Thursday, February 7, 2008

ठोकर खाएंगे ठाकरे...

अमिताभ बच्चन की एक फिल्म है- लक्ष्य. उसमें अमिताभ भारतीय सेना के एक अधिकारी हैं. फिल्म में वह मराठी हैं. अपने मातहत अफसरों से पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के बारे में समझाते हुए कहते हैं कि हमारी मराठी में एक कहावत है- पहले उसे मराठी में सुनाते हैं फिर हिंदी में अर्थ बताते हैं कि अपना घर तो संभलता नहीं और दूसरों की बात करते हैं.

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे के साथ भी कुछ ऐसा ही है. क्यों कर रहे हैं राज साहब ये सब. अपनी पार्टी का बिखराव रोकने के लिए, अपना जनाधार बढ़ाने के लिए या फिर उद्धव ठाकरे से मुकाबला करने के लिए या फिर मुंबई में दूसरे राज्यों से आने वाले लोगों की समस्या की ओर लोगों का ध्यान खींचने के लिए या फिर अपना घर (पार्टी) ना संभाल पाने की हताशा?

उनका मकसद इनमें से कोई भी हो, पर वह उसे हासिल करने का जो तरीका उन्होंने अपनाया है वह उन्हें एक और नाकामी की ओर ले जाएगा.

शिवसेना में रहते हुए उन्हें लग रहा था कि उनकी प्रतिभा के बजाय उनके ताऊ बाल ठाकरे अपने बेटे उद्धव को तरजीह दे रहे हैं. पार्टी में राज और उद्धव के बीच शीत युद्ध का एक दौर चला. उन्हें लग रहा था कि ठाकरे अब महाराष्ट्र के तो क्या मुंबई के भी शेर नहीं रहे. उनका सोचना गलत नहीं था.

ऐसे में राज ठाकरे के समर्थकों को उनमें पुराने बाला साहब की झलक दिखाई दे रही थी और राज को खुद भी ऐसा ही लगता था. राज ठाकरे ने ऐसे समय में शिवसेना छोड़ी जब बाल ठाकरे के पुराने साथी एक-एक कर पार्टी से बाहर अपना भविष्य तलाश रहे थे. राज ठाकरे को लगा कि उद्धव उनका मुकाबला क्या करेंगे, सेना की विरासत तो उनका इंतजार कर रही है. बस उनके आगे बढ़कर संभालने की देर है.

महाराष्ट्र और मुंबई के स्थानीय निकाय चुनावों में वो सेना की विरासत पर मतदाता की मुहर लगवाने के इरादे से उतरे. चुनाव नतीजों से पता चला कि हकीकत और राज ठाकरे के सपनों की दुनिया में बहुत फासला है. राज ठाकरे बाला साहब से हार जाते तो शायद उन्हें इसका ज्यादा मलाल ना होता लेकिन उद्धव से हार को वे बर्दाश्त नहीं कर पाए.

24 जनवरी को उत्तर प्रदेश दिवस होता है. मुंबई के उत्तर भारतीय उत्तर प्रदेश दिवस और छठ के त्यौहार को बड़ी धूमधाम से मनाते हैं. उत्तर प्रदेश दिवस पर दो कार्यक्रमों में उद्धव ठाकरे भी गए और उनका खासा स्वागत भी हुआ. इस घटना ने राज ठाकरे की हताशा को और बढ़ा दिया.

शिवसेना का इतिहास राज ठाकरे को पता है, लेकिन ऐसा लगता है कि मुंबई के वर्तमान को वह भूल गए. बाल ठाकरे के चार दशक पुराने रास्ते पर चलने का फैसला करने से पहले उन्होंने कोई गंभीर सोच विचार नहीं किया. अगर करते तो समझ जाते कि बाल ठाकरे की तरह उनके पास मराठी संस्कृति और अस्मिता की रक्षा जैसे नारों का कोई भावनात्मक आधार नहीं है.

वे यह भी भूल गए कि फरवरी 1956 में मराठी भाषियों के लिए अलग राज्य की मांग को लेकर आंदोलन के लिए जिस तरह संयुक्त महाराष्ट्र समिति का गठन हुआ उसके प्रमुख नेताओं में बाल ठाकरे के पिता प्रबोधनकर ठाकरे भी थे. 1960 में बंबई प्रांत को तोड़कर मराठी भाषियों के लिए महाराष्ट्र और गुजराती भाषियों के लिए गुजरात बना.

मराठी भाषियों के लिए अलग राज्य बनने के बावजूद असरदार पदों पर गैरमराठियों के काबिज होने को आधार बनाकर शिवसेना ने अपने पैर जमाए. आज की मुंबई में मराठी 60 के दशक की तरह उपेक्षित नहीं हैं. बाल ठाकरे अपनी हिंसा की राजनीति के बावजूद अगर कभी जेल नहीं गए तो इस कारण कि मुंबई से लेकर दिल्ली तक कांग्रेस के असरदार नेताओं का हाथ उनकी पीठ पर था.

हिंसा की राजनीति करने वाले का रसूख तभी तक रहता है जब तक राज्य सत्ता की ताकत उस पर अंकुश नहीं लगाती है. तमाम और बातों के अलावा बाल ठाकरे की सबसे बड़ी ताकत यही थी. आज तक किसी भी मामले में ठाकरे या उनका विश्वस्त जेल नहीं गया.

राज ठाकरे और उनकी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ता जिन गरीब टैक्सी वालों, सब्जीवालों और रेहड़ी पटरी के लोगों को निशाना बना रहे हैं, उन्होंने मराठी लोगों से ना तो रोजगार छीना है और ना ही उनकी संस्कृति के लिए कोई खतरा है.

अमिताभ बच्चन आज सुपर स्टार हैं तो इसलिए नहीं कि वो मुंबई में रहते हैं. यदि फिल्म उद्योग मुंबई में नहीं होता तो भी अमिताभ बच्चन सुपर स्टार ही होते. बच्चन और उनके जैसे कलाकारों ने मुंबई से जितना लिया उससे ज्यादा दिया है.

राज ठाकरे को यह बात समझ में नहीं आएगी इसलिए कि वे समझना ही नहीं चाहते. राजसत्ता को उन्हें और उनके समर्थकों को बताना पड़ेगा कि विभाजनकारी ताकतों के एक और दौर के लिए मुंबई तैयार नहीं है. यह जल्दी हो, सबके लिए ये अच्छा होगा.



प्रदीप सिंह

Wednesday, February 6, 2008

अर्थनीति बनाम राजनीतिः कैसे सधे दोऊ..!

बजट का संबंध आर्थिक नीति से होता है या राजनीति से? आप आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं तो कहेंगे कि राजनीति बाद में, आर्थिक नीति पहले और, अगर नेता हैं तो कहेंगे आर्थिक नीति बाद में देख लेंगे, पहले देखो कि इससे हमारी राजनीति न बिगड़ जाए.

गलती से कहीं आप मनमोहन सिंह और पी. चिदंबरम हैं तो दोनों में संतुलन साधने की चुनौती आपके सामने है. कहते हैं कि अच्छी अर्थनीति अच्छी राजनीति भी हो यह जरूरी नहीं है. लेकिन जनतंत्र में जो यह नहीं पर पाएगा उसकी अर्थनीति और राजनीति दोनों बिगड़ जाएगी. इस बात का एहसास मनमोहन सिंह से ज्यादा और किसे होगा.

भारत में मनमोहन सिंह और पीवी नरसिंहराव की जोड़ी, आर्थिक उदारीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण के जनक हैं. 1991-92 में शुरू की गई आर्थिक उदारीकरण की नीति ने न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था को घोर संकट से उबार लिया बल्कि उसे विकास के हाईवे पर डाल दिया.

पीवी नरसिंहराव और मनमोहन सिंह की इस कामयाबी ने देश और दुनिया में खूब झंडे गाड़े. पांच साल बाद आम चुनाव हुए तो कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई. 2004 में मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री तो बन गए पर लोकसभा का चुनाव नहीं जीत पाए.

कांग्रेस की हार में सबसे बड़ा योगदान आर्थिक नीतियों का था. वह भी ऐसे हालात में जब इन नीतियों को लेकर वामदलों के अलावा किसी का विरोध नहीं था. वामदलों का विरोध भी दिल्ली में सुनाई देता है और कोलकाता पहुंचत-पहुंचते उसकी दिशा बदल जाती है.

पिछले डेढ़ दशक में आर्थिक उदारीकरण ने देश की अर्थव्यवस्था को विससित देशों के बरक्स खड़ा करने की कोशिश की है. इसके बावजूद जो भी उदारीकरण का चैंपियन बना, उसे जनता ने बाहर का रास्ता दिखा दिया.

कर्नाटक में एसएम कृष्णा, आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू और केंद्र में इंडिया शाईनिंग का नारा लगाकर भारतीय जनता पार्टी अब तक पछता रही है. पर यह भी सच है कि न तो भाजपा ने कांग्रेस की दुर्दशा से सबक सीखा और न ही कांग्रेस ने भाजपा की हार से.

हालांकि सत्ता में आने से पहले कांग्रेस ने जब राष्ट्रीय साझा न्यूनतम कार्यक्रम बनाया उस समय लग रहा था कि कांग्रेस इस बार पुरानी गलती नहीं दोहराएगी. करीब चार साल सत्ता में रहने के बाद पार्टी फिर वहीं खड़ी है जहां 1996 में थी.

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी कह रही हैं कि ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना ठीक से लागू नहीं हुई. राहुल गांधी कह रहे हैं कि योजनाओं के एक रुपए का केवल पांच पैसा जरूरतमंद तक पहुंच रहा है.

मनमोहन सिंह सरकार के इस कार्यकाल का यह आखिरी बजट होगा. वित्तमंत्री पी चिदंबरम जब बजट पेश करने के लिए खड़े होंगे तो उनके सामने अपने पहले ड्रीम बजट की यादें होंगी या आम आदमी के सपने.

साढ़े आठ फीसदी की विकास दर, तरक्की करता सेवा क्षेत्र, उत्पादन बढ़ाता औद्योगिक क्षेत्र और प्रत्यक्ष कर से लबालब वित्तमंत्री की झोली, ये सब तथ्य क्या देश के 44 फीसदी ग्रामीणों के घरों को रौशन कर सकते हैं.

भारतीय नमून सर्वेक्षण संगठन की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 74 फीसद ग्रामीण घरों में अब भी उपले और लकड़ी पर खाना बनता है. वित्तमंत्री पेट्रोल और डीजल पर कितनी सब्सिडी दे रहे हैं, इससे इनलोगों को क्या मतलब..?

बात केवल गांव की नहीं, शहर में भी गरीब के हालात बहुत अलग नहीं हैं. शहरों में 22 फीसदी लोग रोजाना 19 रुपए प्रतिव्यक्ति ही खर्च करने की हैसियत रखते हैं.

प्रधानमंत्री के तमाम आश्वासनों और पैकेज के बावजूद किसानों की आत्महत्या रुकने का नाम नहीं ले रही. बुंदेलखंड में पानी से बेहाल लोग पलायन कर रहे हैं फिर भी अर्थव्यवस्था नौ फीसदी की रफ्तार से दौड़ रही है.

विकास के इन आंकड़ों का हाल मुद्रास्फीति की दर की तरह है जो आंकड़ों में घटती है तो वास्तविकता में महंगाई बढ़ती है.

आर्थिक नीतियां हों या बजट घोषणाएं, कोई सरकार आज तक इनके बूते चुनाव नहीं जीती है. हां, चुनाव हारने वालों की लंबी फेहरिस्त है. इंदिरा गांधी 1971 में आर्थिक नीतियों के कारण नहीं गरीबी हटाओ के नारे पर जीती थीं. महंगाई कम करके भी जनता पार्टी चुनाव हार गई थी.

मनमोहन सिंह, चिदंबरम और कांग्रेस पार्टी को यह सब पता है. अच्छी आर्थिक नीति को अच्छी राजनीति बनाने की दिशा में ग्रामीण रोजगार गारंटी और भारत उदय योजना शुरू की गई थी.

पर योजना बनाना और उसे लागू करना दोनों अलग बातें हैं. ऐसी सारी योजनाएं भ्रष्ट तंत्र के लिए कमाई के नए अवसर लाती है. अपनी पूर्ववर्ती सरकारों की तरह ही कांग्रेस भी शायद बजट के सहारे चुनाव जीतना चाहती है और उसके विरोधी इसी के आधार पर उसे मात देना चाहते हैं.

इसलिए बजट पर सरकार के घटक दलों की नजर है तो विरोधियों की भी.

इन चार सालों में कई ऐसे मौके आए जब लगा कि वामदल चिदंबरम की बलि लेकर ही मानेंगे. बजट बनाते समय वित्तमंत्री को अर्थव्यवस्था की विकास दर, बजट घाटे, वामदलों की इच्छा, विरोधियों की आलोचना और अपनी पार्टी की चुनावी सभाओं का ध्यान रखना होगा.

अर्थशास्त्री भविष्य की सोचता है तो राजनेता अगले चुनाव की. मनमोहन सिंह जब चिदंबरम के बजट प्रस्ताव को मंजूर करेंगे तो उनके अंदर का अर्थशास्त्री हावी होगा या पिछले चार सालों की राजनीति का अनुभव.

क्योंकि अच्छा बजट बनाना और चुनाव जीतना, दोनों अलग-अलग विधाएं हैं. यह बजट देश की अर्थव्यवस्था की दिशा ही तय नहीं करेगा, कांग्रेस की राजनीतिक दशा भी तय करेगा.




प्रदीप सिंह

गांधी के रास्ते पर चलने के लिए सड़क बनवाई है...!

आजादी...

आजादी के लिए
लड़नेवाले
इतिहास हो गए,
जो जानते नहीं
इतिहास
बादशाह हो गए.
.....................

गांधीवादी

नेताजी ने जिंदगी भर
गांधीजी की राह पर
चलने की
कसम खाई है
इसीलिए घर और दफ्तर के बीच
गांधी मार्ग नाम से
सड़क बनवाई है.
.............................................

बाहुबली

बड़े बाहुबली हैं
सभी को
आंखें दिखाते हैं,
लेकिन घर में
घुसते ही
पत्नी के आगे
सिर झुकाते हैं.




राजेंद्र श्रीवास्तव

Tuesday, February 5, 2008

राज ठाकरे के निशाने पर महानायक...

उत्तर भारतीयों को निशाना बनाने की बात अब खबरिया चैनलों के टीकर लायक हो गई है. राज भी इससे इत्तेफाक रखते होंगे. काफी सोच विचार के बाद उनके मन में आया कि क्यों न इस बार कुछ अलग किया जाए जिसकी ठसक थोड़ी जोरदार हो. ऐसा नहीं की फुलझड़ी की माफिक फुसफुसा कर रह जाए.

बस क्या था सदी के महानायक पर हल्ला बोल दिया. अमिताभ महाराष्ट्र से ज्यादा यूपी का ख्याल करते हैं. वहां बहू के नाम पर कॉलेज खोला. भोजपुरी फिल्मों में काम करते हैं. यूपी के ब्रांड एम्बैसडर हैं. वगैरह वगैरह.

राज को मालूम था कि अमित भैया पर हमला बोला तो इसकी प्रतिक्रिया जल्द मिलेगी. अमिताभ जिस दल के साथ उठते बैठते हैं उसका संस्कार भी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना से इतर नहीं है. सबकुछ वैसे ही हुआ जैसा राज का प्लान था. सपाइयों ने तुरंत जवाबी हमला बोला. नारा लगाने लगे, ईंट का जवाब पत्थर से देंगे.

राज के घर के सामने रैली की. रही सही कसर जया भाभी ने यह कहकर पूरी कर दी कि वह बाल ठाकरे और उद्धव ठाकरे के अलावा और किसी ठाकरे को नहीं जानतीं.

बस क्या था एमएनएस कार्यकर्ता भड़क उठे. सपाइयों से सीधे भिड़ने के बजाय गरीब मजबूर उत्तर भारतीयों को ठोंकने लगे. कारें तोड़ी. मन नहीं भरा तो सिर भी फोड़ डाले. खोमचे पलट दिए. और तो और मुंबई की लाइफलाइन लोकल ट्रेनों में चल रहे यात्रियों को नाम पूछ-पूछ कर मारा.

सबकुछ चलता रहा. खबरिया चैनलों को मसाला मिल गया. नेताओं को प्रतिक्रिया देने का मौका. लेकिन यहां भी राजनीति. मराठी वोट बैंक खिसकने के डर से महाराष्ट्र के ज्यादातर दलों ने चुप्पी मार दी. आम लोग पिटते रहे.

सबसे ताज्जुब की बात है कि इस मुद्दे पर बिगबी की अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. उन्होंने इस आग को ठंडा करने के लिए भी कुछ कहने की जहमत नहीं उठाई. उठाएं भी क्यों. ठंड से उनका गला खराब है और छोटे भैया अमर सिंह तो मोर्चा संभाले ही हुए हैं.


अजय श्रीवास्तव

Monday, February 4, 2008

जनता तो वोट से ही जवाब देती है...

सत्ता के भूखों ने एक बार फिर विभाजनकारी कोशिशें शुरू कर दी हैं और इसमें उनका साथ परोक्ष रूप से दे रहें वे लोग, जिन्होंने कभी उन लोगों को अपना हितैषी समझ कर गद्दी पर बिठाया था.

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे के समर्थकों द्वारा गैर मराठी, खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों को लगातार निशाना बनाना शर्मनाक है. आखिर यह कैसी राजनीति हो रही है जिसमें देश तो एक है लेकिन लोगों को प्रांतीय आधार पर अलग रखने का प्रयास किया जा रहा है.


महाराष्ट्र में पहली बार अगर किसी ने प्रांतीय पैमाने का जहर घोला था तो वे हैं शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे. उन्होंने 'महाराष्ट्र मराठियों का है' का नारा दिया था. इससे आगे जाकर उन्होंने हिंदुत्व के नाम पर लाठी की राजनीति की. सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो, फरमान इनका चलता रहा है. उत्तर भारत के नौजवान रेलवे की परीक्षा देने गए वहां गए तो शिवसेना समर्थकों ने प्लेटफार्म पर ही उन्हें पीटा और उनसे बदसलूकी की. फिर भी सरकार खामोश रही. सरकार की चुप्पी ने ऐसे लोगों का मनोबल इतना बढ़ाया है कि वे अब महाराष्ट्र को अपनी जागीर समझने लगे हैं.

राज ठाकरे बिहार और उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को अछूत समझ रहे हैं लेकिन उन्हें शायद किसी ने यह नहीं बताया कि इसी धरती पर शांतिदूत बुद्ध और महावीर ने नई शुरूआत की थी. उनकी पूजा आज सारे विश्व में होती है. यहीं सम्राट अशोक और विद्वान चाणक्य पैदा हुए थे. राज ठाकरे शायद यह भूल गए कि छठ पर्व हिंदुओं का पर्व है और जिन बाल ठाकरे से उन्होंने राजनीति सीखी है, उन्होंने भी सारी उम्र हिंदुत्व को आधार बना कर ही राजनीति की है.


पूरे घटनाक्रम में अगर किसी के दोनो हाथों में लड्डू है तो वह है कांग्रेस पार्टी. और, यही कारण है कि इस मामले को तूल पकड़ने दिया जा रहा है. न तो प्रधानमंत्री कोई बयान दे रहे हैं और न ही सप्रंग अध्यक्ष सोनिया गांधी का कोई वक्तव्य आ रहा है. सभी जानते है कि राज ठाकरे बाला साहब ठाकरे के भतीजे हैं. राज ठाकरे की इस तरह की अतिवादी हरकतों से शिवसेना को लेकर लोगों का गुस्सा बढ़ेगा और कांग्रेस इससे फायदा उठाने की उम्मीद में खामोश है.


लेकिन यह सोचना कांग्रेस के लिए खुद की कब्र खोदने जैसा होगा क्योंकि डेढ़ साल बाद देश में आम चुनाव होने हैं. बिहार और उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 40+80= 120 सीटें हैं जो लोकसभा सांसदों का 22 प्रतिशत है. चुप्पी का जवाब कांग्रेस को भी देना होगा. जनता तो वोट से ही अपना जबाव देती है.



कुणाल कुमार

Sunday, February 3, 2008

आडवाणी जीः ठाकरे का हाथ या यूपी-बिहार का साथ...?

लाल किशनचंद आडवाणी जी.
प्रणाम

नेताओं से चकमक आपकी पूरी भारतीय जनता पार्टी में बस आप ही मेरी पसंद के नेता हैं.

सारे देश को अटल जी पसंद हैं, बेहद पसंद हैं. मुझे नहीं.

आप जब कट्टर थे, तब भी पसंद थे. अब उदार हो गए हैं, तब भी पसंद हैं. पसंद पार्टियों और स्टैंड की तरह बदली नहीं जा सकतीं.

नेता होने से ज्यादा साहस, गंभीरता और धैर्य की जरूरत होती है समर्थक होने में. नेताजी बदल जाते हैं, विचार बदल लेते हैं लेकिन समर्थक को साथ बने रहना होता है. नेता के हर कदम और हर बयान को सही ठहराना होता है.

संजय निरूपम शिवसेना में थे तो मुसीबत कम थी. जब से कांग्रेस में गए हैं, पूर्वांचल वालों पर पहाड़ टूट पड़ा है. महाराष्ट्र में जितने सेनानामी संगठन हैं, सचमुच बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों को देखकर सैनिकों जैसी बातें करने लगे हैं.

असम में हिंदीभाषियों को मारने वालों और महाराष्ट्र में धमकाने वालों में बहुत अंतर नहीं रह गया है आडवाणी जी.

आपको प्रधानमंत्री बनना है. इसलिए नहीं कि देश को आपकी बहुत जरूरत है. इस देश को अफसर चला रहे हैं. नेता कोई हो, देश चल जाएगा. भरोसा न हो तो अपने किसी जिलाध्यक्ष को प्रधानमंत्री बनाकर देख लीजिए. देश पाँच साल बाद भी ऐसा ही रहेगा.

आपको प्रधानमंत्री इसलिए बनना है ताकि इन निकम्मे प्रधानमंत्री महोदय से देश को मुक्ति मिले. राज्यसभा और जनपथ वाले प्रधानमंत्री जी से मुक्ति दिला दीजिए, प्लीज़.

और, अपनी सरकार में आप राज्यसभा से किसी को मंत्री भी मत बनाना. पता नहीं ये कहां-कहां से पढ़कर आते हैं. एक फैसला ऐसा नहीं करते जो वोट देने वाले आम लोगों के हित में हो. कभी जाति देख लेते हैं, कभी धर्म देख लेते हैं. एक तो टीवी और अखबारों में छपने के अलावा कुछ करते नहीं, और जब करते हैं तो तीन-पांच कर देते हैं.

वाम प्रशंसक हूं लेकिन वोट आपको ही दूंगा. सच्ची में दूंगा. वामपंथियों ने तो कांग्रेस से भी ज्यादा नर्क कर रखा है. लोगों को बेवकूफ बनाने की भी कोई सीमा होती है कि नहीं. रोज गाली भी देते हैं और जिंदा रहने की गोली भी दे आते हैं.

खैर, मैं तो यही सोचकर कांप रहा हूँ कि सरकार में रहते मोदी के सैनिकों ने मजे से जो काम कर दिया था वह तो कांग्रेसी इंदिरा जी की हत्या के बाद भी नहीं कर पाए थे. अभी तक उस पार्टी में कोई साहसी नहीं हुआ जो यह कह सके कि 84 में जो किया था, वह ठीक था.

आपके बाद यह साहस और साफगोई मोदी जी में आई है. इसलिए देश के लोग आपके बाद उन्हें ही प्रधानमंत्री मानकर चलने लगे हैं. जोशी जी से बचकर रहिएगा तो कोई दिक्कत भी नहीं होगी.

लेकिन आप ये अभी बता दीजिए कि अगले साल जब आप गठबंधन दलों के नेता के तौर पर प्रधानमंत्री बनेंगे और रेसकोर्स में रहने जाएंगे तो ये सेना वाले आपके गठबंधन में तो नहीं होंगे न.

ये जान लेना इसलिए जरूरी है कि उसके बाद इनकी हरकतों पर आप तो कुछ करेंगे नहीं तो कम से कम महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार बचा ली जाए. वैसे भी विधि-व्यवस्था का मामला तो राज्य का ही काम है.

देश के लोगों का जाति या धर्म के नाम पर भड़कने और उसके भयावह नतीज़ों, दोनों के आप प्रत्यक्ष गवाह रहे हैं.

आपकी पार्टी और उसके बगलबच्चों में पहले से ही भारतीय संविधान को बिना पढ़े और दिल में उतारे कई लोग नेता बन चुके हैं. अब गठबंधन में ऐसे नेताओं को नहीं जुटा लीजिएगा. अर्जी बस यही है.

वोट तो आपको बिहार और उत्तर प्रदेश से भी लेना है. हम देना भी चाहते हैं. आपको बता दें कि हम आम चुनाव के इंतजार में बैठे हैं. लेकिन आप किसी दोयम नेता या त्रियम पार्टी से हाथ न मिला लीजिएगा जो कहते हैं कि बिहार के लोग बिहार में रहें, उत्तर प्रदेश वाले अपने राज्य में.

ऐसे राज्यप्रेमी के साथ आप चले जाएंगे तो हम देशप्रेमी आपके साथ भला कैसे रह पाएंगे. और आप उनका मनोबल बढ़ाएंगे तो क्या पता कल आपको भी कह दें कि गुजरात वाले भी भाग जाएं.

आप तो गुजरात के हैं न. मोदी जी के वोटर आपको वोट दे ही देंगे. लेकिन बिहार और उत्तर प्रदेश वाले आपके सहयोगी दलों की गाली और भभकी सुनने के लिए तो वोट देंगे नहीं.

हमारे पास वैसे भी लालू प्रसाद, राम विलास पासवान, मुलायम सिंह यादव, मायावती हैं. अपना-अपना राज्य, अपना-अपना नेता. हम इनसे काम चला लेंगे. आप अपनी सोच लीजिए. प्रधानमंत्री आपको बनना है. अगला चुनाव छह साल बाद होगा. उसे किसने देखा है.

राज ठाकरे के बयान पर केंद्र सरकार चुप है. कोर्ट में शनिवार और रविवार को छुट्टी रहती है. सोमवार को देखते हैं कि कोई जनहित याचिका आती है या नहीं. नहीं आती है तो कोई न्यायालय संज्ञान लेता भी है या नहीं.

सब चुप रहें तो रहें, आप मत चुप मत होना. आपको प्रधानमंत्री बनना है. हमें आपको वोट देना है.

अगर देश के किसी भी प्रांत के लोगों को गाली दी जाती है और आपको फर्क नहीं पड़ता है तो हमें भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि प्रधानमंत्री कौन बनता है. वैसे भी, बिहार और उत्तर प्रदेश वाले मिल जाएं तो प्रधानमंत्री तो बना ही लेंगे.



रीतेश

कितना आसान होता है...

कितना आसान होता है
एसी कमरों में बैठकर
सोचना
भूख,
गरीबी,
बेकारी
को दूर करने की।
क्या घिनौना नहीं लगता
ये सब?
चबाते हुए चिप्स
पीते हुए
क‍ाफी
क्या इन्हें ध्यान नहीं आते
वे बच्चे
जो तड़पते हैं भूख से
कालाहांडी, सीतामढ़ी
और पलामू में
जिनके भूखे चेहरे
तड़पती आंते
टिकी होती हैं सिफॆ रोटी पर
और
रोटियां,
खड़ा कर देती हैं इन्हें,
मौत के द्वार पर
छीन लेती है
उनसे
उनकी सांसें
खत्म कर देती है
उनकी भूख
क्योंकि वे
मर चुके होते हैं
और इसके बाद
कितना आसान होता है
एसी कमरों में बैठकर
चर्चा करना
उन मौतों पर
जो होती हैं भूख से
क्या घिनौना नहीं लगता
ये सब?
मखमली बिस्तरों में
खर्राटें भरते
लोग
क्यों नहीं सुन पाते हैं
सिसकियां
कंपकपाहट
उन लोगों की,
जो फटा चद्दर या कंबल लपेटे
सोते हैं
सदॆ रातों में
फुटपाथ पर
और
अक्सर कुचले जाते हैं
चमचमाती गाडि़यों से
और फिर
उनकी मौत को ढका जाता है
रुपयों के बोझ तले
जान और रुपए की जंग में
जब जीतता है रुपया
तो
क्या
घिनौना नहीं लगता ये सब?


प्यारे दोस्त दुष्यंत को समपित जिसकी कटु आलोचनाएं हमें हमेशा कुछ नया करने की सीख देती रहेंगी


विष्णु सोनी