्पा मारने वाले कार्यकर्ताओं को इतना संबल तो बहनजी ने दे ही दिया है कि बहनजी पर कोई विपदा आई भी तो, दलित समाज का एक नया भाईजी उनकी अगुवाई के लिए तैयार है।
जानकारॊं की माने तॊ माया की यह घॊषणा लखनऊ से दिल्ली पहुंचाने के लिए कार्यकर्ताओं कॊ जॊश में लाने का संकेत हॊ सकती है। लेकिन इन सब के बीच वे कार्यकर्ता जॊ सवर्ण समुदाय से आते हैं उनके लिए निराशाजनक है। उन्हे अगर यह लगने लगे की माया के बाद उनका पार्टी में कॊइ रखवाला नहीं रहेगा तॊ इसका असर विपरित पड़ सकता है और इसका फायदा सपा कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियां उठा सकती है।